पीजी में जर्नल में रिसर्च पेपर प्रकाशित कराना हुआ अनिवार्य
- पीजी में अब एक विषय के पांच पेपर पढ़ेंगे विद्यार्थी
- 2027-28 के शैक्षणिक सत्र से लागू होगी नयी व्यवस्था
- तीसरे सेमेस्टर में चुने गए डीएसइ पेपर के आधार पर निर्धारित होगी विशेषज्ञता
दिल्ली. विश्वविद्यालयों में दो वर्षीय स्नातकोत्तर (पीजी) पाठ्यक्रम तैयार कर लिया गया है। नयी व्यवस्था के अनुसार, तीसरे सेमेस्टर में कोर्स वर्क का विकल्प चुनने वाले विद्यार्थियों को चौथे सेमेस्टर में उसी विषय से संबंधित पांच पेपर पढ़ने होंगे। इस व्यवस्था का उद्देश्य विद्यार्थियों को किसी एक विषय का गहन अध्ययन करने और उसमें विशेषज्ञता हासिल करने का अवसर प्रदान करना है। इसे शैक्षणिक सत्र 2027-28 से लागू किया जाएगा।
पांच पेपर पूरे करने पर मिलेंगे 20 क्रेडिट
नयी व्यवस्था के तहत पीजी द्वितीय वर्ष के जो विद्यार्थी तीसरे सेमेस्टर में समूह एक के अंतर्गत कोर्स वर्क का चयन करेंगे, उनकी विशेषज्ञता ‘डिसिप्लिन स्पेसिफिक इलेक्टिव’ (डीएसइ) पेपर के आधार पर निर्धारित होगी। इसका मकसद विद्यार्थियों को किसी एक विषय का विस्तार से अध्ययन करने का अवसर देने के साथ उस क्षेत्र में मजबूत अकादमिक आधार उपलब्ध कराना है।
तीसरे सेमेस्टर में डीएसइ-1 और डीएसइ-2 के अंतर्गत उपलब्ध तीन-तीन विषयों में से विद्यार्थियों को अपनी रुचि के अनुसार एक-एक विषय का चयन करना होगा। प्रत्येक विषय चार क्रेडिट का होगा। इसके बाद चौथे सेमेस्टर में चयनित विषय से संबंधित पांच पेपर पढ़ने होंगे। पांचों पेपर सफलतापूर्वक पूरे करने पर विद्यार्थियों को चार-चार क्रेडिट के आधार पर कुल 20 क्रेडिट मिलेंगे।
इस व्यवस्था के माध्यम से विद्यार्थियों को अपनी रुचि और करियर के लक्ष्य के अनुरूप विषय चुनने की सुविधा मिलेगी। किसी विशेष विषय में विशेषज्ञता प्राप्त करने से उन्हें उच्च शिक्षा, शोध और रोजगार के अवसरों में भी लाभ मिल सकेगा।
जर्नल में रिसर्च पेपर प्रकाशित कराना भी अनिवार्य
पीजी के तीसरे सेमेस्टर में शोध का विकल्प चुनने वाले विद्यार्थियों के लिए अब जर्नल में रिसर्च पेपर प्रकाशित कराना भी जरूरी होगा। पहले यह अनिवार्यता केवल पीएचडी के विद्यार्थियों के लिए थी, लेकिन अब पीजी स्तर पर भी शोधपत्र का प्रकाशन पाठ्यक्रम में शामिल कर दिया गया है। इसके लिए 200 अंक और दो क्रेडिट निर्धारित किए गए हैं।
इस पहल से स्नातकोत्तर स्तर पर ही विद्यार्थियों में शोध के प्रति रुचि विकसित करने और उन्हें शोध कार्य की विभिन्न प्रक्रियाओं एवं बारीकियों से परिचित कराने में मदद मिलेगी। साथ ही, विद्यार्थी आगे पीएचडी और अन्य उच्चस्तरीय शोध कार्यक्रमों के लिए भी बेहतर ढंग से तैयार हो सकेंगे।
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