यशपाल और उनके उपन्यास : समाजशास्त्रीय अध्ययन -मिली रानी पाल
शोध सारांश
यशपाल एक युग प्रवर्तक लेखक थे। अपने साहित्य के द्वारा सामाजिक बदलाव की दिशा में वे कार्य करते रहे। उनके उपन्यासों का समाजशास्त्रीय दृष्टि से अध्ययन करते हुए इस शोध कार्य को किया गया है। उपन्यासों में उनके स्त्री एवं पुरुष चरित्रों का अध्ययन-विश्लेषण किया गया। आज के परिवेश एवं यशपाल के समय के चरित्रों का अध्ययन कर नारी की स्थिति को जानने का एक प्रयास किया गया। सामाजिक स्थिति को जानने के लिए उनके चरित्रों को वर्ग अनुसार समझा गया तथा पाया गया कि पुरुष प्रधान समाज का ही वर्चस्व था। पूंजीपति वर्ग, मजदूर वर्ग, दलित, खेतीहर, सर्वहारा वर्ग, स्त्री, आदि वर्गों के बीच के संघर्ष को सामने लाया गया। मक्र्सवाद, मनोविश्लेषण वाद, प्रगतिवाद संबंधी लेखक के विचार को उनके चरित्रों में प्रकाश पाए जाने से समाज सुधार की यशपाल की सोच को शोध में सामने लाने का प्रयास किया गया है। देश की राजनीति एवं नेताओं के दोगले चरित्र को आज के परिपेक्ष में समझा जा सकता है। उनके उपन्यास ’झूठा सच’ की पंक्ति -‘‘सच को कल्पना से रंग कर उसी जन-समुदाय को सौंप रहा हूँ, जो सदा झूठ से ठगा जाकर भी सच के लिये आपनी निष्ठा और उसकी ओर बढ़ने का साहस नहीं छोड़ता’’ द्वारा लेखक के रूप में प्रखर लेखनी द्वारा बदलाव की लौ को प्रज्जवलित किए जाने की उनकी सोच सदा समाज के लिए प्रेरणादायक रहेगा।
बीज शब्द: यशपाल, समाज, साहित्य, समाजशास्त्र, प्रगतिवाद।
Yashpal and His Novels: A Sociological Study
-Milly Rani Pal
Research Scholar, Department of Hindi
Rajiv Gandhi University, Rono Hills, Doimukh
Abstract
Yashpal was a pioneering literary figure who consistently worked towards social transformation through his writings. This research undertakes a sociological study of his novels, with particular emphasis on the analysis of his male and female characters. By examining both the social milieu of Yashpal’s time and contemporary society, an attempt has been made to understand the status and condition of women. The study explores his characters through the lens of social class and reveals the dominance of a patriarchal social structure. It highlights the conflicts and struggles among various social groups, including the capitalist class, working class, Dalits, peasants, the proletariat, and women. The research also examines the influence of Marxism, psychoanalytic thought, and progressive ideology reflected in his characterization, thereby bringing forth Yashpal’s vision of social reform. His works provide valuable insights into the contradictions of politics and the duality of political leadership, which remain relevant in the contemporary context. The following statement from his celebrated novel ‘Jhutha Sach’ reflects his literary commitment to truth and social change: “I am presenting truth, coloured by imagination, to the very masses who, despite being repeatedly deceived by falsehood, have never abandoned their faith in truth or their courage to move towards it.” Through such powerful expressions, Yashpal sought to ignite the spirit of transformation in society. His progressive outlook and commitment to social justice continue to inspire readers and scholars alike.
Keywords: Yashpal, Society, Literature, Sociology, Progressivism.
शोध प्रविधि
शोध के लिए विश्लेषणात्मक, विवेचनात्मक एवं विवरणात्मक प्रविधि का प्रयोग किया जाएगा। विवेच्य विषय पर अधिकार रखने वाले विशिष्ट विद्वानों के दृष्टिकोण को उनकी पुस्तकों से संकलित किया गया है। इस प्रकार के शोध कार्य में अध्ययन का विषय वस्तु मानव है। मानव चरित्र के अनुरूप परिणाम में सत्य से पृथक बातें सामने आने की संभावनाएं बनी रहती है।
विषयवस्तु
यशपाल उन महान लेखकों में से एक है, जिनकी लेखनी सामाजिक सुधारवादी रही है। एक लेखक जिसने जीवन में लेखनी को केवल इसलिए चुना क्योंकि वह समाज को समझता था और समाज की दूर्वस्था से दुखी था। वह समाज को क्रांति के द्वारा बदलने का प्रयास करके देख चुका था। उसने स्वयं में यह अनुभव किया था कि समाज की भलाई के लिए उसे समाज के बीच रहकर समाज को जागरूक करना होगा। अतः यह स्वाभाविक ही है कि उनके विचारों में क्रातिकारी मनोभाव उद्वेलित हो। इसी का परिणाम रहा है कि क्रांतिकारी होने से ऐसा संभव नहीं था। अतः उसने क्रांति के द्वारा हिंसा का मार्ग न अपनाकर कलम को अपना हथियार बनाया।
यशपाल के उपन्यास-
1. दादा काॅमरेड
2. देशद्रोही
3. दिव्या
4. पार्टी काॅमरेड
5. मनुष्य के रूप
6. अमिता
7. झूठा-सच
8. बारह घण्टे
9. अप्सरा का श्राप
10. क्यों फंसे
11. मेरी तेरी उसकी बात
यशपाल के उपन्यासों का विधिवत् अध्ययन एवं विश्लेषण करने से यह बात सामने आती है कि उनके उपन्यासों में सामाजिक एवं राजनैतिक विषयों को प्रमुख विषय बनाकर कथावस्तु का ताना-बाना रचा गया है। उन्होंने सामाजिक समस्या जैसे-दास प्रथा, विधवा जीवन की समस्या, कुमारी माता की समस्या, पारंपरिक रीति-रिवाजों के कारण शोषण चक्र में पिसती हुई नारी की दयनीय स्थिति, संयुक्त परिवार की समस्या, वेश्या वर्ग की समस्या, मध्यवर्ग की समस्या आदि को अपने उपन्यासों के माध्यम से उजागर किया है। उनके उपन्यास ‘झूठा-सच’, ‘दादा काॅमरेड’, ‘पार्टी काॅमरेड’ आदि में देश के राजनैतिक समस्या एवं देश विभाजन का मार्मिक चित्रण हुआ है। उनका जीवन जहां आर्य समाज के आदर्शों के प्रभाव युक्त था, वहीं उनको ब्रिटिश साम्राज्यवाद के कुशासन का भी प्रत्यक्ष सामना करना पड़ा। विचारों से प्रगतिवादी होने के कारण वे तत्कालीन समाज में व्याप्त कुप्रथाओं को मानने को तैयार नहीं थे। उनके जीवन पर माक्र्सवाद का गहरा प्रभाव रहा है। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गुरूकुल में हुई, जिसने यशपाल को एक कठोर साधक के रूप में तैयार किया था। स्वतंत्रता आंदोलनों में सक्रिय क्रांतिकारी के रूप में उन्होंने भाग लिया। इन सभी बातों का प्रत्यक्ष प्रभाव उनकी रचनाओं पर पड़ा है। वे समाज को पारखी नजर से देखकर हमारे सामने अपने विचार रखते हैं।
उन्होंने बारह वर्ष में पहली कहानी ‘अंगूठी’ लिखी थी। कहानी लेखन से साहित्यिक कार्य का उन्होंने आरंभ किया। उन्होंने उपन्यास, कहानी, यात्रा वृतांत, जीवनी, निबंध, संस्मरण, नाटक, आदि पर कार्य किया, परन्तु उपन्यासों के लिए वे अधिक लोकप्रिय हुए। अपनी रचनाओं में यथार्थ को उसके भद्दे स्वरूप में रखकर उन्होंने समाज को आईना दिखाया। अपनी लेखनी में वे सामाजिक समस्याएं, स्त्री-पुरुष संबंध, धार्मिक पाखंड, जाति व्यवस्था, नारी सम्मान, स्वाधीनता आंदोलन, अंधविश्वास, साम्प्रदायिकता, शासन-तंत्र में व्याप्त अराजकता, न्याय व्यवस्था, आदि को यथार्थ रूप में अभिव्यक्त करते हैं। उनके उपन्यास साहित्य जगत में सदैव चर्चा का विषय रहे हैं। समाज को उसके विगलित मान्यताओं में जकड़े हुए देखकर चुप रहना शायद यशपाल को मंजूर नहीं था। यही कारण है कि वे अपने प्रखर शैली में ऐसी कुरीतियों, धार्मिक मान्यताओं, आडंबरों आदि को साहित्य में स्थान देते हैं। इसके लिए वे साहित्य जगत और समाज से विद्रोह करते हैं और समाज को एक दृष्टि देते हैं।
यशपाल ने ‘दादा काॅमरेड’ (1914 ई.) से लेकर ‘मेरी तेरी उसकी बात’ (1947 ई.) तक ग्यारह उपन्यास लिखे। जिनमें ‘दिव्या’ (1945 ई.), ‘झूठा सच’ (1958 ई.), ‘दादा काॅमरेड’ (1941 ई.) एवं ‘मेरी तेरी उसकी बात’ (1974 ई.) सर्वाधिक चर्चा में रही। यशपाल के उपन्यासों को अध्ययन के केन्द्र में रखे जाने का अपना विशेष कारण है। यशपाल के उपन्यासों का समाज पर विशेष प्रभाव रहा है। हिन्दी साहित्य जगत में प्रेमचंद के बाद के लेखकों में यदि कोई लेखक समाज को अधिक निकटता से व्यक्त करने में सक्षम रहा है, तो वह निश्चित रूप से यशपाल ही रहे हैं। अतः यशपाल को समझना, उनके विचारों को जानना, उनके उपन्यासों में सामाजिकता, आदि का अध्ययन करना प्रासंगिक है। यशपाल के उपन्यासों में व्यक्त सामाजिक जीवन का वैज्ञानिक रूप से अध्ययन, जिसमें लेखक के समय का परिवेश, उसका स्वयं का व्यक्तित्व एवं उसकी भावना अथवा विचारों का अध्ययन किया गया है। उनके उपन्यासों में प्रस्तुत सामाजिक जीवन, राजनीतिक परिस्थितियाँ, धार्मिक एवं सांस्कृतिक यथार्थ का वैज्ञानिक दृष्टि से अध्ययन, विवेचन एवं विश्लेषण किया गया है।
यशपाल के उपन्यास उनके जीवन-दर्शन का साक्ष्य है। उनके उपन्यास का कथानक उनके समय का समाज है, जिसे उन्होंने सच्चे और मुखर रूप से उपन्यासों में स्थान दिया। पात्रों के माध्यम से उन्होंने समाज के ध्वस्त होते नैतिक मूल्य एवं समाज में नवीन नैतिक आदर्श की खोज का प्रयास किया है। यशपाल का प्रथम उपन्यास ‘दादा काॅमरेड’ 1941 ई. में प्रकाशित हुई। यशपाल स्वयं देश की तत्कालीन राजनीति एवं स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े हुए थे। ‘दादा काॅमरेड’ उपन्यास कम्यूनिस्ट पार्टी की गतिविधियों पर केन्द्रीत करके लिखा गया। ‘दादा काॅमरेड’ का कथ्य एवं शिल्प दोनों ही प्रभावशाली था। इसके बाद 1943 ई. में उनका उपन्यास ‘देशद्रोही’ प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास स्वतंत्रता संग्राम एवं उससे जुड़ी घटनाओं को आधार बनाकर लिखा गया, जिसमें कम्यूनिस्टों पर लगे आरोपों का खंडन किया गया है। यह उपन्यास अपने विशिष्ट विषय के लिए चर्चा में रहा। उनका तीसरा उपन्यास ‘दिव्या’ 1945 ई. में प्रकाशित हुआ। यह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर वर्तमान में व्याप्त नारी जीवन की समस्या को चित्रित करने वाला यशपाल की एक कालजयी रचना है। इस उपन्यास के माध्यम से लेखक नें पुरुष प्रधान समाज में नारी को केवल भोग की वस्तु मानने के सामाजिक दृष्टि को सामने रखते हुए उससे जुड़ी कई समस्या को सामने लाने का प्रयास किया है। 1947 ई. में प्रकाशित ‘पार्टी काॅमरेड’ स्वतंत्रता संग्राम में कम्यूनिस्ट पार्टी के कार्यों एवं उनकी विचारधाराओं को सामने रखकर लिखा गया उपन्यास है। 1949 ई. में ‘मनुष्य के रूप’ नामक उपन्यास प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में भौतिक परिवेश में विघटित हो रही मानवीय मूल्यों को उजागर किया गया है। लेखक मध्यवर्ग की परेशानियों एवं उनके संघर्ष को दिखाया है। ‘अमिता’ उपन्यास का प्रकाशन 1956 ई. में हुआ। इसमें सम्राट अशोक के हृदय परिवर्तन की कल्पित कथा को रखा गया है, जिसमें अशोक कलिंग की राजकुमारी अमिता के व्यवहार से प्रभावित होता है। ‘झूठा सच’ उनका एक बृह्द उपन्यास है, जो दो भागों में प्रकाशित हुआ। पहला भाग ‘वतन और देश’ 1958 ई. में प्रकाशित हुआ तथा दूसरा भाग ‘देश का भविष्य’ 1960 ई. में प्रकाशित हुआ। ‘वतन और देश’ देश विभाजन की त्रासदी पर आधारित था तथा ‘देश का भविष्य’ स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत नेताओं एवं बुद्धिजीवियों द्वारा राष्ट्र निर्माण में अपने स्वार्थ सिद्धी के लिए अपनाए जा रहे छल एवं मनमाने तरिकों से सत्ता पर अधिकार प्राप्ति की भद्दी कोशिशों को उजागर करते हुए लिखा गया था। इसके बाद 1962 ई. में उनका उपन्यास ‘बारह घंटे’ प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में स्त्री-पुरुष संबंधों पर लेखक ने मार्मिक एवं आधुनिकता युक्त विचार रखे हैं। यह उपन्यास समाज में स्त्री की भावनाओं एवं संवेदनाओं को तार्किक आधार पर समझने का प्रयास था। 1965 ई. में उनका उपन्यास ‘अप्सरा का श्राप’ प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास विश्वामित्र, मेनिका, दुष्यंत एवं शकुन्तला के ऐतिहासिक कथा की पृष्ठभूमि पर लिखा गया था। 1968 ई. में ‘क्यों फसे’ उपन्यास प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास स्त्री की स्वतंत्रता की वकालत करता है। 1974 ई. में उनका अंतिम उपन्यास ‘मेरी तेरी उसकी बात’ प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में स्वतंत्रता संग्राम का विस्तृत वर्णन मिलता है। यशपाल के बृह्द उपन्यासों में से यह एक था। यशपाल का उपन्यास ‘झूठा सच’, ‘मेरी तेरी उसकी बात’ एवं ‘दादा काॅमरेड’ बड़े आकार में लिखा गया।
यशपाल के संपूर्ण साहित्य का व्यापक अध्ययन करते हुए मैंने पाया कि यशपाल प्रगतिशील विचारों के वाहक रहे हैं। वे समाज की तात्कालिक संवेदना को गहराई से समझते है, परन्तु समय की आवश्यकता अनुसार समाज को बदलने के लिए वे कथासाहित्य को माध्यम बनाते हैं।
यशपाल के साहित्य को प्रथक रखकर हिन्दी साहित्य की कल्पना नहीं की जा सकती है। साहित्यकार का साहित्य एवं साहित्यकार का समाज एक दूसरे के पूरक होते हैं। उनके उपन्यासों में देश के परिवेश, सामाजिक एवं राजनीतिक विषय, स्त्री-पुरुष संबंध, धार्मिक कुरीतियाँ, स्त्री स्वतंत्रता, सामाजिक भेद-भाव, पूंजीवाद, मध्यवर्गीय चेतना आदि के अध्ययन द्वारा तत्कालीन समाज के सत्य को समझा जा सकता है। यशपाल समाज के यथार्थ को सामने रखकर, समाज में बदलाव को मार्गदर्शित करने हेतु, प्रगतिशील सोच के साथ चरित्रों का निर्माण करते हुए उनका सामाजिक बदलाव का आहवान है। ‘‘संतति की परंपरा के रूप में मानव कभी अमरता दे सकता है ...’’ (दिव्या, पृ. स. 216) में स्वर्ग और निर्वान के मिथक को चुनौति दी गई है। अध्ययन के द्वारा इसी बदलाव को समाज में चरितार्थ रूप में सामने पाया जाना यशपाल का साहित्यिक योगदान है। इसी कारण अपने लेखनी के द्वारा यशपाल की अमिट छाप हमें साहित्य जगत में देखने को मिलती है। साहित्यकार यशपाल समाज के जिस स्वरूप को अपने आस-पास बनाना चाहते थे, वह निश्चय ही समाज के प्रभुत्व सम्पन्न लोगों के हित में नहीं था। जिसके कारण वे सदा साहित्यिक जगत में चर्चा के केन्द्र में रहे तथा उनके विचार आलोचना का विषय बने रहे। यद्यपि आज के प्रसंग में समाज पर्याप्त बदलाव के साथ हमें परिलक्षित होता है, परन्तु अभी तक हम यशपाल के उच्च आदर्श समाज को सुदृढ़ करने में विफल रहे हैं। इस दृष्टि से उनके उपन्यासों को आज के परिपेक्ष में समाजशास्त्रीय अध्ययन किया जाना प्रासंगिक जान पड़ता है। यशपाल की प्रगतिवादी विचारधारा समाज को जकड़ी हुई कुप्रथाओं को जड़ से समाप्त करने की पक्षथर है। उन्होंने परम्परावादी एवं प्रतिक्रियावादी विश्वासों के चित्रण में विवाह-मोक्ष, पुनर्जन्म, अन्तर्जातीय विवाह, पुरूष का बहु-विवाह, अनैतिक संबंध, स्त्री के प्रति भोगवादी मानसिकता, पर्दा प्रथा, मातृत्व की समस्या आदि को विस्तार से उपन्यासों में उकेरा है। लेखक द्वारा स्त्री के प्रति अपनी दृष्टिकोण को प्रकट करते हुए कई स्थानों पर नारी पात्रों द्वारा अविवाहित रहना पसंद करते हुए दर्शाया गया है। नारी की उन्नत सोच को रखते हुए लेखक ने नारी को आत्मनिर्णय लेते हुए भी दिखाया है। लेखक केवल घर से बाहर नारी की समस्या को ही रेखांकित नहीं करते, बल्कि वे दिखाते हंै कि किस प्रकार स्त्री को व्रत-उपवास, धार्मिक पाखंड, पुरुष की सामाजिक प्रभुत्व जैसी समस्या का भी सामना करना पड़ता है।
मध्यवर्ग को केन्द्र में रखकर लेखक अपने उपन्यासों, पात्रों का सृजन करते हैं, इसलिए वे इस वर्ग के अध्यापक, क्लर्क, प्रूफ रीडर, डाकखाने के बाबू, काॅमरेड, छात्र, नौकरी की तलाश करते नवयुवक, छोटे प्रेसों के मालिक, आदि के माध्यम से समाज में मार्कसवादी विचारों को सामने लाने के लिए संघर्ष करते हुए दिखाते हैं।
यशपाल समाज के निम्न वर्ग के प्रति संवेदना का दृष्टिकोण रखते हैं। वे किसान, मजदूर, मिल में काम करने वाले श्रमिक, मामूली वेतन भोगी सरकारी मुलाजिम, समाज में क्रय-विक्रय द्वारा शोषित दासों का समाज, कठिन जीवन जिने वाले पहाड़ी समाज, वेतन भोगी ड्राईवर समाज आदि के आदर्श एवं सामाजिक जीवन की कठिनाईयों को कथा साहित्य के माध्यम से सामाजिकों के समक्ष रखते हैं।
समाज का सर्वाधिक शोषण करने वाले उच्च वर्ग को लेखक ने खोखले आदर्शों से युक्त, मानवीय मूल्यों को ताक पर रखकर अनैतिक आचरण में लिप्त दिखाया है। इसमें कुछ अपवाद हो सकते हैं। परन्तु धन एवं महत्वकांक्षी सोच के कारण इस वर्ग के महिमाशाली राजा, महाजन, जमीदार, पुरोहित वर्ग, सत्ताधारी नेता आदि को पतन की ओर जाते हुए समाज में देखा जा सकता है।
यशापाल के उपन्यासों में समाज के विविध वर्ग के पात्रों को प्रभावपूर्ण ढ़ग से जीवन्त चित्रित किया गया है। पात्रों को पुरूष एवं स्त्री पात्रों के रूप में विभाजित करते हुए देखा जा सकता है कि यशपाल के पुरूष पात्र परम्परावादी, कम्युनिस्ट, कांग्रेसी नेता, अनैतिक आचरण से युक्त दुष्ट चरित्र, युवा वर्ग का प्रतिनिधि चरित्र, आदि के रूप में विभाजित किया जा सकता है। सांप्रदायिक दंगो पर जयदेव पूरी के वाक्य ‘‘तुम्हारे कत्ल के लिए उत्तेजना दिलाने की जिम्मेदारी उन नेताओं पर है जो तुम्हारे जैसे इंसानों पर शासन के सिंहासन पर पहुंच सकने ...’’ (झूठा सच, पृ. सं. - 137) यहा राजनीति और नेताओं के प्रति उत्तेजना प्रकट हुई है। वहीं स्त्री पात्रों को प्रचीन विचारों की महिला, प्रेमिका, मानसिक द्वंद से ग्रसित नारी, आत्मनिर्णय लेने का प्रयास करती हुई आधुनिक स्त्री, भोगवाद की शिकार नारी, माता के स्वरूप में कमजोर एवं सुदृढ़ नारी आदि के रूप में देखा जा सकता है।
यशपाल के उपन्यासों के पात्रों के चरित्र-चित्रण के माध्यम से उनके उपन्यास की विकास यात्रा को समझा जा सकता है। सभी वर्ग के पात्रों में कम या अधिक गुण एवं दोष का पाया जाना स्वाभाविक है, परन्तु जिस रूप में लेखक चरित्र को कथानक में फिट करते है, वह लेखनी की कौशल से ही उपजी हुई है। यशपाल के उपन्यासों के अध्ययन से उनकी जीवन- दृष्टि का परिचय हमें प्राप्त होता है। यह केवल लेखन कौशल नहीं है, जिसने यशपाल को अपने कथानक को निर्धारित करने में सहायता की, बल्कि उनका समग्र जीवन अनुभव ही उनकी रचनाओं को व्यापक रूप से प्रभावित करता है। वे एक क्रांतकारी थे और देश के विभाजन से जुड़े राजनैतिक गतिविधियों से वे परिचित थे, जिसके कारण ही उनके उपन्यासों में देश-विभाजन तथा नेताओं के दोगले चरित्र को प्रभावी रूप से चरितार्थ किया गया है। कम्यूनिस्ट पात्रों के चित्रांकन में वे पूर्वाग्रह से युक्त दिखाई देते हैं, क्योंकि उनका मानना था कि सभी कम्यूनिस्ट पात्र आदर्श चरित्र के होते हैं, जो आंशिक रूप में ही सत्य है। लेखक के पात्र परिवर्तन के गुण को धारण किए हुए है। इससे लेखक की प्रगतिवादी एव जीवंत होने का परिचायक है।
लेखक के अधिकतर उपन्यासों के कथानक राजनीति को केन्द्र में रखकर रचा गया है। जहां उनकी दृष्टि प्रगतिवादी है। परन्तु कहीं-कहीं वे अतिवाद के शाकार होते हुए दिखाई देते हैं। विवाह और कला संबंधी विचारों की नूतनता अपना महत्व रखती है। लेखक ने नारी के प्रति उन्नत सोच को अपने उपन्यास में स्थान दिया है। परन्तु लेखक मक्र्सवादी विचार को आगे रखकर मूर्तकार द्वारा नारी के गले से घुटने तक के नारी शरीर के महत्व को परिलक्षित करता है, जिसे सामज में सृष्टि के सृज्न के सूचक के रूप में नारी के मह्त्व को ही स्वीकार करती है। वास्तविक रूप से देखा जाए तो यह उपयोगितावाद की ही अवधारणा है। वास्तव में नारी में बौधिक चतुराई एवं उसके कारण व्यक्ति स्थिति को प्रभावित करने वाले कारकों के कारण ही व्यक्ति समाज में गरीब से अमीर एवं अमीर से गरीब बनता है। बौद्धिक चेतना के फलस्वरूप व्यक्ति के जीवन के निर्णय एवं संबंधित परिस्थितियां बदलती है। ‘दिव्या’ में दिव्या का दासी से वेश्या बनना तथा पृथ्वसेन के पिता का दास से कुशल व्यापारी बनाना इस बौद्धिक चेतना से समाजिक स्थिति में परिवर्तन का सूचक है। ऐसे में गले से घुटने तक का नारी स्वरूप के महत्व को पूर्ण मानना एक मुर्तिकार की निजी मानसिकता हो, तो षायद अधिक सटिक होगी।
मनोविश्लेषणवादी विचारों का प्रभाव भी लेखक के उपन्यासों में देखा जा सकता है। यशपाल के उपन्यास ‘क्यों फंसे’ में पात्र भास्कर को मोती, डाॅ. मिस, मोना, हेमा जैसी छह स्त्रियों के साथ सेक्स संबंध स्थापित करते हुए दिखाया गया है। तारा, कनक, सोमा, शैल आदि स्त्रियां जो व्यवहार करती हैं, उसे भी मनोवैज्ञानिक सिद्दान्तों पर अच्छी तरह से समझा जा सकता है। अनेक स्थितियां आज के मानव के नैतिक चरित्र को भी उजागर करती हैं।
निष्कर्ष
सारांश के रूप में यह कहा जा सकता है कि यशपाल के उपन्यास हिन्दी साहित्य में अपना अलग स्थान रखते हैं। विचारों की प्रसारात्मकता के साथ में साहित्यिक महत्व को लिए हुए है उनकी उपन्यास साहित्य। मध्यवर्गीय समाज में बदलाव, मान्यताओं को स्वीकार करने में प्रगतिशील विचारधारा को अपनाना तथा नारी एवं समाज के पिछड़े वर्ग को सामाजिक, धार्मिक एवं राजनैतिक न्याय दिलाने की कोशिश में लिखे गए उनके उपन्यास साहित्य से निःसंकोच रूप से यह कहा जा सकता है कि लेखक यशपाल समाज के प्रति आशावान एवं आस्थावान थे।
संदर्भ सूची
1. यशपाल रचनावली, संपादक-आनन्द, खंड 1 से 14, लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण-2007
2. मार्क्सवाद और उपन्यासकार यशपाल - पारसनाथ मिश्र, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1972
3. यशपाल के उपन्यासः सामाजिक कथ्य - चमनलाल गुप्त, शारदा प्रकाशन, नई दिल्ली, 2008
4. दिव्या का महत्व - मधुरेश, सुमित प्रकाशन, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण, 2006
5. यशपाल के उपन्यासों का मूल्यांकन - सुदर्शन मल्होत्रा, आदर्श साहित्य प्रकाशन, दिल्ली, 1973
शोध कार्य
1. यशपाल की कहानियों का समाजशास्त्रीय अध्ययन, सोनाली पाल, पीएच.डी उपाधि, 2009, हिन्दी विभाग, असम विश्वविद्यालय, सिलचर, शोध निर्देशक - प्रो. एस. चैहान
2. यशपाल के उपन्यास परंपरा और प्रगति का संगम, मधु सिंह, पीएच.डी उपाधि, 2005, भी.बी.एस. पूर्वांचल विश्वविद्यालय
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