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शत्रुघ्न प्रसाद जीवन और साहित्य दोनों में अनुशासन के पैरोकार थे : अवधेश नारायण सिंह

ऐतिहासिक उपन्यास 'तख़्ते ताऊस' पर संगोष्ठी एवं 'आचार्य भर्तृहरि और उनका वाक्यपदीयम्' विषय पर व्याख्यान


12 जुलाई, पटना। 
"साहित्यकार के लिए कल्पनाशक्ति होना अति आवश्यक होता है। शत्रुघ्न प्रसाद जीवन और साहित्य दोनों में अनुशासन के पैरोकार थे। मैं अपने जीवन में उनके अनुशासन को हमेशा निभाने का प्रयास करता हूँ।" ये बातें आचार्य शत्रुघ्न प्रसाद शोध संस्थान, पटना एवं श्री अरविंद महिला कॉलेज, पटना के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित व्याख्यानमाला की चौथी शृंखला के कार्यक्रम में बिहार विधान परिषद् के सभापति अवधेश नारायण सिंह ने कहीं।

    यह कार्यक्रम पटना स्थित श्री अरविंद महिला कॉलेज के सभागार में आयोजित किया गया, जिसमें शत्रुघ्न प्रसाद के उपन्यास 'तख़्ते ताऊस' तथा 'आचार्य भर्तृहरि और उनका वाक्यपदीयम्' विषयक दो सत्रों में विमर्श हुआ। उद्घाटन सत्र में श्री सिंह ने आचार्य जी के साथ बीते दिनों को याद किया। उन्होंने बताया कि कैसे वे हमेशा समाज और राष्ट्र के लिए चिंतित रहते थे। उन्होंने उपन्यास के केंद्र-बिंदु विषय—मुगल आक्रांताओं द्वारा देश में बलात् धर्म-परिवर्तन तथा महिलाओं के चरित्र-हनन जैसे मुद्दों—को प्रमुखता से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि शत्रुघ्न प्रसाद चाहते थे कि उनकी लेखनी से वर्तमान पीढ़ी विगत इतिहास के उन अमानवीय पक्षों को जाने, जिसकी कीमत हमारे पूर्वजों ने जान पर बाज़ी लगाकर चुकाई।

    इस सत्र में कॉलेज की प्राचार्या प्रो. रेखा रानी ने अतिथियों को अंगवस्त्रम् एवं महर्षि अरविंद का प्रतीक-चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया। अपने स्वागत भाषण में उन्होंने कहा कि ऐसे महान विभूति के साहित्यिक कर्म पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन महाविद्यालय के लिए गर्व का विषय है।

    प्रथम सत्र के मुख्य वक्ता उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के पूर्व अध्यक्ष एवं पंडित दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर के पूर्व आचार्य प्रो. सदानंद गुप्त ने 'तख़्ते ताऊस' उपन्यास की कथावस्तु पर विशद विमर्श प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि "शत्रुघ्न प्रसाद ने अपनी रचनाधर्मिता के माध्यम से राष्ट्रीय स्वत्व का प्रसार किया है। वे इतिहास को उसकी निरंतरता में देखने के आकांक्षी थे। अपने ऐतिहासिक उपन्यासों में वे अपनी धरती और अपनी संस्कृति से प्रेम करने वाले लेखक के रूप में दिखाई देते हैं। उनका उपन्यास 'तख़्ते ताऊस' औरंगज़ेब के समय के इतिहास को प्रस्तुत करता है, जिसमें सतनामी संप्रदाय, शिवाजी और भारत की संघर्षशील परंपरा का चित्रण किया गया है। यह उपन्यास अपने मूल उद्देश्यों में आज भी प्रासंगिक है।"

    इस सत्र की अध्यक्षता बिहार विधान परिषद् में सत्तारूढ़ दल के उपनेता प्रो. राजेन्द्र प्रसाद गुप्ता ने की। उन्होंने कहा कि शत्रुघ्न प्रसाद ने राष्ट्रीय एकता को ध्यान में रखकर रचनाधर्मिता की है, जो आज भी हमारे लिए प्रासंगिक है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि जिस प्रकार आदि गुरु शंकराचार्य ने सनातन परंपरा की संरक्षा के लिए देश के चार भागों में पीठों की स्थापना की, उसी प्रकार शत्रुघ्न प्रसाद ने नालंदा, कश्मीर, उज्जयिनी, पंजाब, श्रावस्ती, राजस्थान आदि स्थलों के कथानकों को अपने उपन्यासों में स्थान देकर पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोया है।

    प्रथम सत्र के प्रारंभ में आचार्य शत्रुघ्न प्रसाद शोध संस्थान की अध्यक्ष प्रो. अनीता ने विषय-प्रवर्तन किया। इस सत्र में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में आचार्य शत्रुघ्न प्रसाद के उपन्यासों पर शोधकार्य कर रहे चार शोधार्थियों—विवेक त्रिपाठी (राजा शंकर शाह विश्वविद्यालय, छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश), सौरभ मोराले (दिल्ली विश्वविद्यालय), चंदन कुमार पासवान (ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा) तथा प्रदीप कुमार अवस्थी (जयप्रकाश नारायण विश्वविद्यालय, छपरा)—को 'आचार्य शत्रुघ्न प्रसाद रचना-सम्मान' से सम्मानित किया गया। उन्हें प्रशस्ति-पत्र, प्रतीक-चिह्न एवं अंगवस्त्रम् प्रदान किया गया। चारों शोधार्थियों ने संक्षेप में आचार्य शत्रुघ्न प्रसाद की कृतियों पर केंद्रित अपने विचार भी प्रस्तुत किए।

    काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. अशोक कुमार ज्योति ने अपने वक्तव्य में आचार्य भर्तृहरि एवं आचार्य शत्रुघ्न प्रसाद के व्यक्तित्व और लेखन का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करते हुए उनकी ऐतिहासिक दृष्टि की विशेषताओं को भी रेखांकित किया।

    इस सत्र में प्रसिद्ध चिकित्सक प्रो. विजयेन्द्र कुमार की गरिमामयी उपस्थिति रही। सत्र का संचालन डॉ. अजय कुमार ने तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अरुण कुमार ने किया।

द्वितीय सत्र

द्वितीय सत्र का विषय था—'आचार्य भर्तृहरि और उनका वाक्यपदीयम्'।
अपने बीज वक्तव्य में वरिष्ठ साहित्यकार एवं भारतीय प्रशासनिक सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी रणेन्द्र कुमार ने कहा कि 'भर्तृहरि का वाक्यपदीयम्' भाषाचिंतन की महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। इस पुस्तक का विदेशों पर भी गहरा प्रभाव पड़ा।

    इस सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के संस्कृत विभाग के आचार्य एवं संकायाध्यक्ष प्रो. रजनीश कुमार मिश्र ने अपने वक्तव्य में कहा कि पूरी दुनिया के भाषाचिंतन की पृष्ठभूमि तैयार करने में भर्तृहरि ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। चिंतन का प्राथमिक माध्यम भाषा है, यह बात भर्तृहरि ने पाँचवीं शताब्दी में ही पूरी दुनिया को बता दी थी। ज्ञान, भाषा और सत्ता का आपस में गहरा संबंध है। सत्ता को भाषा ने निर्मित किया है। प्रो. मिश्र ने कहा कि आचार्य भर्तृहरि ने 'वाक्यपदीयम्' की पहली कारिका में ही शब्द और ब्रह्म के अंतःसंबंध को स्थापित कर दिया था।

    इस सत्र के अध्यक्षीय वक्तव्य में श्री अरविंद महिला कॉलेज की प्राचार्या प्रो. रेखा रानी ने कहा कि आचार्य भर्तृहरि संस्कृत व्याकरण को समृद्ध करने वाले विद्वान् शास्त्रज्ञ थे। उन्होंने वर्णमाला की विशेषताओं को पुनः स्थापित करते हुए नवीन चिंतन दिया। उनका चिंतन आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है। इस सत्र में विशिष्ट अतिथि के रूप में बिहार लोक सेवा आयोग के सदस्य प्रो. अरुण कुमार भगत भी उपस्थित रहे।

शत्रुघ्न प्रसाद शोध संस्थान के महासचिव डॉ. अरुण कुमार ने बताया कि इस कार्यक्रम में बिहार के कई विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक, शोधार्थी एवं साहित्यकारों ने भाग लिया। इस सत्र का संचालन डॉ. आशा कुमारी ने, धन्यवाद ज्ञापन डॉ. प्रशांत ने तथा पूरे आयोजन का सफल संयोजन डॉ. प्रिया कुमारी ने किया।

    इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी; जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली; पटना विश्वविद्यालय; पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय; मगध विश्वविद्यालय आदि संस्थानों से 200 से अधिक शिक्षकों एवं शोधार्थियों ने भाग लिया। इस अवसर पर डॉ. आनंद प्रकाश गुप्ता, डॉ. अमित कुमार, डॉ. शारदा कुमारी, डॉ. शोभित कुमार, डॉ. वीरेंद्र कुमार यादव, डॉ. अविनाश, डॉ. बेबी, डॉ. सुनील, डॉ. रमेश, डॉ. माधवी, डॉ. मनोज, डॉ. इंदिरा सहित अनेक शिक्षाविद् एवं साहित्यकार उपस्थित थे।

 
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