मूल आलेख
‘रात्रिगमिष्यति’ एक खंडकाव्य है, जो इतिहास के प्रसिद्ध मेवाड़ साम्राज्य के शासक महाराणा उदय सिंह की धाय मां पन्नाधाय को केंद्र में रखकर लिखा गया है। यह खंडकाव्य 11 सर्गों में विभाजित है। प्रथम सर्ग तमो वर्धते, द्वितीय सर्ग - दीपदर्शनम्, तृतीय सर्ग - मा स्वपिहि, चतुर्थ सर्ग - तमो न पश्यसि, पंचम सर्ग - विक्रमवधम्, षष्ठ सर्ग - दीपरक्षणम्, सप्तम सर्ग - दीपदानम्, अष्टम सर्ग - वानससरित्तटे, नवम सर्ग - रात्रिर्जगाम्, दशम सर्ग - अस्तंगतश्चंद्रमा, एकादश सर्ग - रविरूदेति।
पन्नाधाय का त्याग जैसी एक छोटी-सी घटना को लेकर कवि हृदय अवस्थी जी ने अपनी सौंदर्य-प्रतिभा तथा कल्पना के द्वारा 11 सर्गों का एक वृहद खंडकाव्य रच डाला। वर्तमान में सामाजिक संबंधों की डोर इतनी जीर्ण हो रही है कि माता-पिता, भाई-भाई, पति-पत्नी, पिता-पुत्र के संबंधों को देखकर शब्द भी लज्जा से अपना मुख छिपाने लगते हैं। ऐसे समय में पन्नाधाय की स्वामीभक्ति तथा त्याग की कहानी को सुनकर हमें प्रेरणा लेनी चाहिए कि वह किस प्रकार अपने राज्य के भावी सम्राट की सुरक्षा के लिए अपने पुत्र का बलिदान कर दिया। इतिहास-प्रसिद्ध पात्र पन्नाधाय के त्याग पर आधारित खंडकाव्य रात्रिगमिष्याति डाॅ. रामशंकर अवस्थी की विविध भावनाओं, कल्पनाओं एवं विचारों से परिपूर्ण अनूठा काव्य-सृजन है। महाराणा संग्राम सिंह की मृत्यु के पश्चात उनका बड़ा पुत्र विक्रम सिंह मेवाड़ का राजा हुआ, परंतु वह बहुत विलासी एवं कामुक राजा था। सूर्यवंशियों के लिए मानो वह कलंकावतार रहा हो-
‘‘त्वं विक्रमादित्य। न भास्करोऽसिबिम्बोऽस्ति भानोरुदयोऽस्ति बालः
नापीडयोग्य शिशुललाटं संरक्षितव्यः सविता नृपालः।।’’1
राजा विक्रम सिंह संपूर्ण प्रजा के लिए घृणा के बादल के समान था। वह प्रकाश को निगलने वाले अंधकार के समान था। राजधर्म से दूर सुरा और सुंदरी में मस्त रहता था। इसी कारण प्रथम सर्ग का नाम अवस्थी जी ने तमो वर्धते रखा है। राणा सांगा का छोटा पुत्र उदय सिंह अभी शिशुरूप वाला सूर्य है, जो मुकुट धारण करने योग्य नहीं है। विक्रम सिंह प्रजा का संरक्षण करने योग्य नहीं है, इसलिए मंत्रियों ने निर्णय लिया कि विक्रम को कारावास में डालकर वनवीर, जो विक्रम सिंह का चचेरा भाई है, उसके हाथ में राजसत्ता धरोहर के रूप में दे दी जाए। पन्ना, जो दोनों की धाय मां है, वह जेल में जा-जा कर विक्रम सिंह की देखभाल करती है। उसे बहुत कष्ट है कि मेवाड़ का राजा बंदी है। वह चाहती है कि राजमुकुट भले ही वनवीर के सिर पर रहे, परंतु उसका पुत्र चंदन और राजा महाराणा संग्राम सिंह के दोनों पुत्र विक्रम सिंह और उदय सिंह सुरक्षित रहें। विक्रम सिंह पन्ना से कहता है कि कर्मचंद, जो महामंत्री है, वह प्रेरणा का दीपक है, जो मेवाड़ के अंधकार को प्रकाशित कर सकते हैं। आप उनसे मदद लीजिए। इसी कारण द्वितीय सर्ग का नाम दीप दर्शनम् पड़ा।
तीसरे सर्ग में वनवीर की माता अपने पुत्र से कहती है कि तुम दिन-रात प्रजा की सेवा करके हमेशा के लिए राजा बन सकते हो, यह तुम्हारे सोने का समय नहीं है। मा स्वपिहि, इसी कारण इस सर्ग का नाम पड़ा। वह कहती है कि मैं राजमाता की गरिमा के साथ जीवित रहना चाहती हूं। इस पर वनवीर कहता है कि मां, तुम चिंता मत करो। मैं विक्रम का वध जैसे शेर मृग का करता है, उसी तरह से कर दूंगा और राजा मैं ही रहूंगा। चौथे सर्ग में उदय सिंह शैशवावस्था में है और वह केवल सौंदर्य ही देखता है। वह वनवीर की कूरता रूपी अंधकार से अनजान है। इसलिए इस सर्ग का नाम तमो न पश्यसि रखा गया है।
‘‘जानासि न रिपुनिस्त्रिंशम्, त्वां सपदि चेष्टते हन्तुम।
त्वां वर्जयामि शर्वर्यां, भम्ररसं ग्रहीतुं गन्तुम।।’’2
वनवीर अपने आप को राजा बनाए रखने के लिए अपने मार्ग का कांटा रूप विक्रमसिह का पांचवें सर्ग में हत्या कर देता है। अब उसका अगला कांटा कुंवर उदय सिंह है, जिसे भी हटाने का वह पूर्ण प्रयास करता है। परंतु उदय सिंह की धाय मां पन्ना इस षड्यंत्र से परिचित है और अपने राज्य के दीपक को बचाने का उपाय की चिंता करती हुई भयभीत रहती है। तथा महल से किसी तरह से कुंवर उदय सिंह को सुरक्षित बाहर निकालना चाहती है। वह राज्य के विश्वासपात्र सेवक बारी से कहती है कि तुम्ही कुंवर उदय सिंह को महल से सुरक्षित बाहर भेज सकते हो, क्योंकि वह झूठे पत्तलों को महल से बाहर फेंकने का काम करता है।
‘‘उच्छिष्टाः द्रोणीः पत्रस्थालीः नीत्वा, सर्वत्र पद्मसे त्वं निःसङ्कोऽभीत्वा।
ते कण्डोलेऽहं शाययामि नृपबालम्, दुर्ग हातुं पातुं भाविनं नृपालम्।।’’3
इसी कारण इस सर्ग का नाम दीपरक्षणम् पड़ा।
सातवें दीपदानम् नामक सर्ग में पन्ना कुंवर उदय सिंह को सुरक्षित महल के बाहर भेज दिया, लेकिन बनवीर जब ढूंढते हुए उदय सिंह को आएगा, तो वह क्या बताएगी? इस चिंता में उसने एक उपाय सोचा। वह अपने राज्य के दीपक को सुरक्षित रखने के लिए घर के दीपक का बलिदान करने का विचार बनाया और अपने पुत्र चंदन से कहती है -
‘‘चन्दन! रिपुदृशोर्रजो, नृपपुत्रो भव, शेष्वोदयपर्यङ्के त्वं दृम्जल मा स्रव।
वज्रं सहस्व ममते! भूत्वा पाषाणी, वधकाय दातुमात्मजं त्वमसि कल्याणी।।’’4
उदय सिंह के बिस्तर पर सुला देती है। वनवीर चंदन को उदय सिंह समझ करके उसका वध करके चला जाता है। पुत्र की मृत्यु के बाद पन्ना अपने आप को कोसते हुए कहती है -
‘‘कृत्ये! नाम्नोः जननीहृदयम्, सर्पिणी! वाच्छसि गरितुं तनयम्।
राक्षसि! किमीक्षसे बालमुखम्, दातुं नाशक्नोरङ्कसुखम्।।’’5
पुत्र की मृत्यु के पश्चात पन्ना धाय भी जीवित नहीं रहना चाहती है, परंतु उसके बिना उदय सिंह की देखरेख कैसे होगी, यह विचार बनाकर अपने दिल पर पत्थर रखकर वह उदय सिंह के देखरेख में अपना संपूर्ण जीवन समर्पित करने का विचार बनाती है और इस उद्देश्य से वह महल से बाहर, जहां उदय सिंह को भिजवाई थी, वानस नदी के किनारे चली जाती है।
‘‘भित्त्वा साहसमाहूय तमः परिवेशम्, धात्री वानसमाप्नोद् दाम्यन्ती क्लेशम्।
भयरूपमदत्त तटिन्यै निशाप्रसादः, भयमवर्धयत् तटपिप्पलपल्लवानादः।।’’6
अपने बड़े भाई विक्रम सिंह और दोस्त चंदन के वध की खबर सुनकर उदय सिंह बहुत अधिक क्रोधित हुआ और वह तुरंत वनवीर का वध करने के लिए धाय मां पन्ना से तलवार मांगता है। परंतु धाय मां उसके क्रोध को शांत कराके भय के संसार को छोड़कर उदय सिंह के गले में अपने पुत्र चंदन की माला पहनाकर, चंदन बनाकर दूर सुरक्षित स्थान पर चली गई। और सेवक वारी भी दुखी मन से अपने घर चला गया।
रात्रिजगाम नामक नवें सर्ग में पन्ना उदय सिंह को लेकर रात भर किसी सुरक्षित आश्रय को तलाशती हुई भटकती रही। उदय सिंह भूख-प्यास से व्याकुल हो रहा था। धाय मां पन्ना ने किसी तरह से पानी पिलाकर उदय सिंह की प्यास बुझाई और रात भर की भय-सीमा को पार करके, वह कमल मीर के राजा आशाशाह, जो राणा संग्राम सिंह के मित्र थे, उनके यहां आश्रय लिया। राजा आशाशाह पन्ना की बलिदान कथा को सुनकर बहुत द्रवित हुआ। उसने कहा, इतिहास तुम्हारा बलिदान कभी नहीं भूलेगा। तुम्हारा गौरवगान करेगा। तुम्हारे जीवन से धरती को लोककल्याणभाव की प्रेरणा मिलेगी, जो जनमानस को आनंद का रस प्रदान करेगी। शिशु उदय सिंह के पिता का मुझ पर बहुत उपकार है और उस उपकार को ध्यान में रखते हुए मैं शिशु उदय सिंह की रक्षा के भार का वहन करूंगा। उदय सिंह चित्तौड़ के नरेश होंगे। रात बीत गई है, अब उसका संकट काल व्यतीत हो चुका है। अस्तंगतश्चन्द्रमा नामक दसवें सर्ग में चित्तौड़ के महामंत्री कर्मचंद, जो कि एकमात्र चित्तौड़ को सुरक्षित रखने वाले बचे हैं, वह वनवीर को सुधारने का उपदेश देते हैं, परंतु वनवीर उनका भी वध करवा देता है।
अगले रविरुदेति नामक सर्ग में राजा आशाशाह ने धात्री पन्ना के साथ नृपपुत्र उदय सिंह की रखवाली की और उसने सिंहपुत्र उदय के हाथ में तलवार ग्रहण करा दी। उदय सिंह नदी के तट पर युद्ध में पारंगत हो गया। उसके हृदय में शूरभाव जागृत हो उठा। वनवीर के राक्षसी स्वभाव ने सचिवप्रधान कर्मचंद का वध करवा दिया। यह समाचार वायु की भांति सचिवों और सामंतों में वनवीर के प्रति विद्रोह के रूप में जागृत हो गया। उदय सिंह जीवित है, यह सुनकर कर्मचंद्र के पुत्र जय सिंह के अधीर मन को धैर्य प्राप्त हुआ। राजा उदय सिंह और जय सिंह ने मिलकर चित्तौड़ के शत्रु वनवीर से अपने राज्य को सुरक्षित बनाने का दृढ़ निश्चय किया। उदय सिंह जीवित है, यह जानकर वनवीर के अंदर भय का भूचाल आ गया।
‘‘अंबरे जुगञ्ज जयत्युदयः सेनानादः, कृत्वासमर्पणमभवद् वन्दी मनुजादः।
वनवीरमुदयसिंहो युद्धेन विना व्यजयत, पन्नाकृपया नाहरज्जीवनं, रिपुमदयत।।’’7
सूर्योदय वेला में उदय सिंह सिंहासन पर आसीन हो गया। पन्ना ने राजपुत्र के मस्तक पर मुकुट शोभित किया। उसने उदय सिंह की आरती उतारी और सम्मान प्राप्त किया। उसका पुत्र उदय सिंह राणा हो गया। उसका बलिदान सार्थक हो गया। पन्ना ने वनवीर से कहा, तुम्हारे सत्ता-लोभ को धिक्कार है, जो हिंसा करता है। संसार के मन को अशांति प्रदान करता है। पश्चाताप करो, जीवित रहो, निर्जन स्थान में चले जाओ। विक्रम और चंदन का बलिदान बदले की इच्छा नहीं करता है।
इस महाकाव्य में पन्ना अपने पुत्र चंदन के मूल्य पर उदय की रक्षा करती है। राष्ट्र के कल्याण के लिए अपने हृदय के टुकड़े का बलिदान अपने आंखों के समक्ष देखती है। यही करुण रस हृदय पर गहरा प्रभाव छोड़ता है और यही इसका प्रधान रस है-
‘‘हा स्फुटतु धरा विलपति दीना, हा कथं भवाम्यन्तर्लीना।।’’8
यह काव्य लक्षणामूला व्यंजना से युक्त है। इसमें काकु वक्रोक्ति से युक्त निम्न पंक्तियों में दिखता है -
‘‘करोषि भूपाऽन्यवयगौरवाय, त्वं चंचलाम कामुकबाहुपाशे।
दत्ते तमो मानसतर्पणाय, प्रगाढ़रङ्गं मदिराप्रकाशे।।’’9
चतुर्थ सर्ग में कवि ने प्रकृति का अत्यंत सुंदर चित्रण किया है -
‘‘आसीन्मयूररसकुण्डे, तरलीकृतसितप्रकाशः।
उत्थितैर्मयूखतरंङ्गै, रस्पृश्यत नीलाकाशः।।’’10
संदर्भ सूची
1. रात्रिर्गमिष्यति प्रथम सर्ग - श्लोक 123
2. रात्रिर्गमिष्यति चतुर्थ सर्ग - श्लोक 148
3. रात्रिर्गमिष्यति षष्ठ सर्ग - श्लोक 125
4. रात्रिर्गमिष्यति षष्ठ सर्ग - श्लोक 132
5. रात्रिर्गमिष्यति सप्तम सर्ग - श्लोक 4
6. रात्रिर्गमिष्यति अष्टम सर्ग - श्लोक 6
7. रात्रिर्गमिष्यति एकादश सर्ग - श्लोक 10
8. रात्रिर्गमिष्यति सप्तम सर्ग - श्लोक 14
9. रात्रिर्गमिष्यति प्रथम सर्ग - श्लोक 4
10. रात्रिर्गमिष्यति चतुर्थ सर्ग - श्लोक 8
11. रात्रिर्गमिष्यति - डाॅ. रामशंकर अवस्थी
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