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झारखण्ड के जनजातीय लोकगीतों का महत्व - निक्की डिसूजा

शोध सारांश

भारतीय संस्कृति में जनजातीय समुदायों ने अपनी अलग पहचान बनाए रखी है। जहाँ लोग अपनी संस्कृति को अंधविश्वास का नाम देकर लोकसंस्कृति पर संकट उत्पन्न कर रहे हैं, वहीं झारखण्ड हर्षपूर्वक अपनी संस्कृति का पालन करता आ रहा है। बढ़ते शहरीकरण जहाँ मनुष्य को उसकी जड़ों से दूर कर रहे हैं, झारखण्ड ने अपनी पारंपरिक संस्कृति को न केवल संरक्षित किया, अपितु उसे अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए भी जीवित रखा है। झारखण्ड अपनी खनिजों से परिपूर्ण तो है, किंतु इसकी अपनी सांस्कृतिक पहचान है, जो अन्य स्थानों से इसे भिन्न बनाती है। झारखण्ड के लोकगीतों में बसते हैं, उनके पूर्वजों द्वारा दिए गए संस्कार और प्रकृति के प्रति समर्पित उनका प्रेम। लोकगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि जनजातीय समाज का इतिहास, संस्कृति, जीवन-दर्शन, सामाजिक संबंधों का विस्तार इन गीतों में है। झारखण्ड में एक कहावत है-‘‘जेके गीत से प्रीत नइ, सेकर बात कर थीत नइ।’’ अर्थ यह है कि जिसे संगीत से प्रेम नहीं, उसकी बात का भरोसा नहीं। जिनकी कहावतों में भी गीत की मिठास हो, भला उनका जीवन बिना लोकगीतों के कैसे संभव हो सकता है। झारखण्ड में निवास कर रहे हो, संथाल, मुंडा, बिरहोर, खड़िया, असुर, उराँव तथा अन्य जातियों के लोकगीतों से यह राज्य विद्यमान है। लोकगीत का प्रचलन प्राचीन काल से ही है। जन्म, विवाह, कृषि, त्योहार आदि अवसरों पर सामूहिक रूप में गाया जाता है। अतः झारखण्डी परंपरा और जनजातीय जीवन में लोकगीत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
बीज शब्द: झारखण्ड, जनजातीय, लोकगीत, संस्कृति, प्रकृति, पहचान, सामाजिक, समुदाय।

 The Significance of Tribal Folk Songs of Jharkhand
-Nikee Disuja
 Research Scholar
Department of Hindi
University of Ranchi, Ranchi
Abstract
Tribal communities have maintained a distinct identity within Indian culture. At a time when many people label indigenous traditions as superstition and thereby create challenges for folk culture, Jharkhand continues to preserve and celebrate its cultural heritage with pride. While increasing urbanization is distancing people from their roots, Jharkhand has not only safeguarded its traditional culture but has also ensured its transmission to future generations. Jharkhand is rich in mineral resources; however, its unique cultural identity distinguishes it from other regions. The folk songs of Jharkhand embody the values inherited from ancestors and reflect the deep affection and devotion of tribal communities toward nature. Folk songs are not merely a means of entertainment; they serve as repositories of tribal history, culture, philosophy of life, and social relationships. A popular saying in Jharkhand states: “Jeke geet se preet nai, sekar baat kar theet nai.” This means that a person who does not appreciate music cannot be considered trustworthy. In a society where even proverbs carry the sweetness of song, it is impossible to imagine life without folk music. The cultural existence of Jharkhand is enriched by the folk traditions of communities such as the Santhal, Munda, Birhor, Kharia, Asur, Oraon, and many other tribal groups. The tradition of folk songs has existed since ancient times. These songs are performed collectively on occasions such as birth ceremonies, marriages, agricultural activities, and festivals. Therefore, folk songs occupy a vital place in Jharkhandi tradition and tribal life, functioning as an essential medium for preserving cultural values, collective memory, and community       identity.
Keywords: Jharkhand, Tribal Communities, Folk Songs, Culture, Nature, Identity, Society, Community.

मूल शोध आलेख

लोकगीत किसी भी समाज की सांस्कृतिक चेतना, परंपरा और सामूहिक जीवन का दर्पण होते हैं। झारखण्डी लोकगीत विशेष रूप से जनजातीय जीवन, प्रकृति-प्रेम, उत्सव, श्रम, भावनाओं को अभिव्यक्त करते हैं। प्राकृतिक संपदा से परिपूर्ण झारखण्ड राज्य, जो न केवल जंगलों, पहाड़ों, नदियों, झरनों, खनिजों के कारण, अपितु अपनी सांस्कृतिक धरोहर के लिए भी विशिष्ट है। झारखण्ड की संस्कृति की व्याख्या किसी शब्द की मोहताज नहीं है। भारत में कई राज्य वर्तमान समय में ऐसे हैं, जो बढ़ते शहरीकरण को स्वीकार करते हुए, अपनी संस्कृति-परंपरा को भूलते जा रहे हैं। परंतु वर्तमान समय में कुछ सीमित क्षेत्रों ने अपनी संस्कृति को संजोए रखा है, उन्हीं राज्यों में से एक राज्य झारखण्ड है, जिसने सदियों से अपनी सांस्कृतिक सभ्यता को संजोए रखा है। वर्तमान समय में भी झारखण्ड के जनजातियों के लिए लोकगीतों का उतना ही महत्व है, जितना पूर्वकाल में हुआ करता था। जनजातीय समुदाय अपनी सांस्कृतिक धरोहर को अपनी आने वाली पीढ़ी को समर्पित कर रहे हैं।

लोकगीत जनजातीय और गैर-जनजातीय दोनों समुदायों की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के महत्वपूर्ण माध्यम हैं। यद्यपि दोनों समुदाय सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से भिन्न हैं, तथापि लोकगीतों के माध्यम से उनके मध्य किसी प्रकार का भेद स्पष्ट रूप से परिलक्षित नहीं होता। लोकगीत मानवीय संवेदनाओं, सामूहिक चेतना तथा सांस्कृतिक समन्वय को अभिव्यक्त करते हैं, जिसके कारण वे समुदायों के मध्य सांस्कृतिक सेतु का कार्य करते हैं। ‘‘लोकगीतों का विषय-विस्तार ‘लोक’ का समस्त व्यक्त जीवन है। जीवन का कोई ऐसा पक्ष छूटा हुआ नहीं मिलता, जिस पर लोक मौन हो। जितना भी विस्तृत और व्यापक ‘लोक’ है, उतनी ही सूक्ष्म व्याख्या की गई है लोक-जीवन की।’’1

मुंडारी संस्कृति में एक प्रसिद्ध उक्ति है-‘‘सेन गे सुसुन, कजि गे दुरंग।’’ ‘‘एकना दिम तोकना, कत्थादिम डंडी’’ जिसका अर्थ होता है, चलना ही नृत्य है और बोलना ही गीत हैं। इस उक्ति से अनुमान लगाया जा सकता है कि जिन्होंने बोलने को ही गीत मान लिया है, वे जनजातीय समुदाय अपनी संस्कृति का संरक्षण कितनी सावधानीपूर्वक करते आ रहे होंगे। लोकगीत उन गेय पदों को कहा जा सकता है, जिनका मौखिक रूप से हस्तांतरण होता रहा है। इस विषय पर डाॅ. सत्येन्द्र लिखते हैं- ‘‘लोक-गीतों में लोक-मानस का जितना आवेग पूरा होगा, उतना ही लयात्मक गीत हृदय से उत्पन्न होगा। इन गीतों में लोक-मानस की प्रवृत्ति के अनुसार एक विचित्र प्रभाव उत्पन्न होता है, जिसका केवल अनुभव किया जा सकता है, अभिव्यक्त नहीं, क्योंकि इनमें मानवीय भावना की आदि-परंपरा एवं प्रकृति निहित होती है और टोने-टोटके की भाँति समय-समय पर व्यवहृत की जाती है।’’2 लोकगीत केवल मनुष्य के मनोरंजन का साधन नहीं है, लोकगीतों में सम्पूर्ण समुदाय की सामूहिकता, सांस्कृतिक अनुभव तथा उनके पूर्वजों की उपस्थिति अंतर्निहित रहती है, जिन्हें जनजातीय समुदाय ‘बोंगा’ (देवता) के रूप में मान्यता प्रदान करता है।

लोकगीतों में प्रकृति के सौंदर्य का वर्णन होता है। सरहुल में गाए गए गीतों में सरई (शालवृक्ष) की महक और जनजातीय समुदाय का वृक्ष के प्रति स्नेह, करमा पर्व के गीतों में भाई-बहन का अटूट प्रेम छिपा होता है, फगुआ के गीतों में हर्ष-उल्लास होता है, वहीं सोहराई पूजा के गीतों में जनजातीय लोगों को अपने मवेशियों के प्रति आभार झलकता है, जिन्हें वे गीतों के माध्यम से अपनी भावनाओं को प्रकट करते हैं। ‘‘किसी भी समुदाय के लोकगीत उन गेय पदों को कहते हैं, जो उसमें प्रचलित रागों में बँधकर सामान्यतः पूरे समुदाय द्वारा अपना लिया जाता है और अक्सर परंपरा में काफी समय तक चलते रहते हैं।’’3 सामान्य रूप में देखें तो लोकगीत अशिक्षित समाज अथवा प्राचीन अवस्था की देन है, जो पूर्वजों द्वारा विकसित हुई, जिन्होंने अपनी भावनाओं को गीतों के माध्यम से व्यक्त किया और जिसका बदलता हुआ स्वरूप वर्तमान में भी आने वाली पीढ़ी को मिल रहा है। वीर भारत तलवार लोकगीत के लिए लिखते हैं-‘‘जब समाज में सुस्पष्ट वर्ग-विभाजन हो जाता है, तो लोकगीतों की रचना और उनका चलन भी वर्गों के अंदर सीमित हो जाता है। लोकगीत का आधार लोक की भावना ही है।’’⁴

झारखण्डी लोकगीत कई भाषाओं, ऋतुओं और पर्व-त्यौहारों पर आधारित हैं। सामान्यतः भाषाओं की बात करें तो विभिन्न प्रकार की भाषाओं का प्रयोग झारखण्ड राज्य में होता आ रहा है। जैसे दृ मुंडारी, खड़िया, पंचपरगनिया, संथाली, नागपुरी, बिरहोर, हो आदि। भिन्न-भिन्न जनजातीय समुदायों की अपनी भाषा होती है। ऋतु और पर्व-त्यौहार के गीत पारस्परिक सामंजस्य एवं सौहार्दपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना सिखलाते हैं। लोकगीतों की परंपरा क्रम वर्ष निरंतर बनी रहती है, चाहे सरहुल हो, करमा हो, सोहराई हो, फगुआ हो, किसी का विवाह हो, जन्म आदि होता हो। ‘‘आदिवासियों का आदि-धर्म उनके जीवन जीने का नियम है। इनके देवता इनके संग उठते-बैठते हैं। वे पेड़ों के पार नहीं रहते, वे धरती के बाहर भी नहीं रहते। इनके इन आस्था-गीतों से जाहिर होता है कि ये देवता की पूजा नहीं, उससे वार्ता करते हैं।’’⁵

जनजातीय लोगों के लिए लोकगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, अपितु वे जनजातीय समुदाय के जीवन-दर्शन, सांस्कृतिक चेतना तथा जीवन-यापन की आधारभूमि के रूप में प्रतिष्ठित हैं। जिस प्रकार झारखण्ड की भाषा विभिन्न प्रकार की है, ठीक उसी तरह से लोकगीतों में उपयोग होने वाले वाद्ययंत्र भी भिन्न-भिन्न प्रकार के हैं, जो लोकगीतों को अन्य क्षेत्रों से पृथक बनाते हैं। झारखण्ड के लोकगीतों में उपयोग किए जाने वाले वाद्ययंत्र हैं- ढाँक, नगाड़ा, तीनतारा, भुआड़ा, मुरली, मंदार, ढोल, भेइर, संखवा, ठेचरा, केदरा आदि उल्लेखनीय हैं। झारखण्ड में किसी जनजातीय समुदाय में विवाह हो या जन्मोत्सव हो, बिना नगाड़ा के कार्यक्रम सम्पन्न होना संभव नहीं है।

झारखण्डी लोकगीतों को कई वर्गों में विभाजित किया गया है, किंतु उनके वर्गीकरण के विषय में विद्वानों के मध्य मतभेद हैं। इसी विषय पर सत्यव्रत अवस्थी ने अपने विचार प्रस्तुत किए हैं- ‘‘लोक एक अविभाजन संज्ञा है, अतः यथार्थ अर्थों में लोक-गीतों का वर्गीकरण नहीं किया जा सकता है।’’⁶ सामान्यतः झारखण्डी लोकगीत को कई वर्गों में विभक्त किया जा सकता है, जैसे-

1. संस्कार गीत
2. पर्व-त्यौहार गीत
3. ऋतु गीत
4. आखेट गीत
5. अन्य गीत

1. संस्कार गीत  

मनुष्य जीवन जन्म से लेकर मृत्यु तक विभिन्न प्रकार के संस्कारों से होकर गुजरता है। झारखण्ड की सांस्कृतिक परम्परा में भी संस्कारों को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है, यद्यपि उनका स्वरूप अन्य क्षेत्रों से भिन्न दिखाई देता है। जन्म-संस्कार से लेकर विवाह-संस्कार तक, जनसमुदाय लोकगीतों से अपनी भावनाएँ, अनुभूतियाँ तथा सांस्कृतिक मान्यताओं की अभिव्यक्ति करता है। ये लोकगीत सामाजिक परंपरा एवं सांस्कृतिक अस्मिता के संवाहक भी हैं। उदाहरण के लिये संताली समुदाय जन्म, जिसे संताली लोग ‘निम दाः माडी’ एवं ‘होलोड. दाः इरची’ कहा जाता है -

  ‘‘तोकोयाः राचा रे दाः भुम्बुकोः
दाः भुम्बुकोः माना चावले बोहेलोः
फालनावाक राचा रे दाः भुम्बुकोः
दाः भुम्बुकोः माना चावले बोहेलोः’’7

ये छाटयार गीत है, जिसका अर्थ कुछ इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है-किसके घर-आँगन में पानी का फव्वारा फूट रहा है अर्थात पानी छिड़क रहा है। इसी गीत के माध्यम से शिशु का नामकरण संस्कार किया जाता है।

2. पर्व-त्यौहार गीत  

झारखण्ड की जनजातीय संस्कृति-परम्परा में पर्व-त्योहारों का विशेष महत्व है। अपनी विविध सांस्कृतिक परम्परा के लिए भारत विश्वविख्यात है तथा झारखण्ड भी इसी सांस्कृतिक समृद्धि का महत्त्वपूर्ण अंग है। यहाँ विभिन्न जनजातीय समुदाय वर्ष भर उत्सव का आयोजन करते हैं।

झारखण्ड में पर्व-त्योहारों का क्रम आखाॅइन जतरा से आरंभ होता है, जिसे जनजातीय समुदाय नववर्ष के रूप में मनाते हैं। इसके पश्चात करमा पर्व आता है, जिसमें गीतों के माध्यम से भाई-बहन के पारस्परिक प्रेम और सम्मान की भावना अभिव्यक्त की जाती है। सोहराई पर्व में जनजातीय समुदाय अपने पशुधन की पूजा कर प्रकृति एवं जीव-जगत के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। वहीं सरहुल झारखण्ड का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रकृति-पर्व है। इस पर्व में सरई (शाल वृक्ष) की पूजा की जाती है। सरई वृक्ष जनजातीय लोगों को दिनचर्या के लिए महत्वपूर्ण सामग्री प्रदान करता है। शाल की टहनियाँ, जिन्हें जनजातीय समुदाय दातून के रूप में उपयोग करते हैंय शाल वृक्ष के पत्ते, जिन्हें पत्तल के रूप में प्रयोग कर खाना खाते हैंय इसके तने को ईंधन के रूप में प्रयोग कर खाना पकाया जाता है। इसके बीज से निकलने वाले तेल को खाना बनाने के लिए उपयोग में लाया जाता है। इसलिए शाल वृक्ष को जनजातीय समुदाय देवता की तरह पूजते हैं, क्योंकि जनजातीय समाज पूर्ण रूप से प्रकृति पर निर्भर करता है। सरहुल पर्व में पूजा के बाद शाल वृक्ष के फूलों को जनजातीय समुदाय घरों के दरवाजे पर और महिलाएँ अपने जूड़े में आशीर्वाद और मंगल-प्रतीक के रूप में धारण करती हैं। इन पर्वों से संबंधित लोकगीत जनजातीय जीवन-दर्शन, प्रकृति-प्रेम तथा सामुदायिक एकता के सशक्त प्रतीक हैं। उक्त संदर्भ में सरहुल पर्व का एक लोकगीत उदाहरणस्वरूप प्रस्तुत है-

‘‘एन्दर पूँपन में झरेकी दईया
बन बरहा बेसे लपकारकी बरआ लगदी
नौर पूंपन में झेरकी दईया
बन बरहा बेसे लवकारकी बरआ लगदी।’’8

यह कुडुख लोकगीत है। इस गीत को सरहुल के उत्सव में गाया जाता है। इस गीत का अर्थ है कि महिलाएँ अपने जूड़े में शाल वृक्ष के फूलों को लगाती हैं तथा नृत्य करती हैं और वे महिलाएँ वन के किसी फूल की भाँति खिली हुई लगती हैं। इन पंक्तियों में वन की खूबसूरती और ताजगी समाहित है।

3. ऋतु गीत 

ऋतुओं के परिवर्तन होने से वृक्षों और प्रकृति में परिवर्तित रूप स्पष्ट दिखाई पड़ता है। प्रकृति में नवीन कोमलता और मिठास भरती है। उसी प्रकार ऋतु परिवर्तन मानव-हृदय में पुलक और उत्साह उत्पन्न करता है। चारों दिशाओं की हरियाली मानव-हृदय में उमंग भरती है, जिससे आनंद की अनुभूति होती है। गर्मियों में आम वृक्ष पर लदा हुआ मंजर वातावरण में मिठास लाता है। कोयल की कूक के साथ मनुष्य स्वयं को फगुआ गाने से रोक नहीं पाते हैं। इन गीतों में फाल्गुन-चैत की मस्ती और प्रकृति के बदलाव से जुड़ी भावनाएँ होती हैं। बाहा गीत (संथाली समुदाय) द्वारा गर्मी ऋतु में चैत-वैशाख के समय गाया जाता है।

4. आखेट गीत  

आदिकाल से ही जनजातीय समुदाय शिकार पर आश्रित रहते थे, किंतु वर्तमान समय में आधुनिक परिवर्तनों के प्रभाव से आखेट की परम्परा धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। अपनी संस्कृति को वर्तमान समय में भी सुरक्षित रखने के लिए जनजातीय समुदाय सीमित क्षेत्रों में शिकार खेलते हैं, जिसे जनी शिकार, बिशू सेंदरा और फागु सेंदरा के रूप में वर्तमान समय में देखा जा सकता है। उक्त संदर्भ में बिरहोर जनजाति द्वारा एक लोकगीत उदाहरणस्वरूप प्रस्तुत है-

  ‘‘आओ चलें ‘खरहे’ का शिकार करने
जा रहा हूँ जंगल कांही पर लादे जाल
पहाड़ी पर जाऊँगा
मधुमक्खी का छत्ता काटूँगा
जंगल की लाल मुर्गी पकड़ूँगा
अपनी ‘खूजी’ में डाल।’’9

इस गीत के माध्यम से बिरहोर जनजाति अपने द्वारा वनों में शिकार करने की प्रक्रिया का वर्णन कर रही है, जिसका शिकार कर जनजातीय लोग उन्हें बाजार में बेचकर अपने परिवार के लिए खाद्य सामग्री जुटाएँगे और जरूरत की वस्तुएँ खरीदेंगे।
इसी संदर्भ में एक कुड़मली गीत प्रस्तुत है-

‘‘मानुस जनम झींगा फूल रे भाई
साइझे फूटे, बिहाने झड़ी जाइ
ताउ फूल नाये-हँसे
पिरथिबिक भालो बांसे
जायके खने कांदेड निरे भाई।’’10

उक्त पंक्तियों में मानव जीवन की तुलना झींगा के फूल से की गई है, जो संध्या समय में खिलता है और सुबह झड़ जाता है, फिर भी वह खुश रहता है, हँसता, नाचता और गाता है। इस गीत को समूह के साथ वनों-जंगलों की लंबी यात्रा के दौरान गाया जाता है।

5. अन्य गीत  

झारखण्ड के वे गीत, जिन्हें गाने के लिए विशेष अवसर की आवश्यकता नहीं होती है। जिन गीतों को किसी भी अवसर पर गाया जा सकता है। उदाहरण के लिए मुंडारी प्रेम गीत प्रस्तुत है-

‘‘तीरे सकोम बोः रे मोरे होटोः रे मन्दुली सम
एला रे दोला रे तीरे सकोम पोला सड़ि तना रे।
कदल दरू लेका रुकु-रुकु रुकुम सेनाकदा
एला रे दोला रे समड़ोम समयः तना रे।
किचिर तदम निलो सड़ि पयला तदम कुइलो सड़ि
एला रे दोला रे सेना कदम नेल कोयोः तन रे।’’11

इस गीत में मुंडा प्रेमी लड़की के श्रृंगार और उसकी सुंदरता का वर्णन कर रहा है। उसके हाथ की चूड़ी, नीले रंग की साड़ी, उसके चलने का तरीका और लड़की की चंचल आँखों का वर्णन किया गया है।

निष्कर्ष  

जहाँ बढ़ते शहरीकरण और आधुनिकता ने युवा वर्ग को प्रभावित कर उन्हें अपनी जड़ों से दूर कर दिया है, वहीं वर्तमान समय में भी झारखण्ड के जनजातीय समुदायों ने अपने पूर्वजों की धरोहर को संरक्षित रखा है और अपनी पारंपरिक संस्कृति का संचार कर रहे हैं। इनके लोकगीतों में प्रकृति के प्रति आस्था और श्रद्धा है, इनके गीतों में जनजातीय समुदाय का अस्तित्व है। झारखण्ड के लोकगीत ऋतु के अनुसार, श्रम के अनुसार, उत्सव के अनुसार और आनंद की अनुभूति प्रदान करते हैं, जो समय, पहर और अवसर पर आधारित हैं। ये लोकगीत कभी नृत्य करते समय, कभी वाद्ययंत्रों के साथ, कभी समूह में तो कभी अकेले राह चलते समय भावनाओं को व्यक्त करते हैं। झारखण्ड के रीति-रिवाजों तथा परम्पराओं पर आधारित ये गीत जनजातीय जीवन के महत्वपूर्ण अंग हैं। इनके गीतों में एकता की भावना और पूर्वजों के प्रति समर्पण झलकता है।

संदर्भ सूची 

1. डाॅ. रामनिवास शर्मा, लोक साहित्य का लोकतत्व, निर्मल प्रकाशन, 2003, पृष्ठ संख्या-132।
2. लोक साहित्य विज्ञान, डाॅ. सत्येन्द्र, 1971, पृष्ठ संख्या-306।
3. झारखण्ड के आदिवासी के बीच नोट्स, वीर भारत तलवार, भारतीय ज्ञानपीठ, 2008, पृष्ठ संख्या-190।
4. झारखण्ड के आदिवासी के बीच नोट्स, वीर भारत तलवार, भारतीय ज्ञानपीठ, 2008, पृष्ठ संख्या-190।
5. आदिवासी स्वर और नयी शताब्दी, रमणीका गुप्ता, वाणी प्रकाशन, 2002, पृष्ठ संख्या-127।
6. साहित्यकार, सत्यव्रत अवस्थी, 1955।
7. झारखण्ड इनसाइक्लोपीडिया, खंड 4, सुधीर पाल, वाणी प्रकाशन, 2019, पृष्ठ संख्या-445।
8. डाॅ. नारायण भगत, कुडुख साहे डण्डी, भाग 1, झारखण्ड झरोखा, प्रथम संस्करण, 2017, पृष्ठ संख्या-39।
9. आदिवासी स्वर और नयी शताब्दी, रमणीका गुप्ता, वाणी प्रकाशन, 2002, पृष्ठ संख्या-124।
10. झारखण्ड इनसाइक्लोपीडिया, खंड 4, सुधीर पाल, वाणी प्रकाशन, 2019, पृष्ठ संख्या-238।
11. झारखण्ड के आदिवासी के बीच नोट्स, वीर भारत तलवार, भारतीय ज्ञानपीठ, 2008, पृष्ठ संख्या-192।


-निक्की डिसूजा
शोधार्थी, हिंदी विभाग
 राँची विश्वविद्यालय, राँची
 E-mail: disujanikee@gmail.com
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