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मानवीय मूल्य और जिजीविषा की कहानी ‘माया का मर्म’ - डॉ. साक्षी

शोध सारांश

यह शोध आलेख निर्मल वर्मा की प्रसिद्ध कहानी ‘माया का मर्म’ का नई कहानी आंदोलन, मानवीय मूल्यों तथा जिजीविषा के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन का उद्देश्य आधुनिक जीवन की जटिलताओं, बेरोजगारी, अस्तित्वगत संकट, अकेलेपन तथा मनोवैज्ञानिक तनावों के बीच मानवीय संवेदना और जीवन-आस्था के पुनस्र्थापन को समझना है। आलेख में स्पष्ट किया गया है कि निर्मल वर्मा यथार्थ और यूटोपिया के कलात्मक समन्वय के माध्यम से व्यक्ति के अंतर्मन में निहित आशा, आत्मबोध और जीवन-ऊर्जा को उद्घाटित करते हैं। कहानी का नायक निराशा और अवसाद से गुजरते हुए एक मानवीय संबंध के प्रभाव से जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टि प्राप्त करता है। यह अध्ययन मनोवैज्ञानिक, अस्तित्ववादी तथा नई कहानी की आलोचनात्मक दृष्टियों के आलोक में दर्शाता है कि आधुनिक सामाजिक विघटन के बावजूद मानवीय मूल्य और जिजीविषा समाप्त नहीं होते, बल्कि संवेदनात्मक अनुभवों के माध्यम से पुनः सक्रिय होकर व्यक्ति को जीवन के प्रति नई आस्था और अर्थबोध प्रदान करते हैं।
बीज शब्द: निर्मल वर्मा, नई कहानी आंदोलन, माया का मर्म, मानवीय मूल्य, जिजीविषा, अस्तित्वबोध, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण, यथार्थ, यूटोपिया, आधुनिक जीवन-बोध।

 The Story of Human Values and the Will to Live in ‘Maya Ka Marm’   

-Dr. Sakshi
Department of Hindi
Hindu College, University of Delhi, Delhi
Abstract

This research paper examines Nirmal Verma’s celebrated short story ‘Maya Ka Marm’ from the perspectives of the ‘‘Nai Kahani (New Story) Movement’’, human values, and the will to live. The study aims to explore the restoration of human sensitivity and faith in life amid the complexities of modern existence, unemployment, existential crisis, loneliness, and psychological distress. It argues that Nirmal Verma employs a creative synthesis of reality and utopia to reveal the hope, self-awareness, and inner vitality embedded within the human psyche. As the protagonist moves through despair and emotional isolation, a meaningful human relationship transforms his perception of life and enables him to rediscover optimism and purpose. Drawing upon psychological, existential, and Nai Kahani critical perspectives, the study demonstrates that despite the fragmentation and alienation of modern society, human values and the will to live do not diminish. Rather, they are revitalized through profound human experiences, ultimately offering individuals renewed hope, existential meaning, and a deeper understanding of life.

Keywords: Nirmal Verma, Nai Kahani Movement, Maya Ka Marm, Human Values, Will to Live, Existential Consciousness, Psychological Analysis, Reality, Utopia, Modern Consciousness.

शोध आलेख

नई कहानी आंदोलन मुख्यतः परंपरागत कथावस्तु और पद्धति से हटकर कहानी में नए संवेद्य और शैली के नए प्रयोग को लेकर प्रयासरत रहा। एक सामान्य से दिखाने वाले तथ्य को अलग-अलग कोणों से प्रभावी लोगों से जोड़ा जाता था। ‘‘‘नयी कहानी’ में स्थूल कथानकों के स्थान पर सूक्ष्म कथा-तंतुओं को प्रधानता मिली, सांकेतिकता, प्रतीकात्मकता और बिंबात्मकता का प्राधान्य हुआ।’’1 साहित्य में तब व्यक्तिवादी, मनोवैज्ञानिक और समाज के बदलावों को दिखाने वाली कहानियों से कथ्य व शिल्प प्रस्तुत किया गया और सत्य के नए पक्ष उजागर किए गए, जिस ओर नए कहानी से पहले विरले ही ध्यान दिया गया। ऐसा भी तर्क है कि तत्कालीन साहित्य में नई कविता का जन्म हो चुका था। उसी तर्ज पर नई कहानी का भी विचार सामने आया। ‘‘कविता और कहानी छायावादोत्तर काल को केंद्रीय विधाएँ रही हैं, जिनको लेकर बहुत-से साहित्यिक आंदोलन हुए, गोष्ठियाँ हुईं और पत्र-पत्रिकाओं के विशेषांक निकले। इसका मुख्य कारण यह है कि इन दोनों ने समकालीनता को गहरे अर्थ में रेखांकित करने का प्रयास किया और जीवन की जटिलताओं को उनकी समग्रता में आँकने की कोशिश की। नयी कविता के वजन पर कहानी को भी ‘नयी कहानी’ कहा जाने लगा... छायावाद-युग के अनंतर हिंदी कहानी में आरंभ में प्रगतिवादी और व्यक्तिवादी प्रवृत्तियाँ दिखायी दीं।’’2 

गौरतलब है कि निर्मल वर्मा की कहानियाँ इस आंदोलन के मूल लक्ष्यों को पूरी तरह प्रतिबिंबित करती हैं। उन्होंने व्यक्तित्व की जटिलताओं, आधुनिक जीवन में अकेलापन, और सामाजिक असमानताओं को गहराई से उकेरा। समसामयिक परिस्थिति में व्यक्ति किन मानसिक दबावों से जूझता है, उसे स्थान-स्थान पर दिखलाया। ‘‘निर्मल वर्मा के लिए ‘नई कहानी’ आंदोलन नहीं है-भीतर की तड़प को, अँधेरे को उजाले में लाने की ‘प्रेरणा’ है। न कोई प्रतिबद्धता है, न किसी प्रयोग का आग्रह। निर्मल वर्मा ने ‘प्रयोगवाद’ तथा ‘नई कविता’ के आंदोलन को नई हवा का नया रूप और रुख देकर प्यार किया है।’’3 

निर्मल वर्मा नई कहानी के दौर में उभरे कलाकार हैं। उनकी लेखनी में प्रवास-जनित भाव, भारतीय जुड़ाव, संवेदनशील नागरिक और एक सतर्क रचनाकार स्पष्ट परिलक्षित होता है। उनकी लेखनी में आम भारतीय मानव की पीड़ाएँ, संवेदनाएँ व जिजीविषाएँ, जो बदलते हुए दौर में भारत को प्रभावित कर रही हैं, मिलती हैं। प्रत्येक रचना पर लेखक के स्व से जुड़े अनुभवों का विशेष महत्व होता है। निर्मल वर्मा का अनुभूति-संसार भारत से लेकर विदेश की भूमि तक फैला था। समय व स्थितियों को लेकर एक तुलनात्मक पक्ष एक सहृदय लेखक की दृष्टि में बस जाता है। निर्मल वर्मा में आधुनिकता की तर्ज पर नए मानव के जीवन की विडंबनाओं और अंतर्द्वन्द्वों को समझा है। ‘‘उनके विदेश के अनुभवों में अकेलापन, अलगाव, आत्मकेन्द्रित मनुष्य, आत्मनिर्वासन, उदासी-अवसाद-पीड़ा, नर-नारी के बीच का खालीपन तथा पश्चिम जगत् के अन्य का जो परिचय हिन्दी पाठक ने पाया है-वह हमें पश्चिमी सभ्यता-संस्कृति और आधुनिकता के प्रति सचेत रहने की दृष्टि देता है।’’4

‘माया का मर्म’ कहानी भी ऐसा ही संवेगपूर्ण बिंब दिखाती है। नगरीय जीवन और उसके तनावों में जीवन तो लगभग ठेलता निराश और हताश पुरुष कहानी में दीखता है। एक शिक्षित परंतु बेरोजगार व्यक्ति का धुंधलाता जीवन किस अनिश्चितता से घिरा है और जीवन की उर्वरता को नष्ट कर रहा है, यह क्षोभग्रस्तता कहानी के आरम्भ में ही सूचित हो जाती है। लेखक ने स्वयं पात्र के मुँह से अधिक न बुलवाकर दीवारों की सीलन, धब्बों और अंधेरे से व्यक्ति के मन को दर्शाने का प्रयास किया है। ‘‘कल रात मेह बरसा था। अब सिर्फ बूँदाबांदी हो रही है। छींटे भूले-भटके से उड़ आते हैं, मेज की किताबों, पुरानी चिथड़ी दरी, पलंग के घुन खाए पायों पर बिखर जाते हैं। खिड़की बन्द फिर भी नहीं कर पाता। जो अँधेरा रात को टिक गया था, वह अब बासी मटियालापन बनकर कोनों की सीलन में सिमट गया है। दिन के समय लालटेन जलाता हुआ मैं इस उम्र में भी कतराता हूँ-जाने क्यों भीतर कुछ रुआँ-सा घुटने लगता है। लगता है, घर में कोई मर गया हो, सफेद पुतलियाँ दीवार में पथराई-सी झाँक रही हों...। शायद बचपन में कभी माँ ने कहा होगा। लेटे-लेटे छत की कड़ियों में माँ का झुर्रियों भरा उलझा-सा चेहरा दीखता है। मैं आँखें मूँद लेता हूँ, कड़ियाँ नहीं दीखतीं। लेकिन उनका चेहरा अब भी दीखता है...।’’5

यह चित्र पात्र के दिशाहीन जीवन और खोखलेपन को प्रस्तावित कर रहे हैं। यह लेखक की कला-कुशलता ही है कि लेखक ने दृश्यों व प्रतीकों का सहारा लेकर व्यक्ति के संत्रासजनित जीवनी को गहराई दी है। यह उनके लेखन की विशिष्ट शैली का द्योतक है। नई कहानी का आंदोलन भी मुख्यतः परंपरागत कथावस्तु और पद्धति से हटकर व्यक्ति और समाज से निर्मित मनोविज्ञान के बदलावों को दिखाने वाली कहानियों का था। निर्मल वर्मा की कहानियाँ इस आंदोलन के मूल लक्ष्यों को पूरी तरह प्रतिबिंबित करती हैं। उन्होंने व्यक्तित्व की जटिलताओं, आधुनिक जीवन के अकेलेपन, और सामाजिक असमानताओं को गहराई से उकेरा।

निर्मल वर्मा की कहानी-शैली की विशिष्टता उनके सूक्ष्म अवलोकन-दृष्टि के साथ किसी घटना व चरित्र के अंतर्मन की गहराई तक पहुँचना था। परिवेश को वे एक सहयोगी साधन के रूप में रखते हैं। कहानी में भी एक तरफ धुँधलाता कोहरा दिखाना जैसे व्यक्ति के मन को बिंबित कर रहे हों और पार्क में जाकर उसी पटरा को बैठा देना जैसे बताना चाह रहे हों कि यह भी आज से जुड़ा सत्य है। वे सामान्य से लगने वाली स्थिति को असामान्य व चिन्तनशील तरीके से प्रस्तुत करते हैं। इससे वह पाठक के मन में अपनी पैठ बना लेते हैं। एक नाउम्मीद व्यक्ति को बरसात के दिनों में एक छोटी बच्ची, जिसका नाम लता माथुर है, से भेंट करवाना ऐसा है जीने की आकांक्षा को छोड़ चुके मानव के सामने जीने की कला को सीखना है। जो यूटोपिया व वायवीयता बच्चे के मन ने सृजित की, उदास व्यक्ति भी उसमें बहता चला गया। मानो वह भी अपने बचपन, अपने काल्पनिक लोक में विचरण कर रहा हो, जहाँ कुछ भी असंभव नहीं, एक प्रकार का इच्छित जीवन है कल्पना-लोक में। ‘‘सच, हमने भी ढेला नहीं फेंका।’’ वह मुस्कुरा रही थी और मुझे अपने झूठ पर विश्वास दिलाने के लिए उसने अपनी नन्ही-सी नर्म गदेलियाँ हवा में खोलकर फैला दी थीं। मैंने उन दोनों हाथों को अपने हाथों में भर लिया। हँसी की स्निग्ध फुहार में संकोच घुलने लगा, दूरी मिटने लगी।6

जब लेखक उस व्यक्ति के विचार में डालता है कि मैंने ढेला क्यों नहीं फेंका और उन नन्हीं हथेलियों को जब पकड़ता है, तो जैसे दो संसार एक हो रहे हों। प्रकृत भाव और कृत्रिम भाव दोनों का समावेश है और आवश्यकता स्वरूप प्रश्न लगातार पाठक के मस्तिष्क में कौंधता रहता है कि वास्तव में जीवन से अपेक्षा क्या है और कैसा जीवन हम जी रहे हैं और जीना चाहते हैं। निर्मल वर्मा कटु दमित भाव का परिष्कार करते प्रतीत होते हैं। ‘‘मैं उसके लिए अजनबी नहीं रह गया और वह मेरे लिए महज बच्ची न रहकर लता माथुर बन गई। मेरी उम्र कहीं बहुत पीछे छूट गई-जैसे उसका कभी मुझसे वास्ता न रहा हो। उसके हृदय में मेरे प्रति कोई भय का संकोच मिट चला, जैसे वह वर्षों से मुझे जानती हो। उसकी अँगुलियाँ मेरे हाथ में बँधी हैं...जैसे कुछ कोमल पंखुड़ियों को मैंने अपने हाथों में समेट लिया हो। हमारी आँखें नाले के पानी पर झिलमिलाती, पिघलती चाँदी-सी धूप पर बहती हैं। नाले की ढलान पर तीन-चार मेमने गीली घास और कीचड़ से लिथड़े हुए पत्तों को सूँघते हुए, जल में अपनी टेढ़ी-मेढ़ी छाया-कृतियाँ छोड़कर आगे बढ़ गए।’’7

तत्पश्चात् लेखक व्यक्ति को ऐसे क्षण में कुछ समय के लिए छोड़ देते हैं, जहाँ यथार्थ की कटुता कमतर हो जाती है। व्यक्ति निराशा और अवसाद-जनित माहौल से परे यूटोपिया में विचरित होने लगता है। उस वायवीयता ने मानो उसकी दृष्टि को नया आलोक दिया हो। ‘‘मैंने पहली बार बेरोजगारी के इस लम्बे और उदास अरसे पर से दरिद्रता की राख को बिना दर्द के कुरेद दिया। जो अभाव की रिक्तता अब तक चुभती थी, वह अब भी है, किन्तु जैसे वह अपनी न रहकर पराई बन गई है, जिसे मैं बाहर से तटस्थ भाव से देख सकता हूँ-जिसने अब ‘छुट्टी’ का सहज भाव अपना लिया है।’’8

सुबह क्या मैं उदास था? मुझे लगा, मानो मैं गीली घास पर नंगे पाँव रखता हुआ पहाड़ी की ढलान पर उतरता जा रहा हूँ। मेरे ऊपर घनी छाँहें हवा में काँप रही हैं, स्मृतियाँ सूखे पत्तों-सी झरती जा रही हैं।
जिन्दगी कितनी हल्की है...

ऊपर आकाश में छोटे से एक बादल ने सूरज को ओढ़ लिया। धूप बुझने लगी और नाले के बहते पानी पर अनेक मटियाली छायाएँ मिटने लगीं।9

यह कुछ क्षण उसकी प्रेरक शक्ति है। एक मरणासन्न जैसी स्थिति से जिसने निकाल कर व्यक्ति में जीने की नवीन अभिलाषा दी हो। नकारात्मकता को जैसे सकारात्मक दृष्टि ने ढक लिया हो। अब व्यक्ति जीवन के कर्म में कुछ समय अपनी ऐसी ही कल्पनाओं को देगा, जिसमें उसने सौन्दर्य और खुशहाली भरा जीवन जिया है। कई बार व्यक्ति को यथार्थ की प्रतीति होते हुए भी अपने को एक कृत्रिम छलावे में रखना चाहता है। उस कल्पना में ही उसके जीवन का वास्तविक सार छिपा है। निर्मल वर्मा कहानी में लिखते हैं-‘‘एक क्षण...मुझे लगा कि बीते हुए दिन बीत गए हैं, बढ़ती हुई उम्र पीठ से उतर गई है। आज कल से बँधा न होकर मुझसे जुड़ा है...जो आज हूँ। सब कुछ धुली हुई सीपी में समा गया है, जिस पर कोई बोझ नहीं, कोई बाँध नहीं... जो कालातीत, सुदूर छोर पर धूप और जल की उनींदी लहरों पर गिर-उठ रहा है, गिर-उठ रहा है...समय के धुँधले सीमान्त पर मेरा बचपन, माँ का झुर्रियों भरा चेहरा...सब कुछ भीगी धूप के काँपते, सिहरते आँचल पर नीली धुन्ध की चिप्पियों-सा उड़ रहा है। सपनों की बासी गंध मानो तितली के रंगीन परों से बूँद-बूँद ढुरककर विस्मृति की कब्रों पर उगी हुई पीली घास में खो गई है...जहाँ कुछ फूल उग आए हैं, भीगे से फूल...और मुझे लगता है, जिन्दगी कितनी हल्की है।10

निर्मल वर्मा कहानी का सकारात्मक अंत करते हैं, जहाँ पाठक को भी आत्मपरितोष प्राप्त होता है। ऐसे विकट परिस्थिति से ना जाने राष्ट्र के कितने युवा जुड़े हैं। रोज नयी आशा से निकलते हैं और संघर्ष करते हैं। लेकिन शाम ढलते-ढलते उनके हौसले पस्त हो जाते हैं। बेरोजगारी, जो एक बड़ी समस्या है आज के समय में, जहाँ भौतिक जगत का प्रभाव हमारी आत्मा को कुरेदता जा रहा है, ऐसे में अवसाद और कुंठा से युवा भटक जाता है। यह ना केवल युवा के लिए अपितु भौतिक लक्ष्य प्राप्ति में लगे और विफल हुए प्रत्येक व्यक्ति से जुड़ता है। परंतु इस कहानी में विशेष लक्ष्य युवा बेरोजगारों पर है। पूरी पीढ़ी यदि नकारात्मक होगी, तो समाज में भी नकारात्मकता फैलेगी। निर्मल वर्मा अपनी इस कहानी से ऐसे युवाओं और राष्ट्र के भविष्य को भी संरक्षित करने का प्रयास करते हैं। इसलिए अंत में वही कुंठित व अवसादी चरित्र की मनःस्थिति वो इस रूप में दिखाते हैं-‘‘इस घटना को बीते अरसा गुजर गया। मैं अब भी बेेकार हूँ, लेकिन अब ‘‘एम्प्लायमेंट एक्सचेंज’’ के दफ्तर जाने की आदत छूट-सी गई है। मैं अक्सर अपने कमरे में बन्द रहता हूँ। किन्तु जब कभी मेह बरसने लगता है और कमरे में रुआँ-रुआँ-सा धुंधलका घिर आता है... तब आज की तरह सिगरेट पीने के बहाने बाहर निकल आता हूँ। नाले में बहते पानी को देखता हुआ मैं अक्सर कुछ सोचने-सा लगता हूँ। मुझे लगता है कि हवा में काँपती भीगी घास, ढलान से पानी में झुकी हुई झाड़ियाँ और नाले में नहाती हुई चिड़ियों के परों की फड़फड़ाहट... सब एक धीमे स्वर में धीरे-धीरे कुछ गुनगुना रहे हैं... एक अपरिमेय रहस्यमयता की सुर-लहरी में माया का मर्म गरजने लगता है।11

वही कमरा, वही खिड़की, वही दीवार के धब्बे, वही मौसम, वह परिवेश व परिस्थिति, परंतु बदला है तो बस नजरिया। फ्लैश बैक में चलती कहानी और छोटी बच्ची लता माथुर के साथ बिताए क्षण, जो बहुत बड़ी सीख दे गए। जीवन में जिस जिजीविषा का अंत हो रखा था, वह नए आलोक में उमड़ कर प्लावित हुई है। नजरिया बदलने भर की आवश्यकता है। व्यक्ति में आत्मिक जुड़ाव की भावना जीवित रहती है। यह दिखाता है कि आधुनिक जीवन की विसंगतियों के बावजूद मानवीय मूल्य समाप्त नहीं होते। हजारीप्रसाद द्विवेदी भी यथार्थ के बारे में लिखते हैं-‘‘एक यथार्थ मनुष्य में आशा और विश्वास पैदा करता है और दूसरा यथार्थ निराशा और भीरुता।’’12 चयन की स्वतंत्रता व्यक्ति के पास होनी चाहिए। यथार्थ को कैसे देखा जाए और कैसे जिया जाए, यह महत्वपूर्ण है। निर्मल वर्मा प्रस्तुत कहानी में नजर के साथ नजरिया भी क्या हो, बताते हैं।

निर्मल वर्मा की कहानियों की विशेषता है कि वे अपने पात्रों में आत्मचेतना व स्व से ईमानदारी दिखाते हैं। वह मानवीय मूल्यों को वरीयता देते हैं। साथ ही पाठक उनकी कहानियों और उसके परिवेश से जुड़ जाते हैं। पात्र के संघर्ष में अपनी सहानुभूति रखते हैं। पात्र को पूर्णतः बिखरने व टूटने से बचाने का भरसक प्रयास करते हैं, जो इस कहानी में भी दिखता है। ‘‘राजेंद्र यादव ने ‘आज की कहानी: परिभाषा के नये सूत्र’ शीर्षक के अंतर्गत लिखा है- कथाकार व्यक्ति को उसकी समग्रता में देखने का आग्रह करता है। व्यक्ति को उसके सामाजिक परिवेश, मानसिक अंतर्द्वन्द्वों तथा व्यावहारिक जीवन के तकाजों और आवश्यकताओं की एक संश्लिष्ट प्रक्रिया के रूप में पाना उसका लक्ष्य है।’’13

निर्मल वर्मा जानते हैं कि आधुनिकता की होड़ में मानवीय मूल्य संकटग्रस्त अवस्था में हैं। परंपरा और आधुनिकता की टकराहट उनसे छिपी नहीं है। परंतु वह नए मानवीय मूल्यों की खोज में लग जाते हैं। निर्मल वर्मा अधूरे जीवन में एक आदर्श, पूर्ण व सुखद संसार की कल्पना का यूटोपिया का विकल्प क्षण में करते हैं, जो व्यक्ति में नयी चेतना प्रसारित करता है। कहानी में जगह-जगह यथार्थ और यूटोपिया का द्वंद्व दिखाया जाता है। परंतु उसका यथार्थ कहानी के अंत तक वैसा नहीं रहता जैसे आरम्भ में था। मनोविश्लेषण में मन की भावना और बाहरी जीवन, इन दो आयामों से व्यक्ति को समझने का प्रयास किया जाता है। और दोनों ही उसके अस्तित्व का मूलभूत रूप होते हैं। ‘‘माक्र्स और फ्रायड के प्रभावों से आगे बढ़कर अस्तित्ववादी दर्शन ने जीवन के बुनियादी सवालों की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया, जिससे सातवें दशक में संत्रास, अलगाव, अजनबीपन और ऊब से संबद्ध कहानियाँ लिखी गयीं।’’14

अतृप्ति का भाव, आंतरिक द्वंद्व, अजनबीयत, खोखलापन, असुरक्षा बोध, एकाकपन, अस्तित्व का संकट, टूटन-बिखरन उनकी इस कहानी के गहरे मनोवैज्ञानिक पक्ष की ओर इंगित करती है। हमें पात्र अंतर्मुखी प्रतीत होता है, जिसमें अपने कल के प्रति भय, विरक्ति के साथ संवादहीनता भी मिलती है। मौन मानो उसके जीवन में पसर चुका हो। निर्मल वर्मा उसे अस्तित्व के बोध की डोर पकड़ा देते हैं। इस कहानी में व्यष्टि की चेतना को समष्टि चेतना से जोड़ लेते हैं। निर्मल वर्मा अपनी कहानियों के विषय में लिखते हैं-‘‘कभी एक कहानी को शुरू करते ही अंत का आभास मिलता है, पर कभी यह अंत वही नहीं रहता, जिसका मुझे आभास हुआ था। कहानी मेरे लिए लगे-बँधे विचार से उत्पन्न नहीं होती और शायद ही कभी इस बात से कहानी का सूत्रपात होता हो कि मैंने सचेतन रूप से किसी विषय के बारे में लिखने का संकल्प किया हो। एक वाक्य में कहा जाए तो मेरे लिए कहानी धुँधली अनुभूतियों के प्रदेश को शब्दों के आलोक में देखना है। दूसरी इसके साथ जुड़ी चीज यह है कि ये अनुभूतियाँ जुड़ने के साथ ऐसा कोई खास पैटर्न या अर्थ-व्यवस्था बन सकती है, जो मेरे द्वारा आरोपित न होकर स्वयं इन अनुभूतियों के भीतर से सहजाति में उजागर होती हो। और तीसरी चीज जो अंततः मुझे संतोष देती है, वह यह कि अगर अनुभूतियों के इस पैटर्न या अर्थ-व्यवस्था के भीतर से मनुष्य जीवन के बारे में ऐसा सत्य उपलब्ध हो सके, जो केवल इन्हीं अनुभूतियों के अंतर्संबंधों के माध्यम से उत्पन्न हो सकता था।’’15

माया का मर्म में व्यष्टि और समष्टि दोनों का गहरा संबंध दिखाई देता है। कहानी व्यक्ति के अंतर्मन की संवेदनाओं को चित्रित करते हुए आधुनिक समाज की विडंबनाओं को भी सामने लाती है। यही कारण है कि यह कहानी केवल व्यक्तिगत अनुभव की नहीं, बल्कि पूरे आधुनिक जीवन-बोध की कहानी बन जाती है। ‘‘अनास्था व संत्रास, यंत्रणा, अकेलेपन, विवशता की बात करने पर भी सातवें-आठवें दशक की कहानियाँ आस्था बटोरते आदमी की कहानियाँ हैं। इस काल-धारा में कहानी ने फैलाव में नहीं, जमीन में धँसकर गहरायी पैदा की है। नया कहानीकार भारतीय अस्मिता को तलाशने और रचने में संकल्पबद्ध होकर निकल पड़ा है।’’16

संदर्भ सूची  

1. पृष्ठ 195, हिंदी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली - डाॅ. अमरनाथ, राजकमल प्रकाशन, पाँचवाँ संस्करण, 2018।
2. पृष्ठ 728, हिंदी साहित्य का इतिहास, प्रधान संपादक- डाॅ. नगेन्द्र, संपादक - डाॅ. हरदयाल, प्रकाशक, मयूर बुक्स, दरियागंज, नयी दिल्ली-110002, प्रथम संस्करण:1973, 77-78वाँ संस्करण, 2021।
3. पृष्ठ 30, भारतीय साहित्य के निर्माता - निर्मल वर्मा, कृष्णदत्त पालीवाल, साहित्य अकादमी, संस्करण 2009।
4. पृष्ठ 36, भारतीय साहित्य के निर्माता - निर्मल वर्मा, कृष्णदत्त पालीवाल, साहित्य अकादमी, संस्करण 2009।
5. पृष्ठ 27, माया का मर्म, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, द्वितीय संस्करण, 2010।
6. पृष्ठ 30, वही।
7. पृष्ठ 31, वही।
8. पृष्ठ 32, वही।
9. पृष्ठ 32, वही।
10. पृष्ठ 34, वही।
11. पृष्ठ 35, वही।
12. पृष्ठ 76, साहित्य सहचर, हजारीप्रसाद द्विवेदी, लोक भारती प्रकाशन, संस्करण 2005।
13. पृष्ठ 192, हिंदी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली - डाॅ. अमरनाथ, राजकमल प्रकाशन, पाँचवाँ संस्करण, 2018।
14. पृष्ठ 729, हिंदी साहित्य का इतिहास, प्रधान संपादक - डाॅ. नगेन्द्र, संपादक - डाॅ.. हरदयाल, प्रकाशक, मयूर बुक्स, दरियागंज, नयी दिल्ली-110002, प्रथम संस्करण: 1973, 77-78वाँ संस्करण, 2021।
15. पृष्ठ 29, निर्मल वर्मा-साहित्य का आत्मसत्य, पृ. 139-140, प्र.सं. 2006।
16. हिंदी साहित्य का इतिहास, प्रधान संपादक - डाॅ. नगेन्द्र, संपादक डाॅ. हरदयाल, प्रकाशक मयूर बुक्स, दरियागंज, नयी दिल्ली-110002, प्रथम संस्करण: 1973, 77-78वाँ संस्करण, 2021।

डॉ. साक्षी
हिंदी विभाग
हिन्दू महाविद्यालय, डीयू, दिल्ली
ईमेल - sakshiabhisha@gmail.com

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