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दीपा की पांच कविताएं

स्त्री को समझो

स्त्री देह नहीं,
कि जब चाहा
उसे बिस्तर पर रौंद डाला
और अपनी विजय का दम्भ भर लिया।

दरअसल, यह विजय
पराजय है तुम्हारी,
क्योंकि उसकी आत्मा और मन को
तुम रत्तीभर भी रौंद नहीं सकते कभी।

स्त्री कमजोर नहीं,
कि जब चाहा
उठा दिया उस पर हाथ और
बाल खींचकर दबाने लगते हो गला,
दिखाते हो अपने पुरुषत्व की ताकत।

दरअसल, यह ताकत नहीं,
कमजोरी है तुम्हारी,
क्योंकि उसकी ऊँची आवाज
बर्दास्त नहीं तुम्हें,
इसलिए
तोड़ना चाहते हो उसके आत्मबल को।

और बार-बार कहते हो—
औरत हो, औरत ही रहो।

आखिर
पुरुष बनना चाहती ही
कब है औरत,
क्योंकि जब औरत को सह नहीं सकते तुम,
गर वो पुरुष बनी तो
बराबरी का मुकाबला
सह न पाओगे तुम।

इसलिए
स्त्री को समझो,
तन से नहीं, मन से।

क्योंकि
तन नहीं, मन है स्त्री।
स्त्री ह्रदय है,
करुणा है,
ममता है,
एहसास है,
विश्वास है,
हौंसला है,
आस्था है,
पथप्रदर्शक है,
प्रेम है।

यात्रा

ये जिंदगी
एक यात्रा है,
जिसका आरंभ भी है
और अंत भी।

किन्तु इस आरम्भ और अंत के मध्य यह
कभी-कभी किसी मोड़ पर ठहर जाती है,
किसी नावाक़िफ़ का साथ पा मुस्काती है।

व्यक्तित्व सहसा निखर जाता है,
बिखरा हुआ कुछ सवर जाता है।
कहती है कुछ अपनी कहानी,
सुनती है कुछ उसकी ज़बानी।

चुपके से कुछ जुड़ जाता है,
धागे में मोती पिर जाता है।
मानो
खोया हुआ कुछ मिल जाता है।

लेकिन,
ये खोया हुआ क्या है?
जो मिला है, उसे
महज कुछ क्षण के लिए
या
जीवनभर के लिए।

चयन

माना,
शोभा देती हैं चूड़ियाँ,
विवाहित स्त्री के हाथों में,
क्योंकि
वे श्रृंगार का एक प्रतीक हैं।

लेकिन ये चूड़ियाँ
हथकड़ियाँ प्रतीत होती हैं,
जब पितृसत्ता,
शिक्षित स्त्री के हाथों से
कलम छीन लेती है।

सामान्य लड़कियाँ

प्रेम में गम्भीर होती लड़कियाँ,
लड़कों को अच्छी नहीं लगती।
क्योंकि
ऐसी लड़कियाँ चाहती हैं,
सम्बन्धों को सामाजिक नाम देना।
पर लड़के चाहते नहीं,
प्रेमिका, पत्नी बने।
अधूरा प्रेम चाहते हैं वो,
ताकि बनी रहे ऊष्मा प्रेम की आजीवन।

 लड़कियाँ

हम मरुभूमि की
जिजीविषा भरी वनस्पतियाँ,
जो रेत से
अपने हिस्से की आर्द्रता
खींच
उग आती हैं।

डॉ. दीपा
दिल्ली विश्वविद्यालय
नई दिल्ली

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