प्रस्तावना
दलित साहित्य के संदर्भ में चेतना क्या है, इसके बारे में दलित लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि लिखते हैं-‘‘दलित की व्यथा, दुःख, पीड़ा, शोषण का विवरण देना या बखान करना ही दलित चेतना नहीं है, या दलित पीड़ा का भावुक और अश्रु-विगलित वर्णन, जो मौलिक चेतना से विहीन हो, चेतना का सीधा सम्बन्ध दृष्टि से होता है, जो दलितों की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, सामाजिक भूमिका की छवि के तिलिस्म को तोड़ती है, वह है दलित चेतना। दलित मतलब मानवीय अधिकारों से वंचित, सामाजिक तौर पर जिसे नकारा गया हो, उसकी चेतना यानी दलित चेतना।’’1
भारत में दलितों ने कई हजार वर्षों से यातना, कष्ट और पीड़ा का शिकार हुआ हैं। फिर भी अपने आप को कठिन, विषम और विपरीत परिस्थिति होने के बावजूद भी संघर्ष करना नहीं छोड़ा, दलितों के संघर्ष से उपजा साहित्य ही दलित साहित्य हैं। कुछ लोगों ने लिखा कि दलित साहित्य वेदना और पीड़ा का साहित्य है। कुछ लोगों का मानना है कि दलित साहित्य मुक्ति का साहित्य है। ‘‘इस संबंध में हम ऐतिहासिक घटनाओं/दुर्घटनाओं का अध्ययन करें, तो ऐसा मानना चाहिए कि दलित साहित्य पीड़ा, वेदना, मुक्ति का ही साहित्य नहीं, बल्कि अपने अधिकारों, अस्मिता और पहचान के लिए संघर्ष करने वालों का भी साहित्य है।’’²
दलित साहित्य दलित द्वारा सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक संघर्ष का परिणाम है। जैसे-जैसे समय बढ़ता गया, वैसे-वैसे दलित साहित्य का भी विस्तार होता गया। देश को जब आजादी मिली, तो दलितों की स्थिति बहुत ही दयनीय थी। दलितों की मुक्ति के लिए सावित्रीबाई फूले, ज्योतिबा फूले और डाॅ. अंबेडकर ने अनवरत संघर्ष किया। आजादी के बाद भी दलितों की दुनिया अलग और सवर्णों की दुनिया अलग दिखती है। सवर्ण इस देश के राजा बन गए और दलित रंक।
अलग-अलग विद्वानों ने अपने-अपने मतानुसार दलित साहित्य को परिभाषित किया है। दलित निबंधकार शेखर के मतानुसार-‘‘दलित साहित्य आंदोलन स्वाभिमान को हासिल करने का सांस्कृतिक आंदोलन है और अनुनय द्वारा, दया में भीख द्वारा यहाँ के पीड़ित, शोषित, दलित जनता को उनका हक मिले, यह बात दलित साहित्य को कदापि मंजूर नहीं। उसे तो सिर्फ अपने न्याय, हक़ चाहिए। दलित साहित्य की लड़ाई न्यायपूर्ण अधिकारों की लड़ाई है। दलित साहित्यकार और विचारक अपने स्वाभिमान और न्याय की यह जंग, अपना न्याय-पक्ष दृढ़तापूर्वक प्रस्तुत करते हुए कलम और कागज के माध्यम से लड़ता है।’’3
मराठी दलित साहित्यकार शरणकुमार लिंबाले की धारणा है- ‘‘दलित साहित्य में दलित चेतना संघर्ष से नाता रखने वाली क्रांतिकारी मानसिकता है। मनुष्य को केंद्र मानकर जातिव्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह करने वाली यह प्रतीति है। इस चेतना की प्रेरणा अंबेडकरी विचार है। दलित चेतना गुलाम को गुलामी से अवगत करा देती है। दलित चेतना दलित साहित्य का महत्त्वपूर्ण जननबीज है।’’⁴
‘युद्धरत आम आदमी’ मासिक पत्रिका की संपादक रमणिका गुप्ता मानती हैं- ‘‘दलित चेतना की सबसे पहली शर्त है, उसका विरोध का स्वर, पीड़ा की छटपटाहट, आक्रोश का तेवर और उसके साथ ही कहीं उगता हुआ परिवर्तन के लिए एक संकल्प।’’⁵
दलितों के अंदर चेतना पैदा करने में जितना योगदान दलित समाज-सुधारकों का रहा है, उतना ही दलित साहित्यकारों का भी रहा है। दलित साहित्यकारों में ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय, जयप्रकाश कर्दम, सुशीला टाकभौरे, श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ और राजेंद्र बड़गूजर आदि अनेक साहित्यकारों का योगदान अद्वितीय रहा। सभी ने साहित्य के माध्यम से दलित समाज को आगे बढ़ाने और व्यवस्था के खिलाफ आवाज बुलंद करने की प्रेरणा दिए। श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ ने अलग-अलग विधाओं में अपनी लेखनी का लोहा मनवाया। वे कहानी, कविता, आत्मकथा, आलोचना और पत्रकारिता आदि विधाओं में प्रचलित हैं। इनकी सभी कहानियाँ एक से बढ़कर एक हैं। वे अपनी कहानियों के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों और समस्याओं को उजागर करने का प्रयास किया है। इनकी कहानियाँ दलितों के अंदर स्वाभिमान और व्यवस्था के विरुद्ध आवाज मजबूत करती हैं। इनकी कहानियों का उद्देश्य समाज में विषमतामूलक तत्वों को खत्म करके समतामूलक समाज की स्थापना करना है। वह अपनी कहानियों के माध्यम से जातिवाद, सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार, अन्तर्जातीय विवाह, दहेज-प्रथा, बाल विवाह, अनमेल विवाह, बाल मजदूरी आदि समस्याओं को उजागर करने का प्रयास किया है। इनकी सभी कहानियाँ दलितों के अंदर चेतना पैदा करती हैं।
दलित कहानी दलित समाज में चेतना जगाने का कार्य करती है। श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ की कहानियाँ सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक शोषण के विरुद्ध आवाज उठाती हैं। इनकी कहानियाँ समाज में फैले भेदभाव, अस्पृश्यता, भ्रष्टाचार, वर्ण-व्यवस्था, सामाजिक अन्याय के खिलाफ विद्रोह करती नजर आती हैं। श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ अंबेडकर दर्शन से प्रभावित होने के कारण इनकी कहानियों में अंबेडकरवादी चेतना दर्शित होती है। इनकी कहानियों में दलित चेतना के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं-
1. वैज्ञानिक दृष्टिकोण।
2. पाखंड और कर्मकांड का विरोध।
3. वर्ण-व्यवस्था, अस्पृश्यता, जातिगत भेदभाव और सांप्रदायिकता का विरोध।
4. अलगाववाद का विरोध और भाईचारे का समर्थन।
5. स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के समर्थक।
6. सामाजिक बदलाव के लिए प्रतिबद्ध।
7. पूँजीवाद का विरोध।
8. सामंतवाद और ब्राह्मणवाद का विरोध।
9. पलायनवाद का विरोध।
10. लिंग-भेद, रंग-भेद और भाषा-भेद का विरोध।
निःसंदेह आज दलितों के साथ लोकतांत्रिक आधारित व्यवहार नहीं हो रहा है। उनके साथ हर क्षेत्र में अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है। हाशिये वर्ग के समाज के साथ भेदभाव, उत्पीड़न, अन्याय, अत्याचार और शोषण होते रहे हैं। इसलिए डाॅ. श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ भारतीय सामाजिक व्यवस्था से चिंतित हैं और अपनी कहानियों के माध्यम से दलितों को मुक्ति दिलाना चाहते हैं। इनकी सभी कहानियाँ प्रासंगिक प्रतीत होती हैं, क्योंकि इनके द्वारा चयनित दलित पात्र समाज को जागरूक करते नजर आते हैं।
श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ की प्रसिद्ध कहानी ‘ओल्ड एज होम’ के अंदर फैली जाति-व्यवस्था का पोल खोलती है। हमारे समाज का दलित वर्ग पढ़-लिखकर कहीं नकारात्मक तो कहीं सकारात्मक रूप में नजर आता है। अगर नकारात्मक रूप की बात करें, तो तेजगुलाम ऐसा पात्र है, जो दलित होने के साथ-साथ प्रोफेसर पद पर है। आधुनिक समय के हिसाब से अपनी जाति छुपाता रहता है। वह अपने माता-पिता को ओल्ड एज होम में छोड़ देता है। इस कहानी में वृद्धाश्रम में जाति-व्यवस्था दर्शित होती है-‘‘अब यहाँ एस.सी.एल.टी. कर्मचारी भी भेदभाव करने लगे हैं। बिस्तर बदलना, बाथरूम साफ करना, कपड़े धोना कोई नहीं चाहता। यहाँ तक कि अब हमें सभी के बाद में खाने को बुलाया जाता है। सबसे पहले ब्राह्मण-बूढ़े और सबके बाद हम चमार। चाय-पानी तो खुद उठाकर ले जाओ।’’⁶ अतः वृद्धाश्रम के अंदर शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न देखने को मिलता है।
श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ की प्रसिद्ध कहानी ‘हाथ तो उग ही आते हैं’ में जातिगत भेदभाव दर्शित होता है। इस कहानी में सूतो मालकिन के रग-रग में जाति-व्यवस्था विद्यमान है। वह अपने घर में काम करने वाली नौकरानी खोजती है और उससे बार-बार जाति पूछती रहती है कि कहीं वह अछूत न हो जाए। इस कहानी में जिस नौकरानी का चित्रण हुआ है, वह रूक्खो है। मालकिन जब रूक्खो से मिलती है, तो चैधरिन अपने पति से बात करते हुए कहती है-‘‘जी, मुझे तो यो बी भंगिन-चमारिन सी लगे है।’’⁷ फिर उसका पति जाति को नकारते हुए उसे समझाता है-‘‘भंगिन है या चमारी, है तो देश की नारी ही। झाड़ू-पोंछा के लिए क्या तुझे ब्राह्मणी, ठकुरानी, बनैनी या कायस्थनी मिलेगी? ये बातें भूलो और अपने फायदे की सोचो।’’⁸
‘शिष्या-बहू’ श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ की ऐसी कहानी है, जिसमें सवर्ण शिक्षिका द्वारा अस्पृश्यता और छुआछूत किया जाता है। गुलाबो विद्या की शिष्या है। परंतु विद्या की मानसिकता बहुत ही घटिया है। गुलाबो छोटी जाति से है, इसलिए विद्या उससे छुआछूत करती है। विद्या का बेटा गुलाबो से प्रेम करता है। वह गुलाबो से शादी करना चाहता है। इस बात का जिक्र जब गुलाबो विद्या से करती है, तो विद्या उस पर आक्रोशित हो जाती है कि तुम जैसी छोटी जाति को मैं अपनी बहू बनाऊँगी। ‘‘तेरे भेजे में चहुँदाँ ही चतुराई भरी है, जो तू अछूत की बेटी इस ब्राह्मण घर में बहू बनकर आ घुसी है।’’⁹ विद्या की सवर्ण मानसिकता उसे बहू बनने से रोकती है। जब विद्या कक्षा में पढ़ा रही होती है और उसी कक्षा में गुलाबो भी पढ़ रही होती है। गुलाबो को विद्या इशारा करके बुलाती है, तो गलती से गुलाबो से ब्लैकबोर्ड टच हो जाता है। तब विद्या उस पर गुस्सा करती है और व्यंग्य करते हुए बोलती है कि कितना भी पढ़ लो, रहोगी तो शेड्यूल्ड कास्ट ही। ‘‘मैंने चाॅक उठाया और सवाल हल कर दिया। तब बच्चे तो खुश हुए, पर मैम ने मुझे इशारे से क्लास के बाहर बुलाया। मैं बाहर निकली। उन्होंने क्लास के किवाड़ को फेरते हुए मेरा कान पकड़कर इतनी जोर से उमेठा कि मेरी चीख निकल गई। ऊपर से आँखें तरेरकर बोलीं, ‘हिमाकत करेगी, मेरी बिना इजाजत ब्लैकबोर्ड टच करेगी? एक-दो सवाल हल कर लिए तो तीर मार लिया क्या? कितनी भी होशियार हो ले, रहेगी तो शेड्यूल्ड कास्ट ही। औकात मत भूल। याद रख कि तेरा बाप काम क्या करता है, जानती है? पानी भी नहीं पीते हैं तुम्हारे हाथ का हमारे लोग। तू रहती किस लाल बाग में है?’’10 अतः श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ समाज की बुराई, अस्पृश्यता और छुआछूत को दिखाकर इसे जड़ से खत्म करना चाहते हैं।
इस तरह उपर्युक्त कहानी शहरों में रहने वाले प्रगतिशील और सभ्य लोगों की घिनौनी मानसिकता को दर्शाती है कि किस तरह सवर्ण दलितों से घृणा और द्वेष करते हैं। अतः यह कहानी गैर-दलितों की दलितों के प्रति क्रूरता को प्रकट करती है। श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ की दूसरी कहानी ‘कलावती’ में लेखक दहेज-प्रथा, अनमेल विवाह, बाल-विवाह, बाल-मजदूरी, रोजगार की समस्या आदि मुद्दों पर अपनी बातों को कहानी के माध्यम से रखते हैं। भारत में दहेज-प्रथा एक ऐसी समस्या है, जिससे छुटकारा पाना बहुत ही मुश्किल है। शादी के समय जब लड़के वाले लड़की वाले से पैसे लेते हैं, उसे दहेज कहा जाता है। साधारण अर्थ में ‘‘दहेज’’ से अभिप्राय उस धन, उपहारों व वस्तुओं से है, जो कि पत्नी विवाह में अपने पति के लिए लाती है।11 दहेज के कारण कलावती अपनी दोनों पुत्रियों की शादी ऐसे लड़कों से करती है, जिनके अंदर गुण की कमी है। अगर दहेज की समस्या नहीं होती, तो कलावती की दोनों पुत्रियों को अच्छा वर मिलता। यह समस्या भारतीय समाज में डायन की तरह मुँह बाए खड़ी है। इस कहानी में कलावती भी अपनी दो बेटियों को लेकर इस समस्या का शिकार होती है। कलावती चिंता जताते हुए कहती है-’’सो तो ठीक है, पर बिना दहेज के तो वे ही लड़के मिल सकते हैं, जिनकी शादियाँ या तो हो नहीं रही होती हैं या वे विधुर होते हैं अथवा खुद गरीब परिवार के होते हैं।’’12
यहाँ लेखक दहेज के कुप्रभाव को दिखाते हैं। अगर यह समस्या नहीं रहती, तो कलावती अपनी दोनों बेटियों की शादी अच्छे लड़कों से करती। दहेज समाज के लिए एक चिंतनीय विषय है। भारतीय समाज में बाल-विवाह भी जघन्य अपराध है, लेकिन मजबूरन माता-पिता को यह कदम उठाना पड़ता है। इस कहानी में कलावती की दोनों पुत्रियों का बाल-विवाह होता है। हम देख सकते हैं-‘‘कलावती की लाडली चंद्रावती और निहाल देवी, दोनों का बाल-विवाह एक साथ हुआ था।’’13
इस प्रकार बाल-विवाह को लेकर भी लेखक चिंतित हैं और समाज से बाल-विवाह को जड़ से मिटाना चाहते हैं। लेखक इस कहानी में ‘‘अनमेल विवाह’’ का भी जिक्र किया है। दोनों बेटियों का अनमेल विवाह होता है। अनमेल विवाह के दुष्परिणाम हो सकते हैं। इससे रिश्तों में हमेशा खटास रहती है। कलावती की पुत्री चंद्रावती के पति आयु में 25 साल बड़े थे। वह अपने पति के सामने पुत्री समान लगती थी, तो रिश्तों में खटास आना स्वाभाविक है। और दूसरी बेटी का पति पूरी तरह पागल है, तो वह अपना सुखमय जीवन कैसे व्यतीत करेगी। ‘‘चन्द्रवती के पति पच्चीस साल बड़े थे। दबंग का सबसे पहला शिकार वही हुआ। गरीबों के रिश्ते गरीबों में और अमीरों के रिश्ते अमीरों में। एक जात के लोग भी गैर-बराबरी पर नहीं लिखते। अभी एक सदमा सह नहीं पाई, तब तक कलावती को खबर मिली कि दूसरी बेटी निहाल देवी का पति पूरी तरह पागल हो गया है। मतलब वह अर्धविक्षिप्त तो तभी था, जब उसकी शादी हुई थी। निहाल देवी तब मुश्किल से 13 साल की थी। कलावती के पास उसके विवाह के लिए कोई उपाय, पैसा नहीं था। बिना दहेज-लगेज के तो ऐसा ही वर मिलता है।’’14
भारतीय समाज की एक बड़ी समस्या बाल मजदूरी भी है। 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को बाल मजदूरी की श्रेणी में रखा जाता है। गरीबी के कारण बच्चों को बाल मजदूरी का शिकार होना पड़ता है। बच्चे स्कूल न जाकर कहीं न कहीं काम पर लग जाते हैं। कहीं न कहीं बाल मजदूरी के कारण देश का विकास थम-सा गया है। ‘‘मैं, कलावती, आपको विनतीपूर्वक बता रही हूँ कि मेरी गरीबी दूर नहीं हुई है। मेरे घर की छत अब की बारिश में टूट गई है। हमें जमीन का पट्टा नहीं मिला है। प्रधानमंत्री जी, हमारे बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे। उन्हें बाल मजदूरी करनी पड़ती है। खाने को कुछ नहीं है।’’15
उपर्युक्त संदर्भों से मालूम चलता है कि कहानी कई समस्याओं को एक साथ लेकर चल रही है। डाॅ. श्यौराज सिंह ‘बेचैन’, ‘‘होनहार बच्चे’’ नामक कहानी के माध्यम से शिक्षण संस्थानों व विश्वविद्यालय में ब्राह्मणवादियों द्वारा दलितों के साथ हो रहे उत्पीड़न व शोषण को दिखाया गया है। मुख्य रूप से इस कहानी में सवर्ण वर्ग के उस चरित्र को सामने लाया गया है, जहाँ वह एस.सी. का सर्टिफिकेट बनवाकर भी ब्राह्मण बना रहता है और आरक्षित पदों पर खुद बैठना चाहता है। चूँकि अधिकांश जगहों पर विभागाध्यक्ष और बड़े पदों पर ब्राह्मण ही होते हैं। जब अध्यापक के इंटरव्यू में एस.सी. प्रतिनिधि सवाल उठाता है कि एस.सी. के पद पर एस.सी. को ही लिया जाना चाहिए, तो एक्सपर्ट तिवारी अपना तर्क देते हैं-‘‘नहीं, यह कोई शर्त नहीं है। कौन कितना लिखता-पढ़ता है, यह तो साक्षात्कार समिति की स्वायत्तता को जैसा लगता है, वैसा करती है। उसका अधिकार सर्वोपरि है। सुरक्षित है। सब्जेक्ट एक्सपर्ट तुम हो या मैं? जो होनहार हैं, वे चुने जा रहे हैं। हम एस.सी.-नाॅन एस.सी. के चक्कर में नहीं पड़ते।’’16 अतः इस कहानी में आरक्षण का कैसे गलत इस्तेमाल हो रहा है, इसका सफल चित्रण हुआ है। प्रो. सदानंद तिवारी अपनी सजातीय ब्राह्मण पुनीता को आरक्षित सीट पर नियुक्त करके पुनीत कार्य करते हैं। प्रस्तुत कहानी में तथाकथित सवर्ण वर्ग की पुनीता नामक पात्र के माध्यम से तथाकथित सवर्ण समाज दलितों को कैसे दबा देता है, उसका भी सफल चित्रण हुआ है।
निष्कर्ष
हम कह सकते हैं कि समाज से सभी बुराइयों को मिटाना ही लेखक का मकसद और उद्देश्य है। लेखक असमानता खत्म कर भाईचारे की भावना स्थापित करना चाहता है। लेखन उन सभी बिंदुओं को नष्ट करना चाहता है, जो समाज के लिए बाधक हैं। हर दलित वर्ग को जागरूक और शिक्षित करना ही इनकी कहानियों की प्रासंगिकता है।
संदर्भ सूची
1. ओमप्रकाश वाल्मीकि, दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र, राधाकृष्ण प्रकाशन, तीसरी आवृत्ति, 2009, पृष्ठ 29.
2. मोहनदास नैमिशराय, हिंदी दलित साहित्य, साहित्य अकादमी, प्रथम संस्करण, 2018, पृष्ठ 13.
3. वही, पृष्ठ 14.
4. डाॅ. शरणकुमार लिंबाले, दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, अनु. रमणिका गुप्ता, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, आवृत्ति 2010, पृष्ठ 44.
5. रमणिका गुप्ता (सम्पा.), दलित निजी साहित्य, नवलेखन प्रकाशन, बिहार, प्रा. सं. 1996, पृष्ठ 72.
6. श्यौराज सिंह ‘बेचैन’, भरोसे की बहन, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ 29.
7. श्यौराज सिंह ‘बेचैन’, हाथ तो उग ही आते हैं, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ 108.
8. वही, पृष्ठ 108.
9. श्यौराज सिंह ‘बेचैन’, मेरी प्रिय कहानियाँ, राजपाल प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ 46.
10. वही, पृष्ठ 49.
11. राम अहूजा, भारतीय सामाजिक व्यवस्था, रावत पब्लिकेशन, पृष्ठ 178.
12. श्यौराज सिंह ‘बेचैन’, मेरी प्रिय कहानियाँ, राजपाल प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ 42.
13. वही, पृष्ठ 42.
14. वही, पृष्ठ 42-43.
15. वही, पृष्ठ 43.
16. श्यौराज सिंह ‘बेचैन’, भरोसे की बहन, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ 51.
Post A Comment
No comments :
Note: Only a member of this blog may post a comment.