भारत में आंतरिक आपातकाल (1975-1977): महिला पत्रकारों की भूमिका और संघर्ष -दशरथ सिंह राठौड़
शोध सारांश
भारत में आंतरिक आपातकाल (1975-1977) का दौर देश के लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे विवादास्पद कालखंड रहा है। जून 1975 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अमान्य घोषित कर दिया था और बढ़ते आंतरिक असंतोष को देखते हुए 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आंतरिक आपातकाल की घोषणा कर दी, जो 21 मार्च 1977 तक जारी रहा। आंतरिक आपातकाल की अवधि के दौरान नागरिकों के अधिकारों का हनन हुआ, राजनीतिक विरोधियों को हिरासत में लिया गया और प्रेस पर कड़ी सेंसरशिप लागू की गई। प्रेस को नियंत्रित करने के उद्देश्य से सरकार ने इस दौरान कई प्रमुख पत्रकारों की गिरफ्तारी की तथा कठोर सेंसरशिप लागू की। इस अवधि के दौरान कई प्रमुख पत्रकारों के अनुभवों पर काफी शैक्षणिक कार्य हुआ है, लेकिन महिला पत्रकारों के प्रत्यक्ष अनुभवों पर अपेक्षाकृत कम कार्य हुआ है। इस शोध पत्र का उद्देश्य आपातकाल की अवधि में प्रमुख महिला पत्रकारों जैसे कूमी कपूर, तवलीन सिंह, कल्पना शर्मा और नयनतारा सहगल द्वारा किए गए संघर्ष और उनके अनुभवों की पड़ताल करना है। इन महिला पत्रकारों द्वारा ऐसी कठिन परिस्थितियों में किया गया कार्य इस कालखंड के दौरान पत्रकारिता पर लगाए गए प्रतिबंधों और इन पत्रकारों द्वारा दिखाए गए साहस को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
बीज शब्द: आंतरिक आपातकाल, महिला पत्रकारिता, प्रेस सेंसरशिप, प्रेस स्वतंत्रता, राजनीतिक दमन, लोकतांत्रिक अधिकार, प्रतिरोधात्मक पत्रकारिता।
Female Journalists During India’s Internal Emergency (1975–1977)
-Dashrath Singh Rathore
Research Scholar, Department of Journalism
Jai Narain Vyas University, Jodhpur, Rajasthan
AbstractThe time from 1975 to 1977 in India is still the talked about period in the country history of being a democracy. This was when the Allahabad High Court said Indira Gandhi did not win her election fairly in June 1975. After that Indira Gandhi, who was the Prime Minister at that time, declared an emergency on June 25, 1975, because people inside the country were getting upset. This emergency lasted until March 21, 1977. During this time the government did not respect the rights of citizens, put opponents in jail and controlled what the press could say. The government wanted to control the press, so they arrested well-known journalists and made sure they could not write what they wanted. Many people have studied what happened to known journalists during this time, but not many people have looked at what happened to female journalists. This research paper wants to look at what female journalists like Coomi Kapoor, Tavleen Singh, Kalpana Sharma and Nayantara Sahgal went through during the emergency. The work these female journalists did during this time shows how difficult it was to be a journalist and how brave these women were. The emergency period was a time for female journalists, like Coomi Kapoor, Tavleen Singh, Kalpana Sharma and Nayantara Sahgal, and this paper will examine their struggles and experiences.
Keywords: Internal Emergency (1975–1977), Women Journalists, Press Censorship, Press Freedom, Political Repression, Democratic Rights, Resistance Journalism.
1. परिचय
भारत में आंतरिक आपातकाल की घोषणा 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा की गई थी, जो 21 महीनों की अवधि तक, अर्थात् 21 मार्च 1977 तक लागू रहा। आपातकाल की घोषणा संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत आंतरिक अशांति के आधार पर की गई थी। इन 21 महीनों की अवधि के दौरान अनेक लोकतांत्रिक संस्थाओं पर प्रहार किया गया।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में चुनावी गड़बड़ियों के मद्देनजर इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द कर दिया था। इसके बाद उत्पन्न राजनीतिक अशांति के कारण इंदिरा गांधी ने आंतरिक आपातकाल लागू कर दिया। आपातकाल लागू होते ही सरकार ने प्रमुख विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को गिरफ्तार कर लिया।
इस दौरान प्रेस की स्वतंत्रता पर लगभग पूर्ण रूप से रोक लगा दी गई थी। समाचार पत्रों पर प्रकाशन से पूर्व सेंसरशिप लागू कर दी गई थी और लगभग 258 पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया था। मीडिया संस्थानों को प्रकाशन से पहले अपनी सामग्री सरकारी अधिकारियों को दिखाना आवश्यक था, जिससे पूरे मीडिया जगत में भय का वातावरण बन गया था।
इस प्रकार की परिस्थितियों में महिला पत्रकारों के लिए कार्य करना और भी चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि उस समय पत्रकारिता के क्षेत्र में पहले से ही कम महिलाएँ कार्यरत थीं और पुलिस प्रशासन तथा सेंसरशिप के डर ने वातावरण को और अधिक कठिन बना दिया था। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद कई महिला पत्रकारों ने आपातकाल की घटनाओं के दस्तावेजीकरण और उसके विरोध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
2. अनुसंधान पद्धति/शोध विधि
इस अध्ययन में आपातकाल (1975-1977) की अवधि में महिला पत्रकारों की भूमिका का विश्लेषण करने के लिए गुणात्मक ऐतिहासिक अनुसंधान दृष्टिकोण अपनाया गया है। इस शोध पत्र में केस स्टडी के माध्यम से कूमी कपूर, तवलीन सिंह, कल्पना शर्मा और नयनतारा सहगल जैसी महिला पत्रकारों के आपातकाल के दौर के अनुभवों को प्रस्तुत किया गया है।
यह अध्ययन मुख्य रूप से पुस्तकों, संस्मरणों, लेखों तथा आपातकाल के दौर के साक्षात्कारों जैसे द्वितीयक स्रोतों पर आधारित है। इन स्रोतों के माध्यम से उस दौर में कार्य करने वाली महिला पत्रकारों के अनुभवों के बारे में जानकारी मिलती है।
शोध उद्देश्य
इस अध्ययन के उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
- भारतीय आंतरिक आपातकाल की अवधि (1975-1977) के दौरान महिला पत्रकारों की भूमिका का विश्लेषण करना।
- पत्रकारों के समक्ष आने वाली प्रेस सेंसरशिप और राजनीतिक दमन जैसी चुनौतियों का मूल्यांकन करना।
- आपातकाल के दौरान महिला पत्रकारों ने किस प्रकार प्रेस स्वतंत्रता पर लगे प्रतिबंधों का विरोध किया और उनका दस्तावेजीकरण किया।
यह शोध ऐतिहासिक तथा विषयगत विश्लेषण के माध्यम से किया गया है। इस शोध में प्रेस सेंसरशिप, सरकारी दमन तथा पत्रकारों द्वारा सेंसरशिप के विरोध में अपनाई गई रणनीतियों जैसे विषयों पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
3. आपातकाल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
आपातकाल की घोषणा होते ही सरकार ने प्रेस पर नियंत्रण के उद्देश्य से प्रमुख समाचार पत्रों की विद्युत आपूर्ति भी काट दी, ताकि अगले दिन सरकार की आलोचना करने वाली खबरें प्रकाशित न हो सकें। इसी समय सरकार ने राजनीतिक विरोधियों से निपटने के लिए आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था अधिनियम के अंतर्गत मुख्य विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। सरकार ने प्रेस पर सख्त सेंसरशिप लागू करने के लिए सलाहकारों की नियुक्ति की, जो प्रकाशित सामग्री पर निगरानी रखते थे और सरकार की आलोचना करने वाली सामग्री को हटा देते थे। द इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे प्रमुख समाचार पत्रों ने इस सेंसरशिप के प्रतीकात्मक विरोध के रूप में अगले दिन संपादकीय स्थान को खाली छोड़ दिया।
आपातकाल की अवधि में जबरन नसबंदी अभियान, झुग्गियों को तोड़ने तथा बड़े पैमाने पर जबरन गिरफ्तारियों जैसी घटनाएँ भी हुईं, लेकिन प्रेस पर सख्त सेंसरशिप के कारण इन घटनाओं की पर्याप्त रिपोर्टिंग नहीं हो सकी। जिन पत्रकारों ने सेंसरशिप का विरोध किया, उन्हें गिरफ्तारी और धमकियों का सामना करना पड़ा, या उनके समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के प्रकाशन को बंद कर दिया गया।
4. आपातकाल के दौरान प्रमुख महिला पत्रकार
4.1 कूमी कपूर
कूमी कपूर आपातकाल के दौरान द इंडियन एक्सप्रेस समाचार पत्र के साथ राजनीतिक पत्रकार के रूप में जुड़ी हुई थीं। जून 2015 में कूमी कपूर ने द इमरजेंसी: ए पर्सनल हिस्ट्री नामक पुस्तक लिखी, जिसमें उन्होंने आपातकाल के दौरान अपने अनुभवों और प्रेस सेंसरशिप का विस्तार से वर्णन किया है। कपूर के अनुसार इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश के बाद हो रही आलोचना से इंदिरा गांधी नाराज थीं, जो आपातकाल में प्रेस सेंसरशिप का एक प्रमुख कारण बना।
इस अवधि के दौरान कपूर ने पत्रकारों और उनके परिवारों पर हो रहे दमन को व्यक्तिगत रूप से देखा। कूमी कपूर के पति वीरेंद्र कपूर भी पत्रकार थे और उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। वीरेंद्र कपूर को नौ महीने तक जेल में रखा गया और बाद में अचानक उन्हें तिहाड़ जेल से बरेली जेल में स्थानांतरित कर दिया गया था। इस दौरान कूमी कपूर को अपनी नौकरी के साथ अपने छोटे बच्चे की देखभाल भी करनी पड़ती थी। वीरेंद्र कपूर उस समय इंडियन एक्सप्रेस में कार्यरत थे और इस अखबार के मालिक रामनाथ गोयनका आपातकाल विरोधी आंदोलन के समर्थक थे, लेकिन उन्होंने वीरेंद्र कपूर की सैलरी देने से मना कर दिया। पूरी आपातकाल की अवधि के दौरान कपूर और उनके पति पर पुलिस अधिकारियों द्वारा निगरानी रखी जाती थी, जिससे उनका पेशेवर जीवन काफी प्रभावित हुआ। कपूर के अनुसार ऐसा कोई भी पत्रकार या चिंतक, जो आपातकाल की आलोचना कर रहा था, उसे गिरफ्तार किया जा रहा था।
कपूर ने अपनी बहन रोक्सना स्वामी के पति तथा जनसंघ से राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी का उल्लेख भी किया है। उन्होंने बताया कि गिरफ्तारी से बचने के लिए वे पहले भूमिगत हो गए थे और बाद में गुप्त रूप से भारत लौटकर फिर विदेश चले गए। इस दौरान पुलिस स्वामी को पकड़ने के लिए अभियान चला रही थी और कपूर की बहन तथा माता-पिता को भी परेशान किया जाता था।
कूमी कपूर द इंडियन एक्सप्रेस से जुड़ी हुई थीं और यह समाचार पत्र आपातकाल का मुखर आलोचक था। सरकार ने अखबार के मालिक रामनाथ गोयनका पर भारी दबाव डाला। अखबार पर आयकर के छापे पड़े, प्रबंधन में सरकारी हस्तक्षेप की कोशिश हुई और वित्तीय संसाधनों पर प्रतिबंध लगाए गए, जिससे अखबार को चलाना कठिन हो गया।
कपूर ने अपनी पुस्तक में बंदियों के साथ हुए दुव्र्यवहार और यातनाओं के बारे में भी बताया है। उन्होंने कन्नड़ अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी के साथ हुए दुव्र्यवहार का उल्लेख किया है, जिन्हें केवल समाजवादी नेताओं के संपर्क में होने के कारण गिरफ्तार किया गया था। अस्थमा से पीड़ित होने और जेल में उचित चिकित्सा सुविधा न मिलने के कारण रिहाई के कुछ समय बाद ही उनकी मृत्यु हो गई। कपूर ने जाॅर्ज फर्नांडिस के भाई लाॅरेंस फर्नांडिस के साथ पुलिस द्वारा जानकारी प्राप्त करने के लिए किए गए क्रूर व्यवहार का भी उल्लेख किया है। उन्हें जेल में अमानवीय रूप से पीटा गया, जिससे उनके शरीर के कई हिस्सों में फ्रैक्चर हो गए और रिहाई के समय वे लगभग जीवित कंकाल की तरह दिखाई दे रहे थे।
कपूर ने इन अनुभवों के माध्यम से पत्रकारों और राजनीतिक विरोधियों के सामने उत्पन्न हुए भयावह दमनकारी माहौल का दस्तावेजीकरण किया। उनके लेखन और अनुभवों से पत्रकारों द्वारा झेली गई व्यक्तिगत कठिनाइयों, प्रेस सेंसरशिप तथा प्रेस स्वतंत्रता के सामने आई चुनौतियों का स्पष्ट चित्र सामने आता है।
4.2 कल्पना शर्मा
आपातकाल की अवधि के दौरान हिम्मत साप्ताहिक पत्रिका उन कुछ प्रकाशनों में से एक थी, जिन्होंने सरकारी सेंसरशिप का मुखर विरोध किया। आपातकाल लागू होते ही सरकार द्वारा खबरों के संबंध में दिशा-निर्देश जारी कर दिए गए थे और सरकार विरोधी खबरों को दबाने के निर्देश दिए गए थे। सेंसरशिप के दबाव के बावजूद हिम्मत साप्ताहिक पत्रिका उन कुछ प्रकाशनों में से थी, जिन्होंने स्वतंत्र प्रकाशन जारी रखा।
राजमोहन गांधी हिम्मत पत्रिका के संस्थापक और संपादक थे तथा कल्पना शर्मा सहायक संपादक थीं। राजमोहन गांधी की गिरफ्तारी के बाद 1976 में कल्पना शर्मा को इस पत्रिका का संपादक बनाया गया। इसके बाद प्रकाशित सामग्री की सारी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। शुरुआत से ही हिम्मत पत्रिका ने सेंसरशिप के विरोध में कई प्रतीकात्मक कदम उठाए। आपातकाल लागू होने के बाद पहले दो अंकों में संपादकीय स्थान को खाली छोड़कर पत्रिका ने विरोध दर्ज किया, लेकिन अधिकारियों ने चेतावनी दी कि संपादकीय स्थान खाली छोड़ना भी सेंसरशिप नियमों का उल्लंघन माना जाएगा।
अक्टूबर 1975 में हिम्मत पत्रिका में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई, जिसमें गांधी जयंती के अवसर पर राजघाट में आयोजित एक प्रार्थना सभा के दौरान पुलिस द्वारा आचार्य जे.बी. कृपलानी सहित कई लोगों को गिरफ्तार किए जाने का उल्लेख था। इस रिपोर्ट के कारण अधिकारियों ने पत्रिका पर आपत्तिजनक सामग्री प्रकाशित करने का आरोप लगाया और संपादक कल्पना शर्मा को सेंसर कार्यालय बुलाया गया। उन्हें कड़ी प्री-सेंसरशिप का पालन करने के निर्देश दिए गए। इसके बाद अनिवार्य रूप से सरकारी अधिकारियों की मंजूरी के बाद ही लेख प्रकाशित किए जाते थे।
इन प्रतिबंधों के बावजूद कल्पना शर्मा के संपादन में पत्रिका ने साहस दिखाते हुए रचनात्मक तरीकों से सेंसरशिप से बचने के प्रयास किए। पत्रिका ने एक हास्य डायरी स्तंभ प्रकाशित करना शुरू किया, जिसमें राजनीतिक परिस्थितियों की व्यंग्य के माध्यम से आलोचना की जाती थी। यह स्तंभ सेंसर के पास नहीं भेजा जाता था। इसी तरह दिस वाज लाइफ नामक एक और स्तंभ शुरू किया गया, जिसमें तानाशाही का विरोध करने वाले व्यक्तियों की कहानियाँ प्रकाशित की जाती थीं। इससे पाठकों को लोकतांत्रिक प्रतिरोध का संदेश मिला।
इस दौर में हिम्मत पत्रिका को आर्थिक रूप से कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। सेंसर अधिकारियों द्वारा आपत्तिजनक सामग्री प्रकाशित करने के आरोप में प्रकाशकों से पुलिस आयुक्त के पास ₹20,000 जमा कराने की मांग की गई। हिम्मत पत्रिका के प्रिंटिंग प्रेस को चेतावनी दी गई कि वह पत्रिका को छापना बंद करे, जिससे संपादकीय टीम को दूसरे प्रिंटर की तलाश करनी पड़ी। अंततः जब कोई प्रिंटर पत्रिका को छापने के लिए तैयार नहीं हुआ, तो पाठकों से आर्थिक सहायता की अपील की गई और लगभग ₹60,000 एकत्र कर इस राशि से छोटे प्रिंटिंग मशीन खरीदे गए। परिणामस्वरूप पत्रिका स्वतंत्र रूप से छपना जारी रख सकी।
इसके बावजूद सरकारी निगरानी जारी रही। संपादकों को अपने लेख सेंसर कार्यालय ले जाकर दिखाने पड़ते थे और वहाँ अधिकारी बिना स्पष्टीकरण लेख के बड़े हिस्सों को काट देते थे। सीमित संसाधनों और छोटी टीम के कारण इन खाली स्थानों को अंतिम समय में भरना संपादकीय टीम के लिए कठिन होता था।
इन अत्यंत विषम और कठिन परिस्थितियों में भी कल्पना शर्मा के नेतृत्व में उनकी टीम ने आपातकाल के पूरे दौर में हिम्मत वीकली के प्रत्येक अंक को प्रकाशित किया। सरकारी दबाव, सेंसरशिप, आर्थिक संकट और कानूनी दबाव के बावजूद कल्पना शर्मा का यह संघर्ष उनके साहस और प्रेस की स्वतंत्रता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह उदाहरण दर्शाता है कि आपातकाल जैसे कठिन समय में भी कुछ पत्रकार लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए लगातार प्रयासरत रहे।
4.3 तवलीन सिंह
तवलीन सिंह आपातकाल के दौर में एक युवा पत्रकार थीं, जिन्होंने इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल का प्रत्यक्ष अनुभव किया और इस पर रिपोर्टिंग की। उस समय तवलीन सिंह द स्टेट्समैन समाचार पत्र के साथ अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत कर रही थीं। 26 जून 1975 की सुबह, आपातकाल की घोषणा के दिन, सिंह बताती हैं कि उन्हें पता चलते ही वह कार्यालय गईं और वहाँ सभी प्रेस प्रतिबंधों को लेकर चिंतित थे। कई समाचार पत्रों ने सेंसरशिप का प्रारंभिक विरोध किया था, और द स्टेट्समैन ने एक संस्करण में उन लेखों के स्थान को खाली छोड़ दिया था, जिन्हें सेंसर कार्यालय ने हटा दिया था। इससे मीडिया पर पड़ रहे दबाव और मीडिया द्वारा किए जा रहे प्रतिरोध की जानकारी मिलती है। आपातकाल के दौर में सिंह बताती हैं कि दिल्ली में भयावह माहौल था और पत्रकारों पर सरकार की आलोचना करने पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही थी। कुलदीप नायर, वीरेन्द्र कपूर जैसे अनेक वरिष्ठ पत्रकारों को मीसा के तहत गिरफ्तार किया जा चुका था, जिससे प्रेस और अधिक भयभीत थी।
तवलीन सिंह ने अपने इन अनुभवों को अपनी आत्मकथा ‘दरबार’ में विस्तार से बताया है। उन्होंने पत्रकारों के समक्ष आने वाली चुनौतियों और कठोर सेंसरशिप के बारे में लिखा। सिंह ने यह भी बताया कि संजय गांधी की नीतियों, जैसे जबरन नसबंदी और झुग्गियों को हटाने के कारण आम जनता में असंतोष बढ़ रहा था। इस कारण रिक्शेवाले और आम लोग भी आपातकाल विरोधी आंदोलनों को आर्थिक सहायता देने लगे।
1977 के चुनाव से पहले, दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित एक बड़ी विपक्षी रैली को कवर करते हुए, सिंह बताती हैं कि वहाँ अटल बिहारी वाजपेयी ने लोकतांत्रिक अधिकारों के दमन की आलोचना करते हुए प्रखर भाषण दिया। वहाँ पर बड़ी संख्या में भीड़ की मौजूदगी को देखकर उन्हें यह अंदाजा हो गया था कि इंदिरा गांधी की सरकार चुनाव हार सकती है। तवलीन सिंह ने अपनी रिपोर्टिंग के माध्यम से आपातकाल के दौरान और उसके पश्चात भी सेंसरशिप और राजनीतिक दमन के विरोध में लगातार लिखा।
4.4 नयनतारा सहगल
नयनतारा सहगल मुख्यतः एक उपन्यासकार के रूप में जानी जाती हैं, लेकिन वे आपातकाल के दौरान एक प्रमुख राजनीतिक लेखक और टिप्पणीकार भी थीं, जिनकी रचनाएं लोकतान्त्रिक मूल्यों, नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करती थीं। नयनतारा सहगल उस दौर में ‘द संडे स्टैण्डर्ड’ साप्ताहिक समाचार पत्र में नियमित राजनीतिक स्तंभ लिखती थीं। आपातकाल के लागू होने से पहले भी वे कांग्रेस पार्टी के भीतर बढ़ते सत्ता केंद्रीकरण और इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व आधारित राजनीति के उभार की आलोचना करती थीं। सहगल का तर्क था कि उस समय लोकतान्त्रिक संस्थाएं कमजोर हो रही थीं और राजनीतिक व्यवस्था के भीतर असहमति को दबाया जा रहा था।
उनका विरोध अधिक स्पष्ट तब हुआ जब वे 1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बिहार में चल रहे लोकतान्त्रिक छात्र आन्दोलन और दमनकारी सरकार के खिलाफ बढ़ती राजनीतिक लामबंदी का प्रत्यक्ष अनुभव किया। सहगल ने ‘एवरीमैन्स वीकली’ के लिए लेखों के माध्यम से इस आन्दोलन का दस्तावेजीकरण किया। इन लेखों में सरकार की दमनकारी नीतियों की आलोचना की गई और सरकार के खिलाफ बढ़ते जनविरोध को दिखाया गया।
आपातकाल की घोषणा होने के साथ ही प्रेस सेंसरशिप व्यापक हो गई, और अखबारों को सरकार की आलोचनात्मक टिप्पणियों को प्रकाशित करने की अनुमति न मिलने के कारण नयनतारा सहगल के आलेख आना बंद हो गए। उन्होंने सेंसरशिप का विरोध किया और अपने लेखों को सरकारी अनुमति से प्रकाशित करवाने से भी इनकार कर दिया। मीसा के तहत जब कई विपक्षी नेताओं और आलोचकों को गिरफ्तार किया जा रहा था, तब उन पर भी गिरफ्तारी की तलवार लटक रही थी। इसके बावजूद सहगल ने लोकतान्त्रिक अधिकारों के दमन और विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी के खिलाफ आवाज उठाना जारी रखा।
आपातकाल समाप्त होने के बाद नयनतारा सहगल ने 1977 में आपातकाल के दमन को अपनी पुस्तक ‘इंदिरा गांधीज इमरजेंसी एंड स्टाइल’ में विस्तार से बताया। सहगल ने इस पुस्तक के माध्यम से दर्शाया कि सत्ता का केंद्रीकरण और असहमति का दमन भारत की लोकतान्त्रिक व्यवस्था को कमजोर कर रहा था। उनका प्रयास था कि इस पुस्तक के माध्यम से उन लोगों को अभिव्यक्ति दी जाए जिनकी आवाज आपातकाल में दबा दी गई थी। नयनतारा सहगल ने अपने स्तंभ, लेख और पुस्तक के माध्यम से दमनकारी शासन का प्रतिरोध किया और भारत के राजनीतिक इतिहास के इस विवादास्पद दौर का दस्तावेजीकरण किया।
5. पत्रकारों का विरोध
पत्रकारों ने आपातकाल का प्रतिरोध करने के लिए कई प्रकार की रणनीतियाँ अपनाईं। समाचार पत्र बिना सेंसरशिप नियमों का उल्लंघन किए अप्रत्यक्ष भाषा, प्रतीकात्मक रूप से तथा कानून का सहारा लेकर विरोध करते थे। बाॅम्बे उच्च न्यायालय द्वारा अप्रैल 1976 में बिनोद राव बनाम एम.आर. मसानी केस में दिए गए फैसले ने पत्रकारों को सरकार की सीमित आलोचना करने का अधिकार दिया। इस फैसले के परिणामस्वरूप हिम्मत पत्रिका और द इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबारों का हौसला बढ़ा। परिणामस्वरूप सख्त सेंसरशिप लागू होने के बावजूद भी कई पत्रकारों ने जबरन नसबंदी अभियान, मानवाधिकारों के उल्लंघन और झुग्गी-झोपड़ियों को ध्वस्त करने जैसे विषयों पर रिपोर्टिंग की। इन पत्रकारों की साहसिक रिपोर्टों ने आपातकाल से संबंधित चर्चा और ऐतिहासिक लेखों के लिए महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध कराई।
6. आपातकाल के अनुभवों पर चिन्तन
आपातकाल की समाप्ति के बाद 1977 में जब पत्रकारों ने इस लोकतांत्रिक मूल्यों के पतन के दौर की ओर मुड़कर देखा, तो उन्होंने पाया कि प्रेस की स्वतंत्रता ही स्वस्थ लोकतंत्र की आधारशिला है। कल्पना शर्मा का मानना है कि प्रेस के स्वतंत्र न होने का सबसे बड़ा नुकसान हाशिये पर रह रहे समाज को होता है, क्योंकि फिर उनके संघर्षों को स्वर देने वाला कोई नहीं रहता। कल्पना शर्मा के अनुसार स्वतंत्र पत्रकारिता लोकतांत्रिक संस्थाओं और मूल्यों की रक्षा के लिए आवश्यक है, और यह समकालीन मीडिया को समझना होगा। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नायर का मानना था कि प्रेस पर प्रकाशन से जुड़ी कई पाबंदियों के कारण मानवाधिकारों के हनन, जबरन नसबंदी और जेल में यातनाओं जैसी घटनाओं की रिपोर्टिंग नहीं हो पाई।
7. निष्कर्ष
आपातकाल का दौर (1975-1977) भारतीय लोकतंत्र एवं प्रेस स्वतंत्रता के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ। इस दौरान सरकार ने लोकतांत्रिक संस्थाओं और मूल्यों के हनन का प्रयास किया, लेकिन कई साहसी पत्रकारों ने डटकर सेंसरशिप का मुकाबला किया। इस दौर में कूमी कपूर, कल्पना शर्मा, तवलीन सिंह और नयनतारा सहगल जैसी महिला पत्रकारों ने विपरीत परिस्थितियों में भी सेंसरशिप का विरोध किया और रिपोर्टिंग जारी रखी। उनके अनुभवों से यह स्पष्ट होता है कि विकट परिस्थितियों में इस प्रकार की पत्रकारिता के लिए नैतिकता और साहस की आवश्यकता होती है। गिरफ्तारी के डर, सेंसरशिप और सरकारी दबाव के बावजूद, इन पत्रकारों ने रिपोर्टिंग जारी रखी।
आपातकाल के दौरान महिला पत्रकारों का अनुभव यह रेखांकित करता है कि उस समय पत्रकारिता में अपेक्षाकृत कम संख्या में महिलाएं कार्यरत थीं और उन पर पारिवारिक दायित्वों का अतिरिक्त भार भी रहता था। फिर भी, ऐसे कठिन समय में बिना पुलिस और नौकरी खोने के डर से तानाशाही और राजनीतिक दमन का प्रतिरोध करना उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इन महिलाओं का योगदान आपातकाल की ऐतिहासिक समझ विकसित करता है, साथ ही स्वतंत्र मीडिया की लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा में उनकी भूमिका को भी रेखांकित करता है।
संदर्भ सूची
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शोधार्थी, पत्रकारिता विभाग
जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर
Email: rathoredasharath@gmail.com
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Research Article

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