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बोधिसत्व की कविताओं में सामाजिक सरोकार का स्वर : कोमल भारती

शोध सार

यह शोधपत्र समकालीन हिंदी कविता के महत्त्वपूर्ण कवि बोधिसत्व (अखिलेश मिश्र) के काव्य-संसार का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। 11 दिसंबर 1968 को जन्मे कवि का रचनात्मक व्यक्तित्व गाँव की लोक-संवेदना और महानगरीय जीवन के संघर्ष के बीच विकसित हुआ है। उनके काव्य-संग्रह ‘सिर्फ कवि नहीं’ (1991), ‘हम जो नदियों का संगम हैं’ तथा ‘दुःख-तन्त्र’ (2004) में ग्रामीण जीवन, सामाजिक विषमता, श्रमजीवी वर्ग, स्त्री-पीड़ा और मानवीय मूल्यों के क्षरण का सशक्त चित्रण मिलता है।

बोधिसत्व की कविता लोकधर्मी चेतना, प्रगतिशील दृष्टि और संवेदनात्मक गहराई से सम्पन्न है। वे अवधी शब्दावली और लोक-प्रतीकों के माध्यम से पूर्वांचल की सांस्कृतिक विरासत को अभिव्यक्ति देते हैं। ‘पागलदास’ जैसी कविताएँ सामाजिक न्याय, नैतिक मूल्यों और समय की विडम्बनाओं पर तीखा प्रश्न उठाती हैं, जिसके लिए उन्हें भारतभूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार प्राप्त हुआ। उनकी कविताओं में शोषितों, दलितों, मजदूर औरतों तथा बाल श्रमिकों की पीड़ा को स्वर मिला है।

साथ ही, पारिवारिक संबंधों, प्रेम, करुणा और निजी अनुभूतियों का मार्मिक चित्रण उनके काव्य को मानवीय ऊष्मा प्रदान करता है। निजी दुःख का सामूहिक संवेदना में रूपांतरण उनकी काव्य-दृष्टि की विशेषता है। यह अध्ययन निष्कर्ष रूप में स्थापित करता है कि बोधिसत्व समकालीन हिंदी कविता में लोकजीवन, सामाजिक प्रतिबद्धता और मानवीय करुणा के सशक्त प्रतिनिधि कवि हैं।

बीज शब्द — संवेदना, मानवीय, काव्य-दृष्टि, सामाजिक, नैतिक, विडम्बना

The Tone of Social Concern in the Poetry of Bodhisattva
 
Abstract

This research paper presents an analytical study of the poetic world of Bodhisattva (Akhilesh Mishra), an important poet of contemporary Hindi literature. Born on 11 December 1968, his creative personality evolved between the folk sensibilities of rural life and the struggles of metropolitan existence. His poetry collections Sirf Kavi Nahin (1991), Hum Jo Nadiyon Ka Sangam Hain, and Dukh-Tantra (2004) portray rural life, social inequality, the working class, women’s suffering, and the erosion of human values with remarkable intensity. Bodhisattva’s poetry is enriched with folk consciousness, progressive vision, and deep emotional sensitivity. Through Awadhi vocabulary and folk symbols, he articulates the cultural heritage of Eastern Uttar Pradesh. Poems such as Pagaldas raise sharp questions about social justice, moral values, and contemporary contradictions, for which he received the Bharat Bhushan Agrawal Memorial Award. His poetry gives voice to the pain of the oppressed, Dalits, working women, and child labourers. At the same time, his sensitive depiction of familial relationships, love, compassion, and personal experiences lends warmth and human depth to his work. The transformation of personal grief into collective sensibility is a distinctive feature of his poetic vision. This study concludes that Bodhisattva stands as a powerful representative of folk life, social commitment, and human compassion in contemporary Hindi poetry.

Keywords: Sensibility, Humanism, Poetic Vision, Social Concern, Moral Values, Irony


शोध आलेख

समकालीन दौर में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत कुछ तेजी से बदल रहा है, तब भी बोधिसत्व का दिल और दिमाग अपने गाँव कुरुबजवार की गलियों, खेत-खलिहानों में ही विचरण करता रहा है। मुंबई में रहते हुए भी वे अपने परिवार, गाँव के लोगों और बीते हुए पलों को नहीं भूल पाए। 11 दिसंबर 1968 को जन्मे अखिलेश मिश्र ने इलाहाबाद से उच्च शिक्षा प्राप्त की और बाद में मुंबई में रहने लगे। उनके पहले काव्य-संग्रह ‘सिर्फ कवि नहीं’ और दूसरे संग्रह ‘हम जो नदियों का संगम हैं’ में गाँव की यादें और महानगर का संघर्ष झलकता है।

बोधिसत्व ने अपनी कविताओं के माध्यम से निराला और नागार्जुन जैसे महान कवियों को श्रद्धांजलि दी। 1991 में प्रकाशित उनके पहले काव्य-संग्रह ‘सिर्फ कवि नहीं’ के साथ उनका साहित्यिक जीवन शुरू हुआ। उनकी कविता ‘तुम्हारी आँखों में मधुर आँच में क्या सिझ रहा है’ ने बहुत कुछ व्यक्त किया। बोधिसत्व की कविताओं में ग्रामीण जीवन की झलक और लोक-संवेदना साफ दिखाई देती है। उनकी रचनाएँ पूर्वांचल की माटी और भदोही जनपद के भिखारी रामपुर गाँव की संस्कृति से गहरे जुड़ी हुई हैं।

1999 में रचित ‘पागलदास’ कविता के लिए उन्हें वर्ष 2000 में भारतभूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके बाद उन्हें कई अन्य साहित्यिक सम्मानों से नवाजा गया, जिनमें संस्कृति सम्मान, हेमंत स्मृति और गिरिजाकुमार माथुर स्मृति सम्मान शामिल हैं। बोधिसत्व का तीसरा काव्य-संग्रह ‘दुःख-तन्त्र’ 2004 में प्रकाशित हुआ। उन्होंने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में रिसर्च असिस्टेंट के रूप में तीन वर्षों तक हिंदी लेखकों की पांडुलिपियों की खोज का काम किया, जिसके बाद वे स्वतंत्र लेखन की ओर अग्रसर हो गए।

बोधिसत्व का पहला परिचय एक लोकजीवन के कवि के रूप में होता है। वे अपने कवित्व का प्रचार नहीं करते और न ही खुद को महान कवि मानते हैं। ‘कविता समाज के हारे-गाढ़े काम दे’ शीर्षक आत्मकथ्य में उन्होंने कहा है कि उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण वह क्षण होता है, जब कविता अचानक उत्पन्न होती है। कविता का अस्तित्व पहले से कहीं नहीं होता, वह कवि की संवेदनशीलता पर निर्भर करता है कि वह सूक्ष्म तरंगों को पकड़ पाए। बोधिसत्व ने कहा कि वे अपनी हर कविता में किसी से बात करते हैं और उसकी सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर भाषा, बिंब और प्रतीकों का चयन करते हैं। उनकी कविताओं में अवधी के शब्द इसलिए आते हैं क्योंकि वे इस क्षेत्र के लोगों के लिए लिखी गई हैं।

उनके पहले काव्य-संग्रह ‘सिर्फ कवि नहीं’ की ज्यादातर कविताएँ लोक-संवेदनाओं पर आधारित हैं। ‘आसान नहीं है’ कविता में वे अपने व्यक्तित्व का विश्लेषण करते हैं। वे मानते हैं कि उनके जीवन का एक पक्ष कठोर परिस्थितियों का सामना करता है, जबकि दूसरा पक्ष कोमलता से भरा है, जो थोड़े से प्यार से पिघल जाता है और दूसरों को सुख भी देता है। कविता ‘हमारा सफर’ में उन्होंने अपने जीवन के कठिन अनुभवों का चित्रण किया है। इसके अलावा, ‘आवाज’, ‘चाहता हूँ’, ‘सुक्खू मुसहर’, ‘सुनो बुद्ध सुनो’ और ‘मजदूर औरतें’ जैसी कविताओं में उनकी प्रगतिशील चेतना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

बोधिसत्व अपने स्वर को धरती का स्वर बनाकर शोषितों और दलितों को उन बुनियादी सवालों पर ध्यान देने के लिए प्रेरित करना चाहते हैं, जिनके बारे में वे सालों से चुप हैं। उन्हें कभी बोलने का मौका ही नहीं मिला और उन्होंने यह मान लिया कि अगर वे बोलेंगे तो सिर्फ नुकसान होगा। इसी कारण उन्होंने मौन साध लिया है। कवि उन आँखों में अपना अक्स देखना चाहता है, जिनमें जीवन की कोई स्पष्ट छवि नहीं उभरी है। बोधिसत्व समाज की इस अमानवीय स्थिति के लिए जिम्मेदार लोगों से मुकाबला करने के लिए मजदूर औरतों को जागरूक और प्रेरित करते हैं।

“हम अपने देश के / रक्तखोरों को / जुबान देते हैं कि / हम लड़े बगैर नहीं
मरेंगे हम अपने बाप के / बुन्द की कसम लेते हैं
कि हर हालत में / धधकाए रखेंगे / मजदूरा औरतों की छाती की आग।”

बोधिसत्व की कविता प्रेम और पारिवारिक संवेदनाओं की कविता है। उनकी कविताएँ जैसे ‘काकी’, ‘माँ को पत्र’, ‘धनियाँ से एक सवाल’, ‘विदा के समय’, ‘पिता’, ‘लौट गए पिता’, ‘बाबू के लिए’ आदि उनके पारिवारिक संबंधों की मानवीय भावनाओं को गहराई से उकेरती हैं। दूसरी ओर, ‘बो दूँ कविता’ रति-क्रीड़ा की तीव्र श्रृंगारिक भावनाओं को व्यक्त करती है, जैसे —

“तुम मुझे तापो तुम मुझे छुओ इतनी छूट दो कि तुम्हारे बालों में
अँगुलियाँ फेर सकूँ तोड़ सकूँ तुम्हारी अँगुलियाँ
नाप सकूँ तुम्हारी पीठ।”

इस संग्रह की बाकी कविताएँ प्रकृति-प्रेम, ऐतिहासिक चरित्रों, लोकसंस्कृति, देशप्रेम और स्त्री-बाल मजदूरों पर लिखी हैं। ‘पलामू’ कविता में कवि ने भदोही के कालीन कारखानों में काम करने वाले बच्चों की पीड़ा का मार्मिक चित्रण किया है, जो बालश्रम पर बने कानूनों पर गंभीर सवाल उठाती है। बोधिसत्व ने ‘दिया बाती’, ‘टूटी दियली’, ‘वहाँ औरतें’ जैसी कविताओं में लोकजीवन का चित्रण किया है, जबकि ‘साँझ के माथे पर’, ‘यह पृथ्वी’, ‘बादल’ जैसी कविताएँ कुदरत और जिंदगी के रिश्तों को एक नया दृष्टिकोण प्रदान करती हैं।

“वहाँ औरतें बरतन माँजकर / लेउ लगा रही हैं। वहाँ औरतें धो और सुखा
रही हैं केश, गाँछ रही हैं / चोटियाँ, भर रही हैं पाँव
लेप रही हैं दुःख के गलके पर नोना-माटी / पूछ रही हैं कुसल-क्षेम।”

दो सदियों के संगम के समय में बोधिसत्व का दूसरा काव्य-संग्रह ‘हम जो नदियों का संगम हैं’ उनकी काव्य-दृष्टि और संवेदनाओं को और अधिक परिपक्व और विस्तृत रूप में प्रस्तुत करता है। बकौल बिन्दु अग्रवाल, एक कवि को रडार की तरह हमेशा ऑन रहना पड़ता है; जो कुछ अनहोना दिखे, अपूर्व दिखे, उसे तत्काल आत्मसात् करने के लिए जागता रहे। कबीर का जागना और रोना अपने समाज में रडार की तरह ऑन रहने के कारण था। सूझ रही कविता को कवि काफी सोच-समझकर चुनता है। मन में उस कविता के प्रबोध होने पर कवि उसे भाषाबद्ध करता है। यह परम्परा कविता में पहले से विद्यमान है। बिना आँखिन देखे, बिना मन-प्रबोध के लिखना पहले भी नहीं हुआ।

इस संग्रह की प्रारंभिक कविताएँ ‘पागलदास’, ‘जाता हूँ’ और ‘पूरब पश्चिम’ नए विचारों और संवेदनाओं को दर्शाती हैं। कवि को प्रवास की स्वतंत्रता, सुख और पश्चिमी संस्कृति भाती नहीं है। उसे अपनी मिट्टी और मूल्यों से गहरा लगाव है। जब कवि अयोध्या में ‘पागलदास’ की खोज करता है, तो उसे खुद का ही प्रतिबिंब दिखाई देता है।

“जो दूसरे पागलदास थे / वे न्याय चाहते थे
चाहते थे रक्षा हो सच की / बची रहे मर्यादा अयोध्या की
सहन नहीं होता था कुछ भी उल्टा-सीधा / क्रोधी थे, पहले पागलदास की तरह
सिर्फ अपने भर से नहीं था काम-धाम / पहले पागलदास की तरह उदास होकर
बैठ नहीं गये थे घर के भीतर।”

शताब्दी के अंत में मानवीय मूल्यों के टूटने और बिखरने की पीड़ा को कई कवियों ने व्यक्त किया है। इनकी कविता ‘पागलदास’ अपने समय की विभिन्न परतों को उजागर करती है। आज कई पागलदास अपनी पखावज बजाकर समय और समाज से संघर्ष करते हुए गुमनामी की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन उनको हौसला देने वाला कोई नहीं है। कवि की तकलीफ़ ‘पागलदास’ जैसे मूल्यवान व्यक्तियों को बचाने की असफल कोशिश है, लेकिन ऐसे किरदारों का कत्ल रोज हो रहा है। उनकी ‘दुःख-तन्त्र’ कविता की पंक्तियों में संवेदनहीन होकर मूल्यहीनता के साथ जीने वालों पर करारा व्यंग्य है।

कवि की ‘मेले में’ और ‘शोक मनाने दो’ कविता में शासन की क्रूरता की झलक दिखाई गई है। ‘मुझे हर उस शिशु का शोक मनाने दो / जिसकी हत्या पर जश्न कहीं मनाया गया।’ जैसी पंक्तियाँ निठारी हत्याकांड की और वैसी अमानवीयता भरी यादों को भड़का देती हैं। उनकी ‘गन्ध’ कविता मनुष्य की संकीर्ण सोच की गवाही देती है। ‘पुराने-जैसा’ और ‘पहचान’ कविताओं में क्रमशः गुजरती हुई जिंदगी और क्षीण होती हुई भारतीय संस्कृति का वास्तविक चित्रण हुआ है।

स्वतंत्रता के बाद क्षेत्रीयता और अलगाव की भावना जिस तरह गहरा रही है, उससे अखण्ड भारत की भावना को ठेस पहुँचती है। कई क्षेत्रीय पार्टियों का आंचलिक रंग महाराष्ट्र, दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर भारत में गाढ़ा होता जा रहा है।

“मैं पूछ रहा हूँ बार-बार / कि वे मुझे सोते-जागते
बाहरी कह रहे हैं / क्या मैं बाहरी हो जाऊँगा? वे चाहते हैं
मैं अपनी जमीन-जायदाद / अपने पुरखों की कब्रें, अपने चौदहवीं के चाँद को
अपनी बोयी हुई फसल को और / अपने खून में घुले हुए देश को
छोड़ दूँ। और कहूँ गंगा मेरी नहीं, यह देश मेरा नहीं / फिर तो / सूर्य की किरनें मेरी नहीं
चौदहवीं का चाँद मेरा नहीं और
कोई भी कविता मेरी नहीं।”

इस संग्रह की अन्य कविताओं में भी कवि की प्रगतिशील दृष्टि और गहरी हो गई है। उसने गाँव की संकरी गलियों से निकलकर अब व्यापक मैदान की ओर कदम बढ़ा लिया है, जिससे उसकी संवेदनाएँ और विस्तृत हो गई हैं। बोधिसत्व की ‘जोगी’ कविता पालिश करने वाले बच्चों की भाव-भंगिमाओं का मार्मिक चित्र प्रस्तुत करती है। कुछ पंक्तियाँ—

“वे जूतों की तलाश में घूमते हैं ब्रश लेकर / और मिलते ही बिना देर लगाए
ब्रश को गज की तरह चलाने लगते हैं / जूतों पर
गोया जूते उनकी सारंगी हों। क्या दावे से कहा जा सकता है कि
उन्हें जूतों से प्यार है, जबकि फूल की तरह खिल उठते हैं / जूतों को देखकर वे?”

इसी तरह ‘हम’, ‘और कहीं’, ‘उजड़ा हुआ दिन’, ‘मानबहादुर’, ‘चिट्ठी’, ‘प्लेटफार्म नं. चार’, ‘तुम्हारे पास’ आदि कविताओं में कवि के प्रगतिशील दृष्टिकोण के कई रूप देखने को मिलते हैं। कवि ने अपनी रचनाओं में पत्नी के प्रति प्रेमपूर्ण भावनाओं, परिवार की सुख-शांति की इच्छा और माता-पिता, काका-काकी, बहन आदि के प्रति अपनी निजी अनुभूतियों का संवेदनशील चित्रण किया है। बोधिसत्व की कविताओं जैसे ‘स्त्री’, ‘तुम्हारे पास’, ‘नहीं जान पाया’, ‘अन्धी स्त्री’, ‘श्रृंगारदान में धूल’, ‘बाहर झाँकती आँखें’, ‘उसे पता था’, ‘वह चाहती थी’, ‘घर में’, ‘बिना बताए’, ‘निरंजना के उस पार’, ‘माँ का नाच’ आदि में भीख माँगती स्त्री, पुरुष के प्रति आजीवन समर्पित नारी, दुखों से ग्रसित अन्धी स्त्री, मायका और ससुराल में अत्याचार सहने वाली नारी, ढलती उम्र में भी अपने सौंदर्य को सँवारने वाली नारी, एक श्रमिक हलवाहे की पत्नी की पीड़ा और फटी हुई बिवाइयों के साथ झुकी हुई कमर वाली माँ के नृत्य को विभिन्न भावनाओं और अर्थों के साथ प्रस्तुत किया गया है।

अंतिम दशक के दौरान, जब जीवन और साहित्य में कई नए परिवर्तन हो रहे थे, तब नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं में ग्रामीण जीवन और लोकजीवन की झलक और उसके क्रमिक विकास को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इस संदर्भ में अष्टभुजा शुक्ल, बोधिसत्व, निलय उपाध्याय, एकान्त श्रीवास्तव और मदन कश्यप जैसे कवियों के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। बोधिसत्व की कविताएँ पढ़ने पर ऐसा लगता है कि उनके भीतर दुःख का एक गहन संसार बसा हुआ है। कवि का यह दुःख घरेलू जीवन से निकलकर सामूहिक जीवन का रूप ले लेता है, जिसमें गहरी उदासी, हताशा और निराशा झलकती है।

बोधिसत्व का तीसरा काव्य-संग्रह ‘दुःख-तन्त्र’ 2004 में प्रकाशित हुआ। यह संग्रह दो खंडों में विभाजित है और इसमें भी कवि के निजी जीवन के अनुभवों पर आधारित कविताएँ शामिल हैं। इनमें उनके परिवार, गाँव, इलाहाबाद, तिब्बत की यादें और अन्य विभिन्न प्रसंगों से संबंधित रचनाएँ मिलती हैं। इन कविताओं में कोई विशेष विचारधारा या समकालीन जीवन की हलचल का प्रतिबिंब नहीं मिलता।

कोमल भारती
शोधार्थी
तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय, तिरुवारूर

Email: komalbharti458@gmail.com





संदर्भ सूची :

1. सिर्फ कवि नहीं, बोधिसत्व, लोकभारती प्रकाशन, 2007, पृ. 68

2. सिर्फ कवि नहीं, बोधिसत्व, लोकभारती प्रकाशन, 2007, पृ. 30

3. वही, पृ. 71

4. हम जो नदियों का संगम हैं, बोधिसत्व, राधाकृष्ण प्रकाशन, 2000, पृ. 13

5. हम जो नदियों का संगम हैं, बोधिसत्व, राधाकृष्ण प्रकाशन, 2000, पृ. 21

6. हम जो नदियों का संगम हैं, बोधिसत्व, राधाकृष्ण प्रकाशन, 2000, पृ. 29




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