धूल भरा मैला सा आँचल : डॉ. चन्दन कुमार
शोध सारांश
हिन्दी साहित्य के इतिहास में 'मैला आँचल' उपन्यास का प्रकाशन (1954 ई.) एक विस्फोट की तरह हुआ। आंचलिक उपन्यासों की नई धारा स्थापित करने के बावजूद ‘मैला आँचल' आंचलिक उपन्यासों की परंपरा में सर्वश्रेष्ठ रचना साबित हुई। इस परंपरा में नागार्जुन का ‘रतिनाथ की चाची', 'बलचनमा', उदयशंकर भट्ट का 'सागर, लहरें और मनुष्य', रांगेय राघव का 'कब तक पुकारूँ', रामदरश मिश्र का 'पानी के प्राचीर’, भैरवप्रसाद गुप्त का 'सती मैया का चौरा', राही मासूम रजा का ‘आधा गाँव', मनोहर श्याम जोशी का ‘कसप' आदि कई उपन्यास अंचल विशेष को नायकत्व प्रदान करते हुए प्रकाशित हुए।
बीज शब्द: मैला आँचल, फणीश्वरनाथ रेणु, आंचलिक उपन्यास, ग्रामीण राजनीति, जातिवाद, दलित-चेतना, औपनिवेशिक व्यवस्था, सामाजिक न्याय
Maila Anchal: A Dust-Laden Regional Narrative of Social and Political Realities
Abstract
In the history of Hindi literature, the publication of the novel ‘Maila Anchal’ (1954) marked a revolutionary moment. While it initiated a new stream of regional (anchalik) fiction, ‘Maila Anchal’ also proved to be one of the finest works within this tradition. Alongside it, several other significant novels oregrounded specific regions as central narrative forces, including ‘Ratinath Ki Chachi’ and ‘Balchanma’ by Nagarjun; ‘Sagar, Laharen aur Manushya’ by Uday Shankar Bhatt; ‘Kab Tak Pukaroon’ by Rangeya Raghav; ‘Pani ke Prachir’ by Ramdarash Mishra; ‘Sati Maiya ka Chaura’ by Bhairav Prasad Gupta; ‘Aadha Gaon’ by Rahi Masoom Raza; and ‘Kasap’ by Manohar Shyam Joshi. These works collectively contributed to establishing the regional novel as a powerful and distinct literary tradition in Hindi literature.
Keywords: ‘Maila Anchal’, Phanishwar Nath Renu, regional novel, rural politics, casteism, Dalit consciousness, colonial system, social justice.
शोध आलेख
फणीश्वरनाथ रेणु ने लोकगीतों, लोक संगीत, लोकभाषा, संस्कृत-अंग्रेजी के शब्दों के लोकप्रचलित तद्भव विकृत रूप, सामाजिक-सांस्कृतिक वर्णनों-चरित्रों के माध्यम से पूर्णिया अंचल को जीवंत कर दिया है। लेखक ने भूमिका में घोषणा करते हुए लिखा है कि उपन्यास का कथानक चरित्रों और घटनाओं से नहीं, बल्कि ‘पूर्णिया’ अंचल से निर्मित हुआ है —"यह है मैला आँचल एक आंचलिक उपन्यास। कथानक है पूर्णिया .... मैंने इसके एक हिस्से के एक ही गाँव को पिछड़े गाँवों का प्रतीक मानकर इस उपन्यास कथा का क्षेत्र बनाया है।"1
इसी भूमिका में रेणु स्पष्ट कर देते हैं कि इसके एक ओर नेपाल है तो दूसरी ओर पाकिस्तान और पश्चिम बंगाल, दक्षिण में संथाल परगना और पश्चिम में मिथिला की सीमारेखाएँ हैं। रेणु अंचल की कथा में अच्छाइयों-बुराइयों के साथ घोषित करते हैं कि — “इसमें फूल भी है, शूल भी; धूल भी है, गुलाब भी; कीचड़ भी है, चन्दन भी; सुन्दरता भी है, कुरूपता भी। मैं किसी से दामन बचाकर निकल नहीं पाया।” 2
पूरे उपन्यास में यही घोषणा साकार होती हुई नजर आती है। मेरीगंज के सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक जीवन की प्रत्येक छोटी-बड़ी घटना पूरे ब्यौरों के साथ वर्णित है। भउजिया गान, जाट-जाटिन का खेल, सुरंगा-सदाब्रिज की कथा, बिदापत नाच, मठ पर बीजक मंत्रों का पाठ उपन्यास की अंतर्धारा में अनवरत गूँजता रहता है। ये सारे प्रसंग अंचल को ही प्रधान चरित्र के रूप में खड़ा करते हैं। उपन्यास के सारे चरित्र परस्पर मिलकर अंचल की ही विशेषता को उभारते हैं।
'मैला आँचल' के कथानक का कालखंड 1946-48 (अप्रैल) के बीच का है। उपन्यास के राजनीतिक घटनाक्रम की अनेक परतें व अनेक स्तर चित्रित हुए हैं। उपन्यास के मूल सवालों में एक सवाल यह भी है कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने जो शासन व्यवस्था भारत में स्थापित की, 1948 में क्या हम उस व्यवस्था की गुलामी से भी मुक्त हुए या सिर्फ चमड़ी का रंग बदला? गोरे शासकों के स्थान पर भूरी या काली चमड़ी के लोगों ने शासन की बागडोर एक स्वतंत्र 'राष्ट्र' के रूप में संभाली? वस्तुतः व्यवस्था वही बनी रही, जो शोषण और दमनकारी उपनिवेशवाद ने अपनी जरूरतों के लिए निर्मित की थी। रेणु ने तो उसी समय ही औपनिवेशिक व्यवस्था को बिना परिवर्तन के अपनाने के खतरों से आगाह कर दिया था।
उपन्यास की कथा में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष के रूप में कांग्रेस पार्टी के अनेक नेताओं का परोक्ष रूप में, या उनके कार्यकलापों की चर्चा के रूप में चित्रण हुआ है। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू व बाबू राजेंद्र प्रसाद का मेरीगंज के जनमानस पर गहरा प्रभाव है।
उपन्यास में विशेष रूप से तीन राजनीतिक दलों की चर्चा है — कांग्रेस, सोशलिस्ट पार्टी, काली टोपी वाले आर. एस. एस.। मेरीगंज अंचल में इन तीनों पार्टियों की खूबियों, विसंगतियों, खामियों को निष्पक्ष, तटस्थ भाव से रेणु ने देखा है।
कांग्रेस के निस्वार्थ व ईमानदार, सिद्धांतवादी कार्यकर्ताओं के रूप में 'डेढ़ हाथ' के बावनदास व बालदेव प्रसाद का अधिक उल्लेख हुआ है। बावनदास जैसे समर्पित कार्यकर्ता इस बात से दुखी, परेशान, निराश, हताश हैं कि —"भारत माता अब भी रो रही हैं। जार-बेजार रो रही रही है।”
धीरे-धीरे जाति राजनीतिक जीवन की धुरी बनने लगी है और कांग्रेस में भी जातिवाद फैलने लगा है। ऐसी स्थिति में बावनदास क्षुब्ध होकर बालदेव से कहता है —"सुराज मिल गया, अब क्या है... छोटन बाबू का राज है। एक कोरी बेमान, बिलेक मारकेटी के साथ कचेहरी में घूमते रहते हैं, हाकिमों के यहाँ दाँत खिटकाते फिरते हैं। सब चौपट हो गया... यह बेमारी ऊपर से आई है। यह पटनियाँ रोग है... अब तो और धूमधाम से फैलेगा। भूमिहार, रजपूत, कायथ, यादव, हरिजन, सब लड़ रहे हैं अगले चुनाव में। तिगुना मेले चुने जाएंगे। किसका आदमी ज्यादा चुना जाए, इसी की लड़ाई है। यदि रजपूत पाटी के लोग ज्यादा आए तो सबसे बड़ा मंत्री भी रजपूत होगा... देस को भस्म कर देंगे ये लोग। भस्मासुर... सोसलिस?... उस पाटी में भी जितने बड़े लोग हैं, मंत्री बनने के लिए मार कर रहे हैं। सब मेले मंत्री होना चाहते हैं, बालदेव। देस का काम, गरीबों का काम, चाहे मजदूरों का काम — जो भी करते हैं, एक ही लोभ से... उस पाटी में बस एक जैपरगास बाबू है, उनको भी कोई गोली मार देगा।”3
बावनदास की तरह पार्टी के सिद्धांतों के रास्ते चलकर कालीचरन यादव सोशलिस्ट पार्टी का गाँव में नेतृत्व संभालता है। कामरेड कालीचरन कामरेड वासुदेव को समझाता है —"यही पाटी असल पाटी है, गरम पाटी है। 'किरांतीदल' का नाम नहीं सुना था?... बम फोड़ दिया फटाक से मस्ताना 'भगतसिंह'... इसमें कोई लीडर नहीं, सभी साथी हैं, सभी लीडर हैं... इस किताब में सब कुछ लिखा हुआ है — बुरजुआ-बेटी दुरजुआ, पूँजीवाद, पूँजीपति, जालिम जमींदार, कमाने वाला खाएगा, इसके चलते जो कुछ हो..." 4
कालीचरन इसी सिद्धांत और आस्था के दम पर मठ का उत्तराधिकार लरसिंघदास के हाथों से महंत रामदास लक्ष्मी कोठारिन को दिलवाता है। हैजा फैलने के समय डॉ. प्रशांत के साथ गाँव के गरीब, बीमार, रोगियों की मदद करता है। फुलिया की इज्जत लूटने वाले सहदेव मिसिर के खिलाफ राजपूत टोली की पंचायत में महंगूदास को न्याय दिलाता है।
आजादी के बाद भी आजादी नहीं मिली जातीय दंभ से। टहलू पासवान का गुरु घोड़ी पर चढ़कर गाँव के अंदर आ रहा था। आगे क्या हुआ, देखिए —"गाँव के बाहर ही सिंह जी ने घोड़ी पर से नीचे गिराकर जूते से मारना शुरू कर दिया था — 'साला दुसाध, घोड़ी पर चढ़ेगा...' धमकी देते हैं कि जूते से रैट करेंगे।”5 जातिवाद के इस विषैले, दमघोंटू परिवेश को बिहार के मेरीगंज अंचल से लेकर अखिल भारतीय स्तर पर आज भी देखा जा सकता है। चुनावी रैलियों, भाषणों, घोषणाओं में तो समानता का अधिकार देने वाले संविधान को जमीन पर उतारने के दावे आज भी किए जा रहे हैं।
मेरीगंज गाँव में —"युगों से पीड़ित, दलित और उपेक्षित लोगों को कालीचरन की बातें बड़ी अच्छी लगती हैं। ऐसा लगता है, काई लगे घाव पर ठंडा लेप कर रहा हो। लेकिन कालीचरन कहता है — मैं आप लोगों के दिल में आग लगाना चाहता हूँ, सोए हुए को जगाना चाहता हूँ। सोशलिस्ट पाटी आपकी पाटी है, गरीबों की, मजदूरों की पाटी है। सोशलिस्ट पाटी चाहती है कि आप अपने हकों को पहचानें। आप भी आदमी हैं, आपको आदमी का सभी हक मिलना चाहिए। मैं आप लोगों को मीठी बातों में भुलाना नहीं चाहता — वह काँगरेसी का काम है। मैं आग लगाना चाहता हूँ।” कालीचरन आग उगलता है, लेकिन सुननेवालों का जलता हुआ कलेजा ठंडा हो जाता है... जमीन जोतनेवालों की। “पूँजीवाद का नाश!”6
सोशलिस्ट पार्टी के आदर्शवादी सिद्धांतों को व्यक्त करने के बाद उसकी विसंगतियों, विडंबनाओं, विदूपताओं, विकृतियों को भी रेणु पड़ताल करके सामने लाते हैं। जाति का विरोध करने वाली इस पार्टी के प्रबंधक मेरीगंज में यादव बहुल आबादी को नेतृत्व के लिए वासुदेव यादव, कालीचरन यादव को चुनते हैं। दफा 40 की अर्जी मंजूर न होने से कालीचरन खुश है, क्योंकि यदि रैयत की दरखास मंजूर हो जाती तो सभी लोग कांग्रेस में चले जाते। अब संघर्ष में सभी सोशलिस्ट पार्टी में ही रहेंगे। एक विकृति ये भी आई कि संघर्ष के नाम पर इसमें डकैतों, खूनियों का प्रवेश होने लगा। सोना जाट और चलित्तर कर्मकार इसके उदाहरण हैं। कम्यूनिस्ट पार्टी तो उसे किसानों, मजदूरों का प्यारा नेता घोषित करके उस पर से वारंट हटाने के लिए मेले में परचा निकालती है।
आर. एस. एस. के दल में अनुशासन ऐसा है कि कार्यकर्ता स्वतंत्र रूप से सोचने को भी स्वतंत्र नहीं है। संयोजक जी आजकल महीने में दो बार घर मनीऑर्डर भेजते हैं। इसी राजनीतिक उथल-पुथल में जब संथाल आदिवासियों व गाँव के प्रभुत्वशाली वर्ग जमींदारों के बीच जमीनों के कब्जे को लेकर संघर्ष होता है, तो सोशलिस्ट कालीचरन और कांग्रेसी बालदेव सभी गाँव के प्रभुत्वशाली वर्गों का साथ देते हैं। इस संघर्ष में चार संथाल व जमींदार वर्ग के दस लोग मरे, संथालिनों के साथ बलात्कार हुआ — “आजादी है, जो जी में आवे करो। बूढ़ी, जवान, बच्ची जो मिले। आजादी है... फाँसी हो या काला पानी, छोड़ो मत।”7
नौ संथाल गिरफ्तार हुए, गैर-संथाल कोई गिरफ्तार नहीं किया गया, क्योंकि पुलिस घूस लेकर जमींदार वर्ग के साथ खड़ी हो गई। आजादी और स्वराज्य क्या था? इसको पाने और मिलने की क्या सार्थकता थी? इसे रेणु ने उपन्यास के दूसरे खंड के एक ही वाक्य में स्पष्ट कर दिया है। संथाल-जमींदार संघर्ष हुआ ब्रिटिश उपनिवेशवादी काल में और इसका अदालती फैसला हुआ आजादी के बाद देशी शासन में। रेणु ने लिखा —
“मुकदमा में भी सुराज मिल गया... सभी संथालों को दामुल हौज (आजीवन कैद) हो गया... मुकदमा उतसब भी सुराज उतसब के दिन होगा?... हाँ, सुराज उतसब दिन में, मुकदमा उतसब रात में।”8
राजनीतिक दलों व शक्तियों की अवसरवादिता को तथा संथालों के साथ हुए अन्याय को रेणु ने गहरी सहानुभूति व संवेदनशीलता से उकेरा है। उपन्यास का अंत आते-आते ईमानदार कांग्रेसी कार्यकर्ता बावनदास, आदर्शवादी, सिद्धांतवादी सोशलिस्ट कामरेड कालीचरन का हश्र भी संथाली आदिवासियों जैसा होता है।
आजादी के बाद काँग्रेस पर भ्रष्ट और आपराधिक तत्वों का नियंत्रण स्थापित हो गया। जुआ कंपनी चलाने वाला तथा नेपाली लड़कियों की तस्करी करने वाला दुलारचंद कापरा अब कटहा थाना कांग्रेस का सेक्रेटरी है, जो दारू, गाँजा, कपड़ा, चीनी, सीमेंट जैसे पदार्थों की भारत-पाकिस्तान में अवैध तस्करी नागर नदी के रास्ते करता है। कांग्रेस शासन में ताकत कालाबाजारी काँग्रेसी दुलारचंद कापरा जैसे लोगों के पास है। सत्ता के तंत्र भी उसी के साथ हैं — पुलिस, इंस्पेक्टर आदि। यही कापरा अपने कालाबाजार के धंधे के लिए गाँधी की हत्या के दिनों में ही गाँधी के प्रिय शिष्य भगवान बावनदास को भी बैलगाड़ियों के नीचे जिंदा ही कुचलवा डालता है।
रेणु ने अप्रैल 1948 के आस-पास उपन्यास का अंत किया है और सत्ता परिवर्तन के 8-9 महीनों में ही कांग्रेस पार्टी के शोषक-शासक रूप को अच्छी तरह उद्घाटित कर दिया है। यह भी संयोग नहीं है कि उपन्यासकार रेणु ने यह हत्या ठीक उसी दिन कराई है, जिस दिन सारा देश गाँधी जी के श्राद्ध का आयोजन कर रहा है। कापरा के रूप में कांग्रेस का नया चेहरा ज्यादा डरावना, भयावह, क्रूर, हत्यारा दिखाई देता है।
मैला आँचल में मेरीगंज अंचल का संपूर्ण जीवन चित्रित और जीवंत हुआ है, लेकिन जिस समस्या को रेणु ने सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना, वह आर्थिक ही है। रेणु स्वयं समाजवाद, जयप्रकाश नारायण व आंदोलनों से जुड़े रहे, इसलिए भी गरीबी, भूखमरी, अकाल, पिछड़ेपन का वर्णन करते चलते हैं। डॉक्टर प्रशांत के माध्यम से रेणु ने यह समस्या विशेष रूप से स्पष्ट की है। डॉक्टर प्रशांत की इच्छा अर्थोपार्जन नहीं, बल्कि गरीबों की सेवा करते हुए काला-आजार के निदान के लिए औषधि खोजना है। वह सोचता है —"आम से लदे हुए पेड़ों को देखने के पहले उसकी आँखें इंसान के उन टिकोलों पर पड़ती हैं, जिन्हें आमों की गुठलियों में सूखे गूदे की रोटी पर जिंदा रखना है... और ऐसे इंसान? भूखे अतृप्त इंसानों की आत्मा कभी भ्रष्ट नहीं हो या कभी विद्रोह नहीं करे, ऐसी आशा करनी ही बेवकूफी है... डॉक्टर यहाँ की गरीबी और बेबसी को देखकर आश्चर्यित होता है। वह संतोष कितना महान है, जिसके सहारे यह वर्ग जी रहा है... कफ से जकड़े हुए दोनों फेफड़े, ओढ़ने को वस्त्र नहीं, सोने को चटाई नहीं, पुआल भी नहीं। भीगी हुई धरती पर लेटा न्यूमोनिया का रोगी मरता नहीं है, जी जाता है... कैसे?... भूख और बेबसी से छटपटाकर मरने से अच्छा है मैलेग्नेंट मलेरिया से बेहोश होकर मर जाना। तिल-तिलकर, घुल-घुलकर मरने के लिए जिलाना बहुत बड़ी क्रूरता होगी... डॉक्टर का रिसर्च पूरा हो गया... डॉक्टर ने रोग की जड़ पकड़ ली है...गरीबी और जहालत — इस रोग के दो कीटाणु हैं।”10
वह एनाफिलिज से भी ज्यादा खतरनाक और सैडफ्लाई से भी ज्यादा जहरीले मेरीगंज और पूर्णिया अंचल के जमींदारों और पूँजीपतियों को मानता है। काली-चरण के भाषण को याद करते हुए वह ममता को पत्र में बताता है कि “ये पूँजीपति व जमींदार, खटमलों और मच्छरों की तरह सोसख हैं.... खटमल। इसलिए बहुत से मारवाड़ियों के नाम के साथ 'मल' लगा हुआ है और जमींदारों के बच्चे मिस्टर कहलाते हैं — मिस्टर... मच्छर!”11
रेणु ने न केवल डाक्टर प्रशांत के माध्यम से गरीबी को मूल समस्या के रूप में पहचाना है, बल्कि यह भी बताया है कि गरीबी के कारण क्या हैं? गरीबी उत्पादकता की कमी से नहीं, बल्कि उत्पादन के वितरण की विषमताओं से पैदा हुई है। जैसे गोदान में होरी मजबूर है कर्ज की समस्या से, वैसे ही मैला आँचल के गरीब किसान। दो महीने की कटनी, एक महीना मड़नी, फिर साल भर की खटनी। साल भर के खाए हुए कर्जों का हिसाब करके चुकाओ, बाकी यदि रह जाए तो फिर सादा कागज पर अंगूठे की टीप लगाओ, फिर कर्ज खाओ। खम्हार का दुष्चक्र किसानों, मजदूरों के जीवन का दुष्चक्र बन जाता है।
कमला नदी के गड्ढों में खिले हुए कमल के फूलों की तरह किशोर-किशोरियों के चेहरे हैं। वे जिंदगी के भोर में बड़े लुभावने, मनोहर व सुंदर दिखाई देते हैं, लेकिन जैसे ही गरीबी, गंदगी, जहालत वाली सूरज की गर्मी उन पर पड़ती है, वे कुम्हला जाते हैं। मेरीगंज अंचल में सुंदरता विकसित होने से पहले ही झुलस जाती है। डॉ. रामदरश मिश्र ने लिखा है — "डाक्टर की यह खोज स्वयं लेखक की खोज है। उस जीवन को देखने की उसकी अपनी दृष्टि है — पूर्ण मानवीय दृष्टि, ममतामयी, यथार्थवादी दृष्टि....”12
एक तरफ डाक्टर प्रशांत गाँव के लिए जीवन को समर्पित करते हैं, दूसरी तरफ तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद 100 बीघे जमीन किसानों में बाँटने की घोषणा करते हैं। जो हृदय परिवर्तन प्रेमचंद के यहाँ होता था (प्रेमाश्रम में), वह रेणु के यहाँ भी है। उपन्यास निराशा-हताशा में उम्मीद की नई किरण लेकर आता है।
दरअसल डॉ. प्रशांत के मेरीगंज में रहकर 'प्यार की खेती' करने के संकल्प तथा विश्वनाथ प्रसाद द्वारा अपनी जमीन का एक हिस्सा मेरीगंज के भूमिहीन किसानों में बाँट देने के निश्चय में रेणु की मानवीयता की तलाश पूरी होती है।
मेरीगंज तत्कालीन भारतीय राजनीति और आर्थिक दशा का लघुरूप (प्रयोगशाला) बन गया दिखता है। तत्कालीन आम आदमी की सरलता, निष्छलता और नैतिक मूल्यों के प्रति आस्था का लाभ उठाकर चालाक राजनीति-व्यवसायी उसे आसानी से ठगता रहा है। मैला आँचल का विश्वनाथ प्रसाद, संयोजक जी, प्रबंधक जी, दुलारचंद कापरा जी, छोटनबाबू, सभापति जी, मंत्री जी राजनीति-व्यवसायियों के प्रतीक भर हैं। आज की भारतीय राजनीति में भी पार्टियों के लिए समर्पित कार्यकर्ता बावनदास, कालीचरन, बालदेव आदि की तरह छले जाते रहे हैं। कहना न होगा कि उपनिवेशवादी दौर की जमींदारी से काँग्रेसी लीडर बने अवसरवादी शोषकों की शोषणकारी राजनीति का पर्दाफाश करती मैला आँचल की कालजीविता कालजयी बनी रहेगी। बकौल कालीचरन 'खटमलों व मच्छरों की तरह सोसख पूँजीपतियों व जमींदारों' को पहचानने की लेखकीय दृष्टि रहेगी।

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