शाेध आलेख : हिंदी उपन्यासों में किन्नर जीवन की अभिव्यक्ति -डॉ. केएम प्रतिभा
आज का दौर अस्तित्व की पड़ताल का दौर है। उत्तर-आधुनिक दौर में हाशिए के अस्मिता समूहों ने अपने अस्तित्व और अधिकारों को लेकर जिस तरह आन्दोलनकारी संघर्ष चलाया है, उसने मुख्यधारा की केन्द्रीय राजनीति में स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यकों के साथ-साथ एक ऐसे समूह को भी जगह दिलाई है जिसके इंसानी वजूद को लंबे समय तक इसलिए नकारा जाता रहा है क्योंकि जेंडर और जाति के श्रेणीबद्ध विभाजन में इनकी गणना कहीं नहीं होती है और इसी के चलते समाज से लगभग बहिष्कृत और अभिशप्त जीवन जीने को मजबूर है। स्त्री-पुरुष से इतर यह वह समाज है जिसे ‘थर्ड जेंडर’ या ‘हिजड़ा’ समाज कहा जाता है। भारतीय समाज में हिजड़ा समुदाय के आगमन और आशीर्वाद को मांगलिक अवसरों पर शुभ माना जाता है, पर विडंबना यह है कि उसके वजूद को किसी अशुभ वस्तु की तरह नकार दिया जाता है।
यदि हिंदी साहित्य में थर्ड जेंडर समुदाय की अभिव्यक्ति की बात की जाए तो सन् 2002 (यमदीप-नीरजा माधव) से पूर्व उनके जीवन और संघर्ष को आधार बनाकर कोई स्वतंत्र साहित्य नहीं मिलता है जबकि उससे पूर्व ही (1994) थर्ड जेंडर समुदाय को वोट करने का अधिकार मिल चुका था। जिसके परिणामस्वरूप सन् 1998 में शबनम मौसी नामक किन्नर मध्य प्रदेश के शहडोल जिले के सोहागपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक भी बन चुकी थीं, जो किन्नरों के अपने संघर्ष का ही परिणाम था। प्रस्तुत शोध आलेख में हिंदी उपन्यासों में किन्नर जीवन का अवलोकन प्रस्तुत किया गया है।
शोध आलेख
किन्नर जीवन से संबंधित अब तक हिंदी में जितनी भी साहित्य-सर्जना हुई है उनमें सबसे समृद्ध कथा साहित्य ही रहा है। हिंदी साहित्य में अब तक किन्नर जीवन की समस्याओं पर आधारित जो भी उपन्यास लिखे गए हैं उनमें ये आठ उपन्यास प्रमुख और सर्वाधिक चर्चित रहे हैं– नीरजा माधव कृत ‘यमदीप’ (2002), अनुसूया त्यागी कृत ‘मैं भी औरत हूँ’ (2005), प्रदीप सौरभ कृत ‘तीसरी ताली’ (2011), महेंद्र भीष्म कृत ‘किन्नर कथा’ (2011) एवं ‘मैं पायल’ (2016), निर्मला भुराड़िया कृत ‘गुलाम मंडी’ (2014), चित्रा मुद्गल कृत ‘पोस्ट बॉक्स नं. २०३ नाला सोपारा’ (2016) तथा भगवंत अनमोल कृत ‘जिंदगी 50-50’ (2017) । इन्हीं उपन्यासों को केंद्र में रखकर नीचे की जा रही है।
यमदीप
‘यमदीप’ को घूरे पर रख देने के बाद उधर मुड़कर भी नहीं देखा जाता है। नीरजा माधव इसी घूर के दीये की तुलना किन्नर समुदाय के लोगों से करती हैं। क्योंकि घूर के दीये के समान ही ‘तीसरे लिंग’ में जन्में बच्चे को निर्वासित करने के बाद कभी उस बच्चे की खोज-खबर भी नहीं ली जाती। ‘यमदीप’ उपन्यास एक मेजर के घर तीसरी संतान के रूप में जन्मी ‘नंदरानी’ की जीवन–यात्रा को चित्रित करती है। माँ की लाडली का ‘नंदरानी’ से ‘हिजड़ा नाजबीबी’ में रूपांतरण अत्यंत हृदयविदारक है। लेखिका ने नंदरानी के माध्यम से परिवार, शिक्षण संस्थाएं, धर्म के ठेकेदार, मीडियाकर्मी, पुलिस, राजनेता आदि सबकी भूमिका की निर्मम पड़ताल की है।
‘यमदीप’ उपन्यास में मेजर के घर में जन्मी नंदरानी वस्तुतः किन्नर है। जिसके जन्म लेने से परिवार के सिर पर जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा हो। थर्ड जेंडर के बारे में फैली नकारात्मक मानसिकता के कारण ही नंदरानी को घर में छिपाकर रखा जाता है। लेकिन जन्म के चार-पांच सालों बाद उसकी एक कटु सच्चाई लोगों के सामने विद्यालय में आ ही जाती है। घर-परिवार अपनों के बीच परायापन का एहसास नंदरानी के लिए जब असह्य हो जाता है तब वह उस तथाकथित घर को सदा के लिए त्यागकर ‘हिजड़ा जमात’ में शामिल हो जाती है। यह उपन्यास नाजबीवी की त्रासदी को चित्रित तो करता ही है साथ में ऐसे माता-पिता और परिवार को भी कठघरे में खड़ा करता है जो अपनी संतान को केवल इसलिए त्याग देता है क्योंकि वह तथाकथित जेंडर की अवधारणा के अनुकूल नहीं है। ‘यमदीप’ का पाठ यह भी स्पष्ट कर देता है कि किन्नर समाज पुलिस तंत्र द्वारा किए जाने वाले यौन हिंसा के भी शिकार होते हैं। केवल पुलिस ही नहीं ‘सेक्स’ की भूख से पीड़ित कई-कई पुरुषों के साथ उन्हें यौन-संबंध बनाने पड़ते हैं। आजीविका के अभाव में वे देह व्यापार करने को भी विवश होते हैं। एकाधिक पुरुषों के साथ संबंध बनाने के कारण वे कई भयंकर रोगों से भी ग्रसित हो जाते हैं।
उपन्यास के मंच पर पर्दा उठते ही जिस मार्मिक घटना से पाठक का साक्षात्कार होता है वह सामान्य मनुष्य समाज की हृदयहीनता तथा स्वार्थ वृत्ति का वीभत्स प्रदर्शन करने वाली तथा नाजबीवी, शबनम, चमेली, मंजू आदि के माध्यम से किन्नर समुदाय में रची-बसी करुणा, संवेदनशीलता आदि के द्वारा उनकी मनुष्यता का अभिषेक करनेवाली है। सड़क किनारे प्रसव पीड़ा से कराहती एक पगली! न जाने किस हैवान की काम वासना का शिकार! आस-पड़ोस का सभी समाज उसकी प्राणान्तक चीखों को नजरंदाज कर आगे बढ़ जाता है। अंततः संवेदनशील हिजड़ों की टोली द्वारा उसका प्रसव कराया जाता है। कन्या को जन्म देकर पगली के मर जाने के कारण हिजड़ों के ऊपर ही उस कन्या के पालन-पोषण का संकट आ जाता है लेकिन वहां पर उपस्थित लोगों द्वारा उस कन्या के पालन-पोषण के लिए राजी न होने के कारण अंततः नाजबीबी यह कहते हुए उसे अपने साथ ले जाने का निर्णय करती है कि “अब कोई पूछनहार नहीं इसका तो क्या हम भी छोड़ जाएंगे? अरे हम हिजड़े हैं, हिजड़े...इन्सान हैं क्या जो मुंह फेर लें।”3 लेकिन नाजबीबी का यह संकल्प इतना आसान नहीं था। पुलिस को खबर पहुंचते ही उस बच्ची (सोना) को हिजड़ों से छीनकर नारी उद्धार गृह भेज दिया जाता है। लेकिन इस नारी उद्धार गृह की सच्चाई यह है कि मजबूर, मासूम लड़कियों को देह व्यापार में धकेल दिया जाता है और उसका विरोध करने पर हत्या तक कर दी जाती है। एक अखबार द्वारा यह खबर मिलते ही नाजबीबी सोना को उस कुचक्र से मुक्ति दिलाने के लिए कमर कस लेती है।
उपन्यास के अंत में ‘मानवी’ नामक पात्र की प्राण रक्षा के लिए नाजबीबी साहसिक प्रयास करती है। लेखिका नीरजा माधव ने उपन्यास का अंत मानवी के उस संकल्प के साथ किया है जिसमें वह भ्रष्ट राजनीतिज्ञ मन्ना बाबू के विरोध में नाजबीबी को चुनाव में खड़ा करना चाहती है। डी.एम. आनन्द का सहयोग उसे प्राप्त है ही। इस प्रकार, उपन्यास का अंत तीनों लिंगों के सहयोगी प्रयास की मधुर कल्याणकारी संकल्पना के साथ होता है। जिसमें आनंद ‘पुल्लिंग’ के प्रतिनिधि हैं, मानवी ‘स्त्रीलिंग’ की और नाजबीबी ‘तीसरे लिंग’ की। स्त्री-पुरुष के अद्वैत की बात तो साहित्य में बार-बार दोहराई गई है, मगर इस सहयोगी-संकल्पना में कभी भी ‘तीसरे लिंग’ को शामिल नहीं किया गया था। उनके सम्मिलन के बिना ‘सम्पूर्ण एकता’ का दावा कितना झूठा, कितना अधूरा था। नीरजा माधव के ‘यमदीप’ के माध्यम से मानों साहित्य ने इस त्रुटि का परिमार्जन कर लिया। नाजबीबी, मानवी और आनन्द का त्रिक सम्पूर्ण मानवता का प्रतीक है। इन तीनों के सहयोग और परस्परता में ही समय के संवादी स्वर गूंजेंगे–नीरजा माधव की यह सुन्दर और मधुर कल्पना शीघ्र ही पूरी तरह साकार हो, तभी तो ‘यमदीप’ की रचना सार्थक होगी।
मैं भी औरत हूँ
समाज में शारीरिक विकृतियों के प्रति अनुदार दृष्टि ही ‘मैं भी औरत हूँ’ उपन्यास के कथानक की प्रेरणा है। अनुसूया त्यागी दो ऐसी जिंदगियों की समस्याओं को इस उपन्यास का आधार बनाती हैं, जो शारीरिक विकृतियों से परेशान हैं। रोशनी और मंजुला, दो चरित्रों के माध्यम से उपन्यास उनके जीवन के अनेक कटु अनुभवों को सामने लाता है। यह उपन्यास स्त्री जीजिविषा को तो दर्शाता ही है, साथ में, ऐसी परिस्थितियों से निजात पाने के लिए उन्हें हौसला भी देता है। इस तरह, इस उपन्यास में इस बात पर जोर दिया गया है कि विज्ञान मनुष्य के जीवन को सुलभ बनाता है। अनेक सामाजिक भ्रांतियों का निवारण कर वह समाज को नई दृष्टि प्रदान कर सकता है। मानवता के बरअक्स खड़ा होकर विज्ञान अनेक जिंदगियों को खुशनुमा बना सकता है।
तीसरी ताली
‘तीसरी ताली’ असामान्य लिंगधारियों की कथा है। इस उपन्यास में हिजड़ा होने की व्यथा बहुत मार्मिक तरीके से उकेरी गई है। गौतम साहब के घर एक बच्चे का जन्म हुआ। कुछ दिनों के अन्दर ही परिवार को पता चल जाता है कि वह किसी काम का नहीं है। बढ़ने के साथ उसका पुरुषांग विकसित नहीं हुआ। दरअसल, बच्चे में स्त्री और पुरुष दोनों के लक्षण थे। इस खबर के बाद से ही गौतम साहब उखड़े-उखड़े रहने लगे थे। इसीलिए एक दिन जब डिम्पल की मण्डली (हिजड़ों की टोली) ने उनके घर दस्तक दी तो उन्होंने दरवाजा ही नहीं खोला।
प्रदीप सौरभ ने इस उपन्यास में एक बालक विनीत के विनीता में बदलने को बहुत मार्मिक तरीके से लिपिबद्ध किया है। समय के साथ विनीत के शरीर में जब हार्मोनल बदलाव आते हैं तो वह इन सबसे आक्रांत हो, घर से भाग जाता है और घर से भागने के बाद उसका सामना एक ऐसी गलीज दुनिया से होता है जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी। तमाम मुश्किलों के बाद वह विनीता के रूप में पार्लर की दुनिया में एक बड़ा मुकाम हासिल करती है।
इस उपन्यास में सुविमल भाई की एक अवांतर कथा भी है जो ‘गे’ हैं और जब उन्हें इसका पता चलता है तो वह ‘गे’ समुदाय के लोगों के हित के लिए आंदोलनरत लोगों में शामिल हो जाते हैं। यास्मीन और जुलेखा की कथा में लेस्बियन संबंध केंद्र में हैं। इस उपन्यास में डिम्पल, मंजू, रजा और कुछ अन्य हिजड़ों की कथा भी है। इसमें हिजड़ा समुदाय के रीति-रिवाज, उनकी परम्परा, मान्यता और संस्कार भी कथा का अंग बनकर आया है। ‘तीसरी ताली’ उपन्यास में आए हिजड़ों, गे आदि की कथा में सबसे महत्त्वपूर्ण है आर्थिक और सामाजिक चुनौतियाँ। हाशिए पर जीवन जीने के लिए अभिशप्त यह समुदाय अपनी आजीविका को लेकर परेशान हैं और सामाजिक स्वीकार्यता के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। इस उपन्यास के पात्रों के बहाने उपन्यासकार ने यह दिखाने की भी कोशिश की है कि आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता हासिल करने के बाद यह समुदाय राजनीतिक हिस्सेदारी के लिए भी सजग हो रहा है।
किन्नर कथा
महेंद्र भीष्म कृत ‘किन्नर कथा’ उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यह एक ऐसी लड़की की कहानी के ताने-बाने पर आधारित है जो महल में जन्म लेती है, परंतु एक पूर्ण स्त्री नहीं होने के कारणवश ठाकुर जगतराज सिंह बुंदेला के द्वारा बच्ची की हत्या के लिए दीवान पंचम सिंह को सौंप दिया जाता है, जिसकी मासूमियत और भोलेपन से प्रभावित होकर पंचम सिंह किन्नरों के मुखिया तारा को पालन-पोषण के लिए समर्पित कर देता है। जिसका नाम सोना की बजाय चन्दा रख दिया जाता है और उसकी किन्नर समाज में परवरिश होती है। इस उपन्यास में किन्नर समाज के बाहर-भीतर की समस्त जानकारियों के साथ उपन्यासकार ने अपने स्तर से बेहद उपयोगी परामर्श और आवश्यक संदेश भी देने की पूरी कोशिश की है, जो प्रशंसनीय है।
किन्नरों की सबसे बड़ी समस्या परिवार द्वारा उनका परित्याग कर देने की है। प्रत्येक हिजड़ा अभिशप्त है, अपने परिवार से बिछुड़ने के दंश से। समाज का पहला घात यहीं से उस पर शुरू होता है। अपने ही परिवार से, अपने ही लोगों द्वारा उसे अपनों से दूर कर दिया जाता है। परिवार के विस्थापन का दंश सर्वप्रथम उन्हें ही भुगतना होता है। किन्नर समुदाय मुख्यधारा के समाज से जुड़ना चाहता है। देश के विकास में वे भी अपना योगदान सुनिश्चित करना चाहते हैं।
इस उपन्यास में किन्नर से संबंधित तथ्यपरक सूचनाएं और जानकारियां भी दी गई हैं। जिसके अनुसार विश्व में 30 प्रतिशत किन्नर ऐसे हैं जो मामूली ऑपरेशन द्वारा पुरुष या स्त्री बनाये जा सकते हैं। आवश्यकता है जागरूकता की, शिक्षा की। उन्हें त्यागने नहीं अपनाने की। हम उनका दर्द व उन्हें इन्सान के तौर पर समझें, न कि हिजड़े के तौर पर। इस तरह इस शोधपरक किन्नर कथा के बहाने लेखक ने उनके जीवन शैली और सामाजिक-पारिवारिक संघर्ष को बेहतरीन अंदाज में चित्रित किया है। ‘किन्नर कथा’ में इस तथ्य का भी खुलासा लेखक ने किया है कि हिजड़े के तौर पर पहचान रखने वालों में अधिकांश लोग वास्तव में हिजड़े नहीं होते बल्कि वर्तमान में बहुतेरे पुरुष भी इसी बहाने रोजी-रोटी कमाने के लिए किन्नर का रूप धारण कर सार्वजनिक स्थानों पर वसूली करते दिखते हैं। इस तरह लेखक ने ‘किन्नर कथा’ के माध्यम से किन्नरों की सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक तमाम मुद्दों पर गंभीरतापूर्वक कलम चलाई है और पूरी ईमानदारी और निष्ठा से अपने लेखकीय दायित्व का निर्वाह किया है।
मैं पायल
गुलाम मण्डी
पोस्ट बॉक्स नं. 203 नाला सोपारा
सन् 2016 में प्रकाशित इस उपन्यास में चित्रा मुद्गल ने समाज में रहने वाले एक ऐसे वर्ग की त्रासदी को मार्मिकता से उभारने का प्रयास किया है जिसे समाज का हिस्सा माना ही नहीं जाता। लेखिका ने किन्नर समुदाय को इस उपन्यास का विषय बनाया है। यह उपन्यास विनोद उर्फ़ बिमली और उसकी बा बंदना बेन के माध्यम से हिजड़ा समाज व उसके त्रासदीपूर्ण जीवन का बड़ी ही मार्मिकता से बयां करता है। एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्में विनोद के हिजड़ा होने का पता हिजड़ों को लग जाता है। अंततः वे विनोद को अपनी टोली में शामिल कर ही लेते हैं लेकिन विनोद चोरी-छिपे अपनी बा से पोस्ट बॉक्स के जरिये से बात करता है। इन पत्रों के माध्यम से विनोद अपने जीवन की त्रासदियों, अपने संघर्ष, अपनी तकलीफों को माँ से साझा करता है। कभी अतीत में बिताए मधुर पलों को याद करता है तो कभी भविष्य की योजनाएं बनाता है और कभी अपने जीवन की निरर्थकता को प्रकट करता है। विनोद लिंगदोषी होने के बावजूद भी हार नहीं मानता है। वह शिक्षा ग्रहण करने के साथ-साथ कंप्यूटर टाइपिंग का कार्य सीखता है और अपने पैरों पर खड़ा होता है। साथ ही राजनीति के जरिये वह हिजड़ा समाज को जागरूक करने का भी प्रयत्न करता है। इसके अलावा यह उपन्यास हिजड़ा समाज के साथ होने वाले बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को भी पूनम नामक पात्र के माध्यम से अत्यंत मार्मिकता से प्रस्तुत किया है। इस तरह यह उपन्यास एक बड़े कैनवास पर पत्र-शैली में गढ़ा गया है।
जिंदगी 50-50
ज़िन्दगी 50-50 सन् 2017 में युवा लेखक भगवंत अनमोल द्वारा लिखा गया उपन्यास है। यह उपन्यास उत्तर प्रदेश के गाँव, बेंगलुरु और मुंबई के बीच फ़्लैशबैक वाली और वर्तमान कहानी के साथ-साथ किन्नरों के जीवन पर भी प्रकाश डालता है। यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो गाँव से निकलकर एक मेट्रो शहर में अपना करियर बनाने के बीच कहीं अपनी जड़ों को भूल जाता है तो कहीं अपने प्यार को। पर जो नहीं भूलता, वो है उसकी संवेदनशीलता। बचपन से ही अपने किन्नर भाई को अपने पिता के हाथों बेवजह अपमानित और प्रताड़ित होते देखना उपन्यास के नायक को बहुत व्यथित करता है। पर तब वह कुछ नहीं कर पाता लेकिन आगे जब परिस्थितियां दूसरी मोड़ लेती हैं तो वह अपनी गलतियों को कतई नहीं दोहराता। यह उपन्यास कुछ प्रश्न भी उठाता है कि आखिर क्यों जेनाइटल डिफॉर्मिटीज़ (जनन-सम्बन्धी विकृति) के साथ पैदा हुए बच्चों को अलग-अलग कर किन्नर के समूह में त्रासदपूर्ण जिंदगी जीने के लिए भेज दिया जाता है? क्यों उन्हें सामान्य मनुष्य या परिवार के सदस्यों की तरह प्यार नहीं किया जाता है?
इस प्रकार, इक्कीसवीं सदी के आरम्भ में हिंदी उपन्यासों की वृहद् परम्परा में किन्नर समुदाय और उनके जीवन को केंद्र में रखकर उपन्यास लिखने की जो कवायद शुरू हुई वह वर्तमान समय में विशेष स्थान प्राप्त कर रहा है। इस विकसनशील परम्परा को ध्यान में रखते हुए हिंदी के कुछ अन्य उपन्यासकारों ने भी किन्नर जीवन सम्बंधित उपन्यास की सर्जना की है। जिसमें ‘अस्तित्व’ (गिरिजा भारती), ‘दरमियाना’ (सुभाष अखिल), ‘आधा आदमी’ (राजेश मलिक) आदि प्रमुख हैं।
निष्कर्ष
2. नीरजा माधव, यमदीप, सामयिक प्रकाशन, दिल्ली, 2017, पृ. 6.
3. वही, पृ. 12.
4. प्रदीप सौरभ, तीसरी ताली, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2011, फ्लैप से
5. महेंद्र भीष्म, मैं पायल, अमन प्रकाशन, कानपुर, 2016, पृ. 16
6. निर्मला भुराड़िया, गुलाम मण्डी, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016, पृ. 7-8.
1. अजय तिवारी, आधुनिकता पर पुनर्विचार, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2012, पृ. 103.
2. नीरजा माधव, यमदीप, सामयिक प्रकाशन, दिल्ली, 2017, पृ. 6.
3. वही, पृ. 12.
4. प्रदीप सौरभ, तीसरी ताली, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2011, फ्लैप से
5. महेंद्र भीष्म, मैं पायल, अमन प्रकाशन, कानपुर, 2016, पृ. 16
6. निर्मला भुराड़िया, गुलाम मण्डी, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016, पृ. 7-8.


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