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‘शिकंजे का दर्द’ में दलित स्त्री का यथार्थ चित्रण

शोध सारांश

सुशीला टाकभौरे की आत्मकथा ‘शिकंजे का दर्द’ समाज की दोहरी मानसिकता, दलित स्त्री जीवन की पीड़ा को उजागर करती है। यह आत्मकथा केवल एक स्त्री की जीवन कथा नहीं, बल्कि भारतीय समाज में दलित स्त्री के साथ सामाजिक भेदभाव व पुरुष मानसिकता को झेलने का दंश है। ‘‘शिकंजे का दर्द’ में संताप है दलित होने का, स्त्री होने का। इसमें शोषित, पीड़ित, अपमानित, अभावग्रस्त दलित जीवन की व्यथा है। स्त्री होना ही जैसे व्यथा की बात है। चाहे हमारा देश हो या विश्व के अन्य देश, हर जगह शोषण उत्पीड़न का शिकार स्त्री ही रही है। जिस देश में वर्णभेद जाति भेद की कलुषित परंपराएं हैं वहां दलित स्त्री शोषण की व्यथा और भी गहरी हो जाती है।1 इस आत्मकथा में लेखिका ने बचपन से लेकर सामाजिक भेदभाव और पारिवारिक पृष्ठभूमि को पूरी निष्ठा के साथ आत्मकथा में प्रस्तुत किया है। दलित होने के कारण लेखिका को जातिगत दंश भोगना पड़ा। वहीं स्त्री होने के कारण पुरुषवर्चस्ववादी व्यवस्था के अनेकानेक बाधाओं से भी संघर्ष करना पड़ा। दलित परिवार में जन्मी सुशीला टाकभौरे को जीवन भर मनुवादी व्यवस्था, पुरुष की उपेक्षा, पति के द्वारा मारपीट, गालीगलौज की शिकार होना पड़ा। फिर भी अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्षरत रही। डॉ. चमन लाल लिखते हैं– “हरिजन समाज का संस्कृत ढांचा भी भीतर से दमनात्मक है और वह इस दमन का शिकार बनते हैं हालांकि यह मानना पड़ेगा की हरिजन समाज का यह दमनात्मक सांस्कृतिक ढांचा समाज के व्यापक दमनात्मक ढांचे का हिस्सा ही है।”2

बीज शब्द : दलित स्त्री, स्त्री संघर्ष, जातिगत भेदभाव, पितृसत्ता, सामाजिक शोषण, पुरुष वर्चस्व, स्त्री अस्मिता, आत्मसम्मान, सामाजिक रूढ़ियाँ, शिक्षा और मुक्ति

 Realistic Portrayal of Dalit Women in 'Shikanje Ka Dard'

Abstract
Sushila Takbhaure’s autobiography 'Shikanje Ka Dard'exposes the dual mentality of society and the pain and suffering experienced by Dalit women. This autobiography is not merely the life story of a woman; rather, it portrays the anguish of enduring social discrimination and patriarchal attitudes faced by Dalit women in Indian society. As stated in the autobiography, “Shikanje Ka Dard expresses the anguish of being Dalit and of being a woman. It contains the suffering of a Dalit life that has been exploited, oppressed, humiliated, and deprived. Being a woman itself appears to be a source of suffering. Whether in our country or in other countries of the world, women have everywhere been subjected to exploitation and oppression. In a country where the polluted traditions of varna and caste discrimination prevail, the suffering caused by the exploitation of Dalit women becomes even deeper.” ¹ In this autobiography, the author presents, with complete sincerity, the social discrimination and family background she experienced from childhood onward. Because of being Dalit, the author had to endure the pain of caste-based discrimination. At the same time, being a woman, she also had to struggle against numerous obstacles created by the patriarchal system. Born into a Dalit family, Sushila Takbhaure had to face the oppressive caste system, male neglect, physical violence by her husband, and verbal abuse throughout her life. Nevertheless, she continued to struggle to preserve her identity and existence. Dr. Chaman Lal writes: “The cultural structure of Harijan society is also oppressive from within, and they become victims of this oppression. However, it must be acknowledged that this oppressive cultural structure of Harijan society is itself a part of the broader oppressive structure of society.” ²
Keywords: Dalit Women, Women’s Struggle, Caste Discrimination, Patriarchy, Social Exploitation, Male Dominance, Women’s Identity, Self-Respect, Social Conventions, Education and Emancipation.

मूल आलेख

भारतीय समाज में हिंदी दलित साहित्य सदियों से विकसित जातिगत भेदभाव पीड़ा और अमानवीय प्रताड़ना को आत्मकथा के जरिए अभिव्यक्त किया है। दलित आत्मकथाएं केवल व्यक्तिगत जीवन की न होकर पूरे दलित समुदाय के पीड़ाओं और संघर्षों को चित्रित किया है। “करीब दस लाख वर्ष पहले विकास की प्रक्रिया पशु जगत से आगे बढ़ी। आदिम मनुष्यों अथवा वानर मानवों को जैसा कि वैज्ञानिक लोग उन्हें कहते हैं, प्राकृतिक शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ा था और इस प्रक्रिया में उन्होंने औजारों और हथियारों का प्रयोग करना शुरू किया था। मनुष्य मात्र के अस्तित्व का प्रधान प्राथमिक आधार श्रम है। और उसका आरंभ मनुष्य के औजार निर्माण से होता है। औजारों का निर्माण सीखकर ही प्रारंभिक मानवों ने अपने को अन्य पशुओं से अलग किया और प्रकृति पर आना कार्य-कौशल दिखाकर उसे अपने अनुकूल परिवर्तित करना शुरू किया। ज्यों-ज्यों उनका सामूहिक श्रम बढ़ता गया, त्यों-त्यों उनका चिंतन और उनके विचार भी उन्नत होते गए।”3 भारत के प्राचीन मानव समाज में किसी व्यक्ति के बीच ना तो कोई वर्ग भेद था नहीं जाति भेद और न की किसी का शासन व्यवस्था थी। “वे कुल और कबीलों में संगठित थे और हर कुलों या कबीलों का एक कुल या गोत्र होता था जिसका एक समान पूर्वजन होता था। हर कुल की एक लोकतांत्रिक समिति होती थी जो अपने मुखिया को चुनती थी। एक कबीले में कई कुल होते थे। न तो कोई काम बड़ा था न छोटा। सभी कार्य को मिलजुल कर करने की परंपरा थी। न राजा था न प्रजा, न शोषक था न शोषित। जो कुछ पैदा किया जाता था उस पर हर एक का स्वामित्व होता था।”4 बाद में सामाजिक संरचना में उच्च-नीच भेदभाव एक दूसरे व्यक्ति में देखा जाने लगा। इस आत्मकथा में वर्तमान समय के सामाजिक रीति रिवाज और मनुवादी व्यवस्था चित्रित है। सुशीला टाकभौरे का जन्म मध्य प्रदेश के बानापुर गांव में भंगी परिवार में 4 मार्च 1942 में हुआ। मां का नाम पन्ना और पिता का नाम राम प्रसाद घावरी था। सुशीला टाकभौरे का परिवार उनके नानी के घर रहता था। उनके नाना नानी का जीवन यापन गांव के जूठन, उतरन के कपड़ों से चलता था। “नाना और नानी मिलकर गांव का काम संभालते थे। गांव से मिली जूठन, रोटी, अनाज और उतरन के कपड़ों से उनका जीवन चलता था। नानी दुख और कष्ट उठाते हुए पहले निजी रूप में गांव का काम करती थी। बाद में नगर परिषद की सफाई कर्मचारी के रूप में नौकरी करने लगी।”5 नाना की मृत्यु के बाद नानी ने लेखिका की मां और पिता को अपने घर में रख लिया नानी के घर ही लेखिका का जन्म हुआ। “किसी गरीब-अछूत के बच्चे का पालन पोषण जैसा होता है, उसी तरह मेरा पालन हुआ। मैं सुख-वैभव के पालने में नहीं झूली। अधिकतर नानी ही हमें संभालती थी। अभाव थे मगर प्रेम और अपनापन भी था।”6 लेखिका का बचपन अभावों से बीता। सुशीला की मां-पिता ने गरीबी में भी सभी भाई-बहनों को पढ़ाया। लेखिका अपने आत्मकथा में लिखती है- “सदियों से तिरस्कृत और अभावग्रस्त परिस्थितियों में रहने के लिए मजबूर किए गये दलित जीवन की व्यथा-कथा का दर्द ‘शिकंजे के दर्द’ भी समाहित है।”7 बचपन से ही लेखिका को जातिगत दंश भोगना पड़ा। स्कूल में टीचरों के द्वारा और अमानवीय व्यवहार किया जाता रहा। उस समय दलित जाति में लड़कियों को शिक्षा की व्यवस्था न के बराबर थी। लेकिन लेखिका का परिवार अपने बच्चों को पढ़ना चाहता था। लेखिका को पढ़ने में उनकी माता का विशेष योगदान रहा है। अपने जाति समुदाय में सामान्य रूप में व्याप्त ऐसी भावना और वातावरण के बीच मां ने दृढ़ निश्चय के साथ पिता की सहमति से और असहमति के बाद भी हमें पढ़ाया। रुपयों के साथ हमारे लिए अपनी संपूर्ण भावना, इच्छाशक्ति और आशा आकांक्षाओं को दाव पर लगाया था। गांव में लोग वर्णभेद जातिभेद को पूर्ण कट्टरता से मानते थे। हमारी जाति का कार्यक्षेत्र और हर बात में सीमा रेखाएं निश्चित थी, फिर भी मां ने संघर्ष करते हुए प्रयत्नों के साथ में पढ़ाया।’’8 लेखिका शिक्षा ग्रहण करके अपने दलित जाति का उद्धार करना चाहती थी। “गांव में बामन बनियों का ही वर्चस्व था। हमारी जाति के लोग डरे सहमे शोषित पीड़ित जीवन जीते थे। हम उनके लिए अस्पृश्य अछूत थे। हमारे घर गांव के बाहर हाशिए पर थे।”9 लेखिका को स्कूल में भी ब्राह्मण बनियों के बच्चों के साथ नहीं बैठाया जात। अछूत जाति के बच्चों को पंक्ति के सबसे पीछे अलग करके बैठाया जाता था। ‘‘मैं देखी थी सवर्ण घरों के स्कूल से लौटे बच्चों पर घर के बाहर ही पानी छिड़क दिया जाता था और पहने हुए कपड़े उतरवा कर उन्हें दूसरे कपड़े पहनने के लिए दिए जाते थे। हमारे सामने वे नाक-भौ-सिकोड़कर नफरत से कहते थे-ना जाने कौन-कौन सी जात के बच्चों के साथ बैठकर पढ़कर आते हैं। सबकी छुआछूत घर में लाते हैं।’’10 लेखिका बचपन से ही जिद्दी स्वभाव की थी, वह जो सोचती थी वह करने की हमेशा कोशिश करती रहती। “बचपन का जिद्दी स्वभाव हमेशा मेरे साथ रहा। कभी वह दृढ़ संकल्प में बदला, कभी लगन और निष्ठा में। कभी कार्य-सफलता के लिए श्रम और साहस का प्रेरक बनता रहा कभी परेशान भी किया, मुझे नुकसान भी पहुंचा है। बचपन से जैसा वातावरण मिला और जिस तरह मेरे स्वभाव का निर्माण हुआ, इसके साथ व्यक्तित्व निर्माण में मेरे विशेष गुणों का योगदान रहा।”11 यही कारण रहा कि विपरीत परिस्थितियों में भी पढ़ाई नहीं स्थगित नहीं हुई। लेखिका बचपन से ही दुख-पीड़ा को झेलती रही। शादी के बाद भी जाति भेदभाव के साथ-साथ अपने पति परिवार के द्वारा शोषित होती रही।

“समाज में पत्नी पर तरह-तरह के अत्याचार करना आम बात मानी जाती है। ये बातें समाज में इस तरह व्याप्त हैं कि लोग इन्हें बुरा भी नहीं मानते। इन्हें मानों पति का अधिकार माना जाता है। छोटी-छोटी बातों पर अपनी नाराजगी बताना पति का गुण कहलाता, जैसे अपने इन्हीं गुणों से वह खुद्दार और दमदार पति माना जाता हो।”12 परिवार में अनेक यातनाओं का शिकार होती रही। परिवार समाज की सबसे विशेष इकाई माना जाता है। लेकिन कई बार यह संस्था स्त्री की स्वतंत्रता में बाधक बन जाती है। “मेरे साथ घर में मारपीट, गाली-गलौज सब कुछ हुआ है। बाल पकड़कर खींचना, लातों से मारना, गर्दन पर मुक्के बनाकर मारना, पीठ पर घुसे मारना- मैंने सब कुछ सहा। बेंत के निशान कई दिनों तो मेरे शरीर पर रहते थे। मार खाने के बाद मेरी यह हालत होती थी- घंटों सिर चकराता, जैसे मैं हवा में उड़ रही हूं, जमीन से फिसल रही हूं, बड़े-बड़े पत्थर मेरी तरह लुढ़कते आ रहे हैं, जैसे भागता हुआ हाथ ही आकर अचानक मेरे सिर पर पैर रखकर मुझे कुचल रहा है। कई बार मुझे लगता, लगातार बाल खींचकर सिर पर मरने से कहीं मैं पागल नहीं हो गई? कभी लगता मैं होश में हूं या बेहोश हूं। घंटों रोती, सिसकती रहती थी, कोई देखता ही नहीं था कि मुझे कहां चोट लगी, कहीं चोट घातक तो नहीं लगी? मुझे क्या हो रहा है, क्या होगा? किसी को चिंता नहीं थी।”13 एक ही कमरे के मकान में पति-पत्नी, सास-ननंद के पति और बच्चे इतने सारे लोग रहते थे। समय न मिलने के अभाव में भी वह अपने सपने को पूरा करने के लिए तमाम कोशिश करती रहती है। दलित परिवारों में आर्थिक समस्या, सामाजिक कुप्रथा तथा पुरुष प्रधान मानसिकता के कारण लेखिका को शोषण का शिकार होना पड़ा है। इस आत्मकथा में लेखिका को दलित स्त्री होने के दोहरे यातनाओं को झेलना पड़ती हैं। लेखिका स्वयं काम आती है किंतु अपनी चीज तक खरीदने के लिए उन्हें अपने पति पर निर्भर रहना पड़ता था। अध्यापिका बनने के बाद भी लेखिका प्रतिदिन बस से आने-जाने के लिए अपने पति से ही पैसा मांगती थी। पति द्वारा बार-बार ताने दिए जाते थे। शिकंजे का दर्द स्त्री अस्मिता और आत्मसम्मान को बचाए रखने की खोज है। इस आत्मकथा में एक दलित स्त्री की ही कहानी न होकर संपूर्ण दलित स्त्री समुदाय की व्यथा कथा है। लेखिका ने दलित स्त्री के वास्तविक स्थिति को उजागर किया है।

निष्कर्ष

‘शिकंजे का दर्द’ दलित स्त्री के अस्मिता की खोज है। यह आत्मकथा समाज के दोहरे चरित्र को उजागर करती है। सुशीला टाकभौरे ने अपनी आत्मकथा में जातिगत दंश और भेदभाव मानसिकता, पुरुष मानसिकता का विरोध किया तथा अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया। लेखिका ने अपने जीवन के अनुभव से अनेक स्त्रियों के पीड़ाओं को ध्वनि दी है। इस आत्मकथा का एक विशेष पक्ष पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था की खुली आलोचना भी है। लेखिका ने दिखाया है कि स्त्री को सामाजिक रूढ़ि मान्यताओं में जकड़ा जाता है। परिवार और समाज दोनों स्तर पर स्त्री के साथ दोहरा व्यवहार किया जाता है। समाज में स्त्रियों के प्रति यह मानसिकता सहज रूप में व्याप्त है। पुरुष सत्तात्मक समाज में स्त्रियों को बराबर का दर्जा नहीं दिया जाता। उनकी प्रताड़ना और शोषण को पारिवारिक और व्यक्तिगत माना गया है। इस आत्मकथा के जरिए लेखिका ने समाज को आइना दिखाया है कि दलित स्त्रियों को शिक्षा का अवसर प्राप्त हो तो वह सामाजिक रूढ़ियों को तोड़कर अपनी एक अलग पहचान स्थापित कर सकते हैं। इस आत्मकथा के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि दलित स्त्री समाज में अनेकों स्तरों पर शोषण को झेलती रही है। दलित स्त्रियों के साथ हो रहे अन्याय-अत्याचार भेदभाव के खिलाफ विद्रोह का भी चित्रण किया गया है। आजादी के बाद दलितों के आचार-विचार, रहन-सहन, शिक्षा व्यवस्था को लेकर आ रहे परिवर्तन का भी इस आत्मकथा में चित्रण हुआ है। दलितों ने अपने परिस्थितियों से लड़ने के लिए शिक्षा को महत्वपूर्ण साधन माना है।

संदर्भ सूची

1.     सुशीला टाकभौरे, शिकंजे का दर्द, वाणी प्रकाशन, पृ. . 1, नई दिल्ली।

2.     डॉ. चमनलाल, प्रतिनिधि हिन्दी उपन्यास, दूसरा भाग, पृ. . 8

3.     के. दामोदरन, भारतीय चिंतन परंपरा, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, पृ. . 13

4.     के. दामोदरन, भारतीय चिंतन परंपरा, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, पृ. . 16

5.     सुशीला टाकभौरे, शिकंजे का दर्द, वाणी प्रकाशन, पृ. . 13, नई दिल्ली।

6.     सुशीला टाकभौरे, शिकंजे का दर्द, वाणी प्रकाशन, पृ. . 14, नई दिल्ली।

7.     सुशीला टाकभौरे, शिकंजे का दर्द, वाणी प्रकाशन, पृ. . 1, नई दिल्ली।

8.     सुशीला टाकभौरे, शिकंजे का दर्द, वाणी प्रकाशन, पृ. . 16, नई दिल्ली 18

9.     सुशीला टाकभौरे, शिकंजे का दर्द, वाणी प्रकाशन, पृ. . 18, नई दिल्ली।

10. सुशीला टाकभौरे, शिकंजे का दर्द, वाणी प्रकाशन, पृ. . 21, नई दिल्ली।

11. सुशीला टाकभौरे, शिकंजे का दर्द, वाणी प्रकाशन, पृ. . 37, नई दिल्ली।

12. सुशीला टाकभौरे, शिकंजे का दर्द, वाणी प्रकाशन, पृ. . 144, नई दिल्ली।

13. सुशीला टाकभौरे, शिकंजे का दर्द, वाणी प्रकाशन, पृ. . 145, नई दिल्ली।  

  -प्रियंका सिंह
 पीएच.डी. शोधार्थी, हिंदी विभाग
महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी



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