शोध सारांष
आधुनिक हिंदी साहित्य की एक प्रमुख धारा प्रवासी साहित्य के नाम से अभिहित है, जो मॉरीशस, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा आदि में फल-फूल रही है। प्रवासी साहित्य हिंदी को वैश्विक भाषा के रूप में स्थापित कर रहा है। यह साहित्य अब केवल पुराने दौर के अनुबंधित (गिरमिटिया) मजदूरों की कहानी नहीं, बल्कि वैश्वीकरण के इस दौर में व्यक्तिगत चयन पर आधारित प्रवास की कहानियाँ कहता है। इसमें विदेशी धरती पर भारतीय जीवन मूल्यों से सीधी टकराहट है, जिसने राजनीति, अर्थ, समाज, संस्कृति आदि सभी क्षेत्रों को प्रभावित किया है। प्रवासी साहित्यकारों ने हिंदी भाषा को केवल भारत तक सीमित न रखकर इसे विश्व के उस स्तर तक पहुँचाया, जहाँ यह ‘प्रवासी साहित्य’ हिंदी साहित्य की महत्त्वपूर्ण विधा के रूप में भारतीय जीवन-दर्शन और पश्चिमी संस्कृति अथवा यथार्थ का अनूठा संगम बनकर हिंदी भाषा को एक नया वैश्विक परिदृश्य और संवेदना प्रदान करता है। हिंदी भाषा आज अपनी राष्ट्रीय परिधि से बाहर निकलकर वैश्विक स्वरूप धारण कर चुकी है और इसकी साहित्यिक प्रगति निरंतर बढ़ रही है। लोककथाओं, गीतों तथा विभिन्न सभ्यताओं के प्रभाव के बावजूद भारत में ‘अनेकता में एकता’ की भावना के कारण भारतीय संस्कृति ने अपनी एक विशिष्ट छवि निर्मित की है। इसी विशिष्ट छवि का परिणाम है कि आज हिंदी विश्व के लगभग 121 देशों में बोली और समझी जाती है। न केवल भारत के पड़ोसी देश-पाकिस्तान, अफगानिस्तान, भूटान, नेपाल, म्यांमार (बर्मा) और श्रीलंका ही नहीं, बल्कि अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका तथा एशिया महाद्वीप के अनेक देशों में भी हिंदी के प्रति रुचि बढ़ी है। इन देशों में रहने वाले भारतीयों के साथ-साथ वहाँ के मूल निवासी भी भारतीय संस्कृति और हिंदी भाषा में गहरी रुचि रखते हैं। फिजी, माॅरीशस, सूरीनाम, कजाख़स्तान, दक्षिण अफ्रीका, जापान, फ्रांस, थाईलैंड, कनाडा आदि देशों में उच्च शिक्षण संस्थानों में हिंदी के अध्ययन-अध्यापन ने इसे विश्व में सम्मानजनक स्थान दिलाया है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्व के लगभग 176 विश्वविद्यालयों में हिंदी का अध्ययन और अध्यापन किया जा रहा है। विश्व स्तर पर हिंदी प्रेमियों की संख्या लगभग 1100 मिलियन से अधिक मानी जाती है।
बीज शब्द: प्रवासी साहित्य, हिंदी भाषा, वैश्वीकरण, प्रवासन, भारतीय संस्कृति, स्त्री अनुभव, बहुसांस्कृतिक समाज, हिंदी का वैश्विक प्रसार
Contribution of Diasporic Writers in Hindi Literature
Abstract
A major stream of modern Hindi literature is known as Diasporic Literature, which is flourishing in countries such as Mauritius, the United States, the United Kingdom, and Canada. Diasporic literature is playing a significant role in establishing Hindi as a global language. This literature is no longer limited to the stories of indentured (Girmitiya) laborers of the past; rather, in this era of globalization, it narrates stories of migration based on individual choice. It reflects a direct confrontation between Indian cultural values and foreign environments, which has influenced all spheres including politics, economy, society, and culture. Diasporic writers have not confined the Hindi language to India alone; instead, they have elevated it to a global level, where “Diasporic Literature” has emerged as an important genre of Hindi literature. It represents a unique confluence of Indian philosophy of life and Western culture or reality, thereby offering Hindi a new global perspective and sensibility. Today, Hindi has transcended its national boundaries and assumed a global form, and its literary development continues to grow steadily. Despite the influence of folk traditions, songs, and diverse civilizations, Indian culture has developed a distinct identity based on the spirit of “unity in diversity.” As a result, Hindi is now spoken and understood in approximately 121 countries across the world. Not only in India’s neighboring countries—Pakistan, Afghanistan, Bhutan, Nepal, Myanmar (Burma), and Sri Lanka—but also in many nations across America, Europe, Australia, Africa, and Asia, there has been a growing interest in Hindi. Along with the Indian diaspora living in these countries, the native populations there are also increasingly drawn to Indian culture and the Hindi language. In countries such as Fiji, Mauritius, Suriname, Kazakhstan, South Africa, Japan, France, Thailand, and Canada, the teaching and learning of Hindi in higher educational institutions has earned it a respectable position globally. In the present context, Hindi is being taught and studied in approximately 176 universities worldwide. At the global level, the number of Hindi speakers and enthusiasts is estimated to be over 1.1 billion.
Keywords: Diasporic Literature, Hindi Language, Globalization, Migration, Indian Culture, Women’s Experience, Multicultural Society, Global Expansion of Hindi
शोध आलेख
जब मनुष्य अपने भौगोलिक क्षेत्र से दूसरे भौगोलिक क्षेत्र में जीविका अथवा किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपने देश, जाति, समुदाय और वर्ग आदि से अलग हो जाता है, तो इसे प्रवासन कहा जाता है। भारत से बाहर अनेक भारतीय विदेशों में रहकर अपना जीवन-यापन कर रहे हैं। यह प्रवासी भारत से दूर विदेशी धरती पर अपनी सभ्यता-संस्कृति, साहित्य और भाषा का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। प्रवासन की यह प्रक्रिया पुरुषों के लिए जितनी कष्टकर है, उससे कहीं अधिक महिलाओं के लिए है। विदेशी धरती पर सांस्कृतिक अस्मिता का सवाल उन्हें बार-बार आंदोलित करता है। प्रवास की पीड़ा, अपनी धरती के प्रति स्नेह, अपनी भाषा और संस्कृति की सुरक्षा, नई भूमि में जमने का संघर्ष, वर्तमान परिस्थितियों के प्रति असंतोष, आत्मग्लानि, मानसिक अंतर्द्वंद्व, विस्थापन आदि बातें आज प्रवासी समाज की प्रमुख समस्याएँ हैं, जिसकी अभिव्यक्ति प्रवासी साहित्यकार अपनी रचनाओं में कर रहे हैं। ब्रिटेन की बहुचर्चित साहित्यकार उषा राजे सक्सेना प्रवासी शब्द को गहराई से समझाते हुए कहती हैं- ‘‘प्रवासी शब्द ‘प्रवास’ शब्द का विशेषण है। प्रवासी एक मनोविज्ञान है, एक अंतर्दृष्टि है, जिसे स्वतः फाॅर्म्यूलेट होने में बरसों लग जाते हैं। एक तरह से प्रवासी वे कलमें हैं, जो अपने पेड़ से कटी हुई टहनियाँ होने के बावजूद वर्षों बरस किसी और मिट्टी-खाद-पानी में अपनी जड़ें रोपती हुई अपना बहुत कुछ खोने और नया बहुत कुछ उस नई भूमि से लेने-पाने के साथ अपने अंदर की गहराइयों में नई ऊर्जा सृजित करती हुई नई चेतना की कोपलें विकसित करती हैं।’’1
बीसवीं शताब्दी में भारतीय मूल के लोगों ने न केवल एक देश में, बल्कि संसार के लगभग हर कोने में भारतीय अस्मिता को जागृत किया। प्रवासी साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय संस्कृति, रीति-रिवाज, परंपराओं और भाषाओं को वैश्विक स्तर पर एक विशिष्ट पहचान प्रदान की। साहित्य के माध्यम से उन्होंने मातृभूमि, संस्कारों और भाषा से जुड़ी अपनी जड़ों को खोजने का निरंतर प्रयास किया। यही कारण है कि विदेशी भूमि पर निवास करने के बावजूद उनकी भारतीयता उनके मन और मस्तिष्क में गहराई से रची-बसी रही। अनीता कपूर के अनुसार- ‘‘प्रवासी कथा साहित्यकारों में ऐसे अनेक नाम हैं, जिनकी रचनाओं को पढ़कर यह स्पष्ट अनुमान लगाया जा सकता है कि विदेश में रहते हुए भी वे संसार को भारतीय दृष्टि से देखते हैं। इसलिए उनके लेखन में नवीनता के साथ-साथ आत्मीयता भी होती है, जो पाठकों के हृदय को स्पर्श करती है।’’2
प्रवासी लेखन ने विश्व को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया है। गिरमिटिया मजदूरों के रूप में माॅरीशस, सूरीनाम और त्रिनिडाड जैसे देशों में गए भारतीयों के कारण हिंदी वहाँ सैकड़ों वर्षों से प्रतिष्ठित रही है। माॅरीशस के बाद अमेरिका और इंग्लैंड में भी प्रवासी साहित्य की रचना व्यापक रूप से हुई है। प्रवासी हिंदी साहित्य को समृद्ध करने वाले साहित्यकारों में सुषम बेदी, सुधा ओम ढींगरा, विजय मेहता, दिव्या माथुर, उषा राजे सक्सेना, तेजेंद्र शर्मा, जुबेरी, कविता वाचक्नवी, मोहन राणा, अंजना संधीर, शेष अग्रवाल, उषा वर्मा आदि प्रमुख हैं। इन साहित्यकारों ने विभिन्न विधाओं-कहानी, उपन्यास, कविता, निबंध आदि में महत्वपूर्ण योगदान देकर हिंदी साहित्य को वैश्विक स्तर पर नई ऊँचाइयाँ प्रदान की हैं। इन प्रवासी साहित्यकारों का हिंदी के प्रति गहरा लगाव, अपनी संस्कृति के प्रति गहन अनुराग तथा अपनी मिट्टी से जुड़े रहने की लालसा ने हिंदी को वैश्विक स्तर पर सशक्त बनाया है। साथ ही, विश्व हिंदी सम्मेलनों तथा प्रवासी साहित्य सम्मेलनों के आयोजन, विदेशों में हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन और साहित्यिक गतिविधियों ने हिंदी के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
ब्रिटेन में रहने वाली दिव्या माथुर प्रवासी हिंदी साहित्य में विशेष स्थान रखती हैं। उन्हें उनके कहानी-संग्रह ‘आक्रोश’ के लिए वर्ष 2001 का पद्मानन्द साहित्य सम्मान प्राप्त हो चुका है। उनकी रचनाओं में प्रवासी जीवन की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना के कारण उत्पन्न संघर्षों तथा विदेशी प्रवृत्तियों के प्रति टूटते मोह का सशक्त चित्रण मिलता है। उन्होंने विदेशी परिवेश में रह रही महिलाओं की स्थिति को समझते हुए अपनी कहानियों में स्त्री जीवन के संघर्ष और प्रतिरोध को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है। प्रवासी जीवन सामान्यतः आकर्षक और सुखद प्रतीत होता है, किंतु दिव्या माथुर ने अपनी रचनाओं के माध्यम से इस मिथक को तोड़ा है। उन्होंने दिखाया है कि अर्थकेंद्रित पारिवारिक और सामाजिक संरचना की जकड़न में मानवीय संवेदनाएँ और भावनाएँ दम तोड़ने लगती हैं। उनके साहित्य में देश और विदेश के जीवन के बीच का अंतर, प्रेम और सेक्स के बीच अंतर, और आधुनिक देशों में नस्ल और रंग-रूप के आधार पर होने वाला भेदभाव स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आता है।
अमेरिका निवासी प्रसिद्ध लेखिका सुषम बेदी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रवासी भारतीयों की मानसिकता, सांस्कृतिक संघर्ष और पारिवारिक संबंधों के द्वंद्व को प्रस्तुत किया है। उन्होंने दो संस्कृतियों के बीच पिसते व्यक्ति की पहचान, अस्तित्व के संघर्ष और संबंधों में उत्पन्न दूरी का मार्मिक चित्रण किया है।
माॅरीशस के प्रसिद्ध साहित्यकार अभिमन्यु अनंत ने अपनी रचनाओं के माध्यम से सामाजिक यथार्थ को उजागर किया है। उन्होंने आम आदमी की समस्याओं, मजदूरों के शोषण, नारी जीवन की विसंगतियों, अंतरजातीय विवाह की समस्याओं तथा युवा पीढ़ी के भटकाव का सशक्त चित्रण किया है। उनके व्यंग्यात्मक लेखन में समाज में हो रहे मानवता के पतन को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
भारतीय मूल के ब्रिटिश हिंदी लेखक तेजेंद्र शर्मा हिंदी साहित्य में एक सेतु के रूप में कार्य करते हैं। वे भारत और प्रवासी समाज के बीच सांस्कृतिक, भावनात्मक और भाषाई संबंधों को जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। उनकी रचनाओं में प्रवास की पीड़ा, जड़ों से कटने की बेचैनी और नई पहचान की तलाश का मार्मिक चित्रण मिलता है।
साहित्यकार सुधा ओम ढींगरा ने अमेरिका में रहकर हिंदी भाषा और साहित्य की महत्वपूर्ण सेवा की है। उन्हें केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा द्वारा वर्ष 2016 में ‘पद्मभूषण डाॅ. मोटूरि सत्यनारायण सम्मान’ से सम्मानित किया गया। उनकी रचनाओं में प्रवासी जीवन, संस्कृति और व्यवस्था के बीच संघर्षरत संवेदनशील मानव जीवन का सजीव चित्रण मिलता है।
डाॅ. अंजना संधीर ने भारत और अमेरिका दोनों में हिंदी के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय तथा स्टोनी ब्रुक विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अध्यापन किया। उनकी रचनाओं में स्त्री संघर्ष, नारी चेतना, सामाजिक विसंगतियाँ और प्रवासी जीवन का यथार्थ प्रभावशाली रूप में उभरता है।
उषा राजे सक्सेना की रचनाओं में ब्रिटेन में बसे भारतीयों के जीवन का सशक्त चित्रण मिलता है, जिसमें अस्तित्व के संघर्ष, बदलती मानसिकता और सांस्कृतिक द्वंद्व का गहन विश्लेषण है। उन्होंने लिखा है- ‘‘प्रवासी हिंदी साहित्य का अपना ऐतिहासिक महत्त्व रहा है, जो सीधा हमें हमारे उन पूर्वजों गिरमिटिया श्रमिकों के दर्दनाक इतिहास से जोड़ता है, जो 200 वर्ष पूर्व छलावे से उन बंजर पराए देशों के यातना शिविरों में ले जाए गए थे।’’3 उषा राजे सक्सेना की कहानियों की एक विशेषता है कि उन्हें यात्रा में कोई चरित्र मिलता है, जो उन्हें या तो अपनी कहानी सुनाता है या वह कुछ ऐसा कर जाता है, जिससे उन्हें कहानी मिल जाती है। प्रवास में भारतीय सोच, जो संकीर्णताओं से मुक्त किंतु यथार्थ तथ्यों से परिपूर्ण है, सौम्यता, सहोदरता और विश्व-बंधुत्व को साधारण से विशिष्ट होते हुए पात्रों के माध्यम से अभिव्यक्त करती है। ‘मिट्टी की सुगंध’ नामक कहानी-संग्रह संपादित कर उषा राजे सक्सेना ने यू.के. में हिंदी भाषा और साहित्य को एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने का प्रयास किया। उनकी रचनाओं में मानवीय सत्ता के प्रति विश्वास और विपरीत परिस्थितियों में साहस एक जुगनू की भाँति उभरते हैं, जिसका प्रमाण उनकी ‘मुलाकात’ कहानी में मिलता है।
अचला शर्मा लंदन प्रवास से पूर्व भारत में ही कहानीकार और कवयित्री के रूप में विख्यात हो गई थीं। वे लंदन में बी.बी.सी. रेडियो की हिंदी सेवा से जुड़ीं और अध्यक्ष पद पर पहुँचीं। उनके लेखन में प्रवासी भारतीयों की दूसरी व तीसरी पीढ़ी की मानसिकता एवं संघर्ष का चित्रण मिलता है। प्रवासी जीवन का यह संघर्ष उनकी चर्चित रचनाओं जैसे ‘बर्दाश्त बाहर’, ‘सूखा हुआ समुद्र’ तथा ‘मध्यांतर’ आदि में सटीक रूप से देखने को मिलता है।
कवि मोहन राणा ने अपनी कविताओं के माध्यम से दो संस्कृतियों के बीच उत्पन्न द्वंद्व, विडंबना और मानसिक संघर्ष को अत्यंत संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया है। उनकी कविताएँ केवल तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि स्मृति, समय और अनुभव की गहराई से जुड़ी होती हैं, जो पाठकों को सहज रूप से प्रभावित करती हैं। वेद प्रकाश बटुक ने अमेरिका में रहकर हिंदी भाषा और साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने अनेक पुस्तकों का लेखन एवं संपादन किया और हिंदी के वैश्विक प्रसार में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारतीय जहाँ भी रहे, अपनी अस्मिता, भाषा और संस्कृति की चिंता सदैव साथ लिए रहे हैं। डाॅ. लक्ष्मीमल सिंघवी ने अपने एक वक्तव्य में कहा था- ‘‘मैं भाषा को संस्कृति की मंजूषा मानता हूँ, बल्कि वह संस्कृति की मंजूषा ही नहीं, उसका वाहन भी है। यों देखा जाए तो विदेशों में बसा भारतीय नए संदर्भ से जुड़ता अवश्य है, परंतु अपने मूल से कटता नहीं है। वह अपने संस्कार और अपनी मिट्टी की गंध को सदा अपने सीने से लगाए रखता है।’’4 प्रवासी साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय संस्कृति और सभ्यता के प्रति गहरे लगाव तथा उससे दूर होते प्रवासियों की मनःस्थिति का सशक्त चित्रण किया है। उनके साहित्य में प्रवासी जीवन के संघर्ष, भूमंडलीकरण की चुनौतियाँ तथा स्वदेश और विदेश के बीच के द्वंद्व को स्पष्ट स्वर मिला है। प्रवासी साहित्य ने हिंदी साहित्य को नए विषय, नई दृष्टि और आधुनिक वैश्विक परिवेश से जोड़ते हुए उसे और अधिक व्यापक बनाया है। इसने हिंदी को एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और उसकी सृजनात्मक शक्ति को भी समृद्ध किया है।
निष्कर्ष
हिंदी साहित्य के विकास में प्रवासी साहित्यकारों का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उनकी रचनाएँ महज कहानी या कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं हैं, उन्होंने प्रवास की पीड़ा के सत्य को उजागर कर भारत और पश्चिमी सभ्यता एवं संस्कृति के बीच उलझे मन का प्रतिबिंब समाज को दिखाया है। कमल किशोर गोयंका ने भी लिखा है-‘‘हिंदी का प्रवासी साहित्य दो दृष्टि से महत्वपूर्ण है- एक तो वह अपनी मौलिकता एवं विशिष्टता रखता है और हिंदी साहित्य में कुछ नया जोड़ता है, दूसरा वह हिंदी साहित्य को वैश्विक बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।’’5 उन्होंने हिंदी भाषा को वैश्विक पहचान दिलाने के साथ-साथ उसे नई दिशा, नए आयाम और नई संवेदनाएँ प्रदान कीं। आज हिंदी ने विश्व की प्रमुख पाँच भाषाओं में से एक भाषा के रूप में अपना जो स्थान प्राप्त किया है, उसका श्रेय काफी हद तक प्रवासी साहित्यकारों के प्रयासों को भी जाता है।
संदर्भ सूची :
1. राजीव रंजन रायय भारतीय डायस्पोरा: विविध आयाम, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली।
2. माथुर दिव्या: मेड इन इंडिया और अन्य कहानियाँ, हिंदी बुक सेंटर, दिल्ली।
3. कमल किशोर गोयनका (सं.), जोहान्सबर्ग से आगे, विदेश मंत्रालय, भारत सरकार, दिल्ली।
4. मधु संधू, हिंदी का भारतीय एवं प्रवासी महिला लेखन, नमन प्रकाशन, दिल्ली।
5. नया ज्ञानोदय पत्रिका, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, दिसम्बर 2008।
-वर्षा, शोधार्थी, पीएच.डी.
हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
Email: varshayadav493@gmail.com
शोध निर्देशिका
-प्रो. (डाॅ.) अमिता तिवारी
जीसस एंड मेरी काॅलेज, डीयू, दिल्ली
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