शोध आलेख : अखिलेश की कहानियाँ और यथार्थ की अवधारणा
यथार्थ अंग्रेजी के ‘रियलिटी’ शब्द का हिंदी रूपांतरण है। यथार्थ दो पदों की संधि से निर्मित है- यथा और अर्थ। ‘यथा’ अव्यय है जिसका हिंदी समानार्थी पद है ‘जैसा’ और ‘अर्थ’ के प्रमुख हिंदी समानार्थी पद हैं: वस्तु, तत्व, द्रव्य, पदार्थ इत्यादि। यथार्थ का सामान्य अर्थ होता है- जैसा होना चाहिए ठीक वैसा वाजिब, उचित, असली, वास्तविक। डॉ. पूनम शर्मा के शब्दों में “यथार्थ से तात्पर्य है जो वस्तु अथवा घटना जैसी घटी है, उसका वैसा ही वर्णन करना। मनुष्य का जीवन अच्छाई और बुराई दोनों से परिपूर्ण होता है। मानव-जीवन शक्ति तथा दुर्बलता, लघुता तथा महत्ता, कुरूपता तथा सुरूपता का समन्वय है। इन सभी का मिला-जुला वर्णन ही यथार्थ के अंतर्गत आता है।” ¹ दूसरे शब्दों में कहें तो जीवन की जटिलता, वैषम्य, संघर्ष और कटुता का चित्रण उनके स्वाभाविक रूप में किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि सत्य की अभिव्यक्ति बिना तथ्यों और वास्तविकता के नहीं हो सकती। तर्क एवं बौद्धिकता ही यथार्थ का मूलाधार है। इसके अंतर्गत सामाजिक संरचना, जातिगत संरचना, वर्ग संरचना, धार्मिक संरचना आदि अनेक बातें आते हैं। संक्षेप में सामाजिक विद्रूपताओं की यथावत् अभिव्यक्ति यथार्थ है। विद्रूपता के अनेक रूप और यथार्थ के कई भेद होते हैं। डॉ. गुलाब राय के अनुसार “यथार्थ वह है जो नित्य हमारे सामने घटता है उसमें पाप-पुण्य, धूप-छांव, और सुख-दुःख मिश्रित रहता है। यह सामान्य भावभूमि के समतल रहता है और वर्तमान की वास्तविकता में सीमाबद्ध रहता है। स्वर्ग के स्वर्णिम सपने उसके लिए परी देश की वस्तु है जो उसकी पहुँच के बाहर है। भविष्य उसके लिए कल्पना का खेल है। वह संसार के हाहाकार और करूण क्रंदन का यथातथ्य वर्णन करता है। वह कठोर सत्य को कहने में नहीं हिचकिचाता। वह वास्तविकता के नाते संसार में पाप और बुराई का विजय घोष करने में संकुचित नहीं होता। वह संसार की कलुष-कालिमा पर भव्य आवरण नहीं डालना चाहता। वह स्वर्ग को भी कालिमामय मिट्टी के कणों से मिश्रित ही देखना चाहता है। वह उसे तपा-गला कर और उसमें चमक उत्पन्न कर लोगों को चकाचौंध में नहीं डालना चाहता है।” ²
इस प्रकार यथार्थ की प्रमुख विशेषता है जहां लेखक बिना किसी भय अथवा पक्षपात के ईमानदारी के साथ जो कुछ भी अपने आस-पास देखता है, अनुभव करता है उसे अर्थात वास्तविक विचारों/तथ्यों को समुन्नत रूप में पाठकों के सामने उपस्थित करता है।
‘सामाजिक संरचना जैसे-जैसे जटिल होती जाती है मनुष्य का आत्म भी उसी हिसाब से जटिल होता चला जाता है। इस जटिलता के कारण ही यथार्थ को सीधे-सीधे अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता। फलत: नई साहित्यिक विधाओं को न केवल तलाशा जाता है अपितु नए शिल्प भी विकसित किए जाते हैं। हिंदी कहानी में नवें दशक (अखिलेश इसी दशक के कथाकार हैं) की कहानी विधा कथ्य और शिल्प दोनों स्तरों पर एक नए रूप में दिखाई पड़ती है। यह वह दौर है जब कहानी आंदोलन समाप्त हो चुके थे। अब कहानी में जन की समस्याओं को अभिव्यक्त करने पर विशेष ज़ोर दिया जा रहा था। अब साहित्य में यथार्थ को अभिव्यक्त करना महत्वपूर्ण था न कि यथार्थ किस रूप में अभिव्यक्त किया जाए। इस तथ्य को साहित्य की दूसरी विधाओं में भी देखा जा सकता है। यथार्थ को अभिव्यक्त करने का कोई निश्चित फॉर्म नहीं था। इसलिए इस दौर की कहानियों में बहुत से नए प्रयोग दिखाई पड़ते हैं।’
अखिलेश की कहानियाँ इस तथ्य को पुख्ता करती हैं क्योंकि “कथाकार अखिलेश की निर्मिति में यथार्थ की बड़ी भूमिका है। यह वह यथार्थ है जिसे अखिलेश आँख से देखते हैं, हाथ से छूते हैं, उलटते-पलटते हैं, इतिहास के आईने में परखते हैं, समाज की कसौटी पर कसते हैं और अंततः एक ऐसी धड़कती हुई प्रतिक्रिया की तरह रचना करने में कामयाब होते हैं जिससे अपने समय और यथार्थ से हमारी पहचान कुछ ज़्यादा गहरी और पुख्ता होती है।”³ लेखक और समय का रिश्ता एक जटिल मसला होता है। ठीक उतना ही जटिल है लेखकीय प्रतिबद्धता और सामाजिक सरोकार। समय और समाज के परस्पर बदलते रिश्ते के बीच रचनाकार अपने अस्तित्व की खोज करता है लेकिन ज़रूरी यह हो जाता है कि उसकी रचना में समकालीन समाज के यथार्थ/बिंब अंकित हुए हैं या नहीं। अखिलेश की कहानियों में यथार्थ एक रेखीय नहीं है अपितु यथार्थ कई-कई परतों वाला है जिसकी परत दर परत स्कैनिंग कहानियों में दिखाई देती है। अखिलेश की कहानियों के ज़रिए समकालीन समय की विद्रूपताओं, विडंबनाओं को गहराई से समझा जा सकता है। अखिलेश की राजनीतिक यथार्थ वाली कहानियाँ हैं- ‘बायोडाटा’, ‘ऊसर’, ‘चिठ्ठी’, ‘श्रृंखला’ एवं ‘ग्रहण’। इनमें छात्र-राजनीति से लेकर उच्च स्तर तक की राजनीति में व्याप्त विसंगतियों, भ्रष्टाचार, दोगलेपन, अंतर्कलह आदि पर सीधी चोट की गई है। उन्होंने आधुनिक व तथाकथित विकासशील भारत की राजनीति की जो चीर-फाड़ की है, उससे उसका असली वीभत्सतापूर्ण चेहरा हमारे सामने आ जाता है।
अखिलेश की कहानियों में अन्य विषयों जैसे- दलित-विमर्श (ग्रहण व वजूद), स्त्री-विमर्श (अँधेरा, यक्षगान, अगली शताब्दी के प्यार का रिहर्सल), स्मृति, संबंध व बाज़ार (हाकिम कथा, जलडमरूमध्य) व अन्य तमाम प्रकार के यथार्थों का बारीकी से रोचक शैली में प्रतिपादन हुआ है साथ ही साथ वह विचित्र कथा-पात्र हमारे समक्ष लाते हैं। मसलन, ‘शापग्रस्त’ का सुख-दुःख की अनुभूतियों से रहित एवं ‘फिस्टुला’ जैसे कष्टकारी रोग पर फ़ख्र करने वाला प्रमोद वर्मा, ‘चिठ्ठी’ के पात्र त्रिलोकी, रघुराज और मंडली के अन्य सदस्य, ‘बायोडाटा’ का नेता बनने को आतुर राजदेव, ‘पाताल’ का नपुंसक मंदबुद्धि प्रेमनाथ, ‘ऊसर’ का महत्वाकांक्षी नेता चंद्रप्रकाश श्रीवास्तव, ‘जलडमरूमध्य’ के डिप्रेशन के शिकार व रोना भूल चुके सहाय जी, ‘वजूद’ का डरपोक रामबदल, उसका बगावती बेटा जयप्रकाश तथा अत्याचारी बैद पंडित केसरीनाथ, ‘यक्षगान’ का धोखेबाज पति छैलबिहारी, स्वार्थी कामरेड श्याम नारायण तथा चालाक महिला नेता सरोज यादव, ‘ग्रहण’ का गरीब विपद राम तथा उसका बिना गुद्दे का पेटहगना बेटा राजकुमार, ‘अँधेरा’ का दंगे से आतंकित प्रेमी प्रेमरंजन, ‘श्रृंखला’ का विद्रोही स्तंभ लेखक रतन कुमार आदि। यह दर्शाता है कि अखिलेश के भीतर समाज में हाशिए पर अलग-थलग पड़े निकृष्टतम जीवन भोग रहे इंसानों...के बारे में प्रबल चिंता है। अपने यथार्थपरक भावबोध के कारण अखिलेश न केवल अपने समय के साथ होड़ लगाते दिखते हैं, बल्कि वे समय से भी आगे निकलकर एक भविष्यदृष्टा कथाकार के रूप में हमारे समक्ष आते हैं। बहरहाल, अखिलेश की कहानियाँ यथार्थ को विभिन्न कोणों से दिखाती हैं। वह चाहे शहरी यथार्थ हो या ग्रामीण। उदाहरण स्वरूप- ‘वजूद’ कहानी में सिर्फ जाति व्यवस्था की विद्रूपता को ही चित्रित नहीं किया गया है अपितु इस कहानी के बरक्स जातीय शोषण के सम्पूर्ण इतिहास को भी समझा जा सकता है।
अखिलेश की कहानियों की पठनीयता व रोचकता और मजबूत पायों पर खड़ा उनका यथार्थ सम्पूर्ण सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था की कमियों को बेनकाब करता है और देश की राजनीति के विद्रूप चेहरे को अलग-अलग कोणों से स्कैन करके हमारे सामने दिलेरी व बेरहमी से प्रस्तुत करता है। ‘साहित्य में यथार्थ को देखने का जो नज़रिया है वह पुराने ढंग का है। इस बात को प्रेमचंद और बाद में फणीश्वरनाथ रेणु तक के कथाकारों में देखा जा सकता है। सत्तर के बाद जो परिदृश्य है उसमें गाँव और शहर के बीच बने नये तरह के सम्बन्ध को देखना ज़रूरी है। यह रचना में जितना आवश्यक है उतना ही महत्व इसका आलोचना में भी है। इसके बिना यदि रचना का मूल्यांकन परम्परागत गाँव और शहर के संदर्भ में रखकर विवेचित करने की कोशिश की जाती है तो उससे आलोचना एकांगी हो जाती है। इनकी कहानियों में इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है क्योंकि अखिलेश का यथार्थ को प्रकट करने का तरीका अलग है। अयथार्थ को वे यथार्थ बनाते हैं और अयथार्थ के ज्ञान के बिना यथार्थ का ज्ञान संभव ही नहीं है, वह एक वंचना ही हो सकता है। जैसे- कहानी ‘शापग्रस्त’ (इस कहानी में अखिलेश समकालीन समय और समाज की आधुनिकता, आधुनिकता की सबसे बड़ी दुष्प्रवृत्ति धन और वैभव प्राप्त करने की आपाधापी, दफ्तरों में फैली लूट और गलीच वातावरण से लेकर पारिवारिक संबंध में व्याप्त ढोंग और पाखंड इत्यादि क्रूर यथार्थों का चित्रण बड़ी निर्ममता से करते हैं।) कहानी में प्रमोद वर्मा जिसे मालूम पड़ चुका है कि जो मध्यमवर्गीय जीवन वह जी रहा था, वह मात्र एक छलावा था, भ्रम था। घर से लेकर ऑफिस तथा अपने दोस्तों-परिचितों सबके प्रति उसके मन में वितृष्णा भर चुकी है क्योंकि वह सच्चाई समझ चुका है कि नए बन रहे उपभोक्तावादी समाज में उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है। उसकी पत्नी सरोज जो प्रेम प्रकट करती रही वह यथार्थ नहीं, पूरा का पूरा परिवेश ही छद्म से भरा हुआ है। जैसे ही उसे यथार्थ का बोध होता है, वह अजीबोगरीब हरकतें करने लगता है। जैसे- अपना नेम प्लेट उखाड़ देता है, नौकरी छोड़ने की घोषणा कर देता है,..। वह कहता है कि मुझे सत्य नहीं, असत्य का पता चल गया है, यानी जिसे वह और सरोज प्रेम समझते थे वह मात्र एक छलावा है।
इनकी कहानियों में गाँव और शहर को बाँटकर नहीं देखा गया है। इसका कारण साफ है कि जब दुनिया भूमंडलीकृत गाँव में बदल रही है तब क्या भारत के गाँव और शहर पूरी तरह से अलग-अलग रह सकते हैं? आज शहर और गाँव विभिन्न माध्यमों से एक-दूजे से जुड़े हुए हैं। जिसका कारण केवल यह मोबाइल क्रांति नहीं है बल्कि दूसरे भी अनेक कारक ज़्यादा प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं। आज भूमंडलीकरण की संस्कृति का प्रभाव गाँव स्तर तक पहुँच रहा है। जिसे ‘जलडमरूमध्य’ एवं ‘यक्षगान’ कहानी के माध्यम से समझा जा सकता है। जैसे- जलडमरूमध्य कहानी में सहाय जी के जरिए शहरी जीवन की विडम्बना को समझा जा सकता है। वह चिरैयाकोट छोड़कर जब अपने गाँव आते हैं तो वहाँ के लोगों द्वारा ही उनको ठगा जाता है और जब अपनी आँसू न निकलने की बीमारी का इलाज कराने दिल्ली अपने बेटे चिन्मय और मनजीत के यहाँ आते हैं वहाँ भी चिन्मय उनसे चिरैयाकोट के मकान, बैंक-बैलेंस आदि के बारे में पूछता है और उनको बेचने के लिए कहता है। जिसके लिए वह माँ-पिता को अलग-अलग करके समझाने की कोशिश करता है। सहाय जी दोनों जगह के लोगों द्वारा ठगे जाते हैं। सहाय जी की विडम्बना को क्या ग्रामीण या शहरी किसी एक ख़ाके में रखकर देखा जा सकता है? और यह क्या ठीक रहेगा? यथार्थ से तात्पर्य केवल व्यक्त पदार्थों अथवा बाह्य पदार्थों से होता है। व्यक्त सत्य के अलावा किसी दूसरी पूर्ण एवं अनंत सत्ता की कल्पना यथार्थ नहीं है। लेकिन यथार्थ केवल बाह्य पदार्थों के वर्णन का ही नहीं होता अपितु यथार्थ कई बार मनोदशा के सूक्ष्म विवेचन से भी परिलक्षित होता है। यथार्थपरक कहानियों में उन मोड़ों का सक्रिय उल्लेख मिलना आवश्यक है जिनके द्वारा समाज में परिवर्तन उपस्थित होता है। इसलिए यदि किसी जाति या समाज के रहन-सहन एवं उसकी सांस्कृतिक परम्परा को जानना हो तो हमें उसके साहित्य का अध्ययन करना आवश्यक हो जाता है।
कथाकार भाषा के माध्यम से कल्पित सत्य को जब अपनी तीव्रतम अनुभूति के द्वारा व्यक्त करता है तो उससे साहित्यिक सत्य की सृष्टि होती है। अखिलेश की चयनधर्मिता एवं वर्णन शैली ही उनके कथा साहित्य के महत्व को बढ़ाती है और उन्हें अपने समकालीन रचनाकारों से अलग भी करती है। वे जिस बिम्ब को गढ़ते हैं, उसे उलट-पुलट कर उसके हर पहलू को विश्लेषित करते हैं और साथ ही साथ इनकी कहानियाँ वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में भविष्य की अंतर्दृष्टि भी प्रदान करती हैं। जिसका स्वरूप ‘श्रृंखला’ कहानी में स्पष्ट है। “कहानीकार के लिए वर्तमान और भविष्य, इतिहास और फैंटेसी कहानी कहने के मामूली बीज/सूत्र नहीं हैं। बल्कि यथार्थ को तलाशने का एक सार्थक फॉर्मूला है। मनुष्य और उसकी मनुष्यता समाप्तप्राय है। जीवित है केवल भौतिकवादी सभ्यता।
बाज़ार ने मनुष्य को भी वस्तु में तब्दील करने का ठेका ले रखा है। उसने अपने जबड़े में मानवता, नैतिक तथा वास्तविक गुणों को विलुप्त करने की भारी कोशिश की है। पूरी दुनिया को खा जाने का प्रयास किया है। बाजारवादी झूठ और सौन्दर्य की हत्या की साजिश के ख़िलाफ़ खड़ी होती हैं अखिलेश की कहानियां।”४ अखिलेश के कथानक का एक सशक्त तत्व है राजनैतिक मनुष्य की भ्रष्ट व्यवस्था के निर्माण एवं प्रसार में संलग्नता। बाजारवाद और उपभोक्तावादी संस्कृति के अँधेरे पक्ष को लेकर अखिलेश जो नया आख्यान रचते हैं वह अधिक समकालीन प्रतीत होता है। यह समकालीनता समाज व्यवस्था का एक सशक्त प्रतीक है। इस प्रतीक के आधार पर समाज और व्यक्ति के पेचीदे संबंध को समझा जा सकता है। कहानी केवल यथार्थ की व्याख्या नहीं करती अपितु अतीत के अनुभवों को समेटकर भविष्य की उम्मीद को भी जीवंत बनाती है।
‘अखिलेश की कहानियों में बीती सदी के उत्तर दौर में बन रहे नये जीवन-यथार्थ की बहुआयामी छवियाँ हैं,’ यह उपरोक्त विश्लेषण से दृष्टव्य है। अपने समय और समाज के बदलते यथार्थ की पेचीदगी और जटिलताओं को इन्होंने बखूबी समझा है बिना किसी सैद्धांतिकी या रूढ़ विचारधारा में बंधे। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि इन्होंने विचारधारा से मुक्ति पा ली है बल्कि इनकी विचारधारा मनुष्य की वास्तविक मुक्ति की आकांक्षा से निर्मित है और बदलते समय का जो यथार्थ है उसकी पहचान करना इनका उद्देश्य है। इनकी भाषा में जो हल्का व्यंग्य और विनोद है वह समय, सत्ता और नए जीवन के कटु यथार्थ के रेशे-रेशे को उघाड़ देता है। इस प्रकार सामाजिक सरोकारों के साथ ही बदलते समय और समाज के जीवंत चित्र (यथार्थ) प्रस्तुत करने में अखिलेश के सामर्थ्य की कोई तुलना नहीं है।
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची
1. शोध दिशा (त्रैमासिक पत्रिका) - सं. डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल, डॉ. मीना अग्रवाल - पृष्ठ संख्या- 119
2. उपन्यास में यथार्थ और आदर्श की सीमाएँ लेख (पुस्तक-समालोचक) - सं. डॉ. रामविलास शर्मा, सहसंपादक- राजनाथ शर्मा, विश्वम्भरनाथ उपाध्याय, अनामिका पब्लिशर्स, दरियागंज, दिल्ली, पृष्ठ संख्या- 156
3. वह जो यथार्थ है: अखिलेश - सत्यप्रिय महालिक (ओड़िया लेखक), अनुवाद- अरुण होता, बनास जन साहित्य-संस्कृति का संचयन (अखिलेश विशेषांक, सं. राजकुमार व पल्लव), कनिष्क अपार्टमेंट, शालीमार बाग, दिल्ली, पृष्ठ संख्या- 184
4. वही, पृष्ठ संख्या- 120, बदलते हुए समाज की सच्ची कहानियाँ - आशीष त्रिपाठी।
सहायक ग्रन्थ सूची
1. पाँच बेहतरीन कहानियाँ, अखिलेश, वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-110002।
2. प्रतिनिधि कहानियाँ - राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2013।
3. रचना समय, सं. ब्रिजनारायण शर्मा, अनिल जनविजय, बॉक्स कॉरोगेटर्स एंड ऑफसेट प्रिंटर्स, 14-बी, सेक्टर-आई, इंडस्ट्रियल एरिया, गोविन्दपुरा, भोपाल।
4. हिंदी समय डॉट कॉम (संकलित कहानियाँ - चिट्ठी, श्रृंखला, वजूद, सोने का चाकू, हाकिम कथा)।
5. अन्य पत्रिकाओं (यथावत, आलोचना), अखबारों (अमर उजाला, जनसत्ता), कुछ ब्लॉग (समान्तर, यादें)।
-सुबोध ठाकुर
शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय
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