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विकास की अवधारणा और आदिवासी समाज : डॉ अंशु यादव

एक लोकतांत्रिक समाज अपने नागरिकों को विकास के समान अवसर प्रदान करने की गारंटी देता है क्योंकि लोकतांत्रिक समाज का मुख्य आधार है- एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए सरकार जनता के कल्याणार्थ अनेक प्रकार की विकास योजनाएं बनाती है। जैसे खनिजों से भरे जंगलों में खाने, स्टील प्लांट, पेट्रोलियम शोधक प्लांट, फयरिंग रेंज, बड़ी औद्यौगिक परियोजनाएं, बड़े बांध, सिंचाई योजनाएं, सेज, गैस पाइप लाइनें, बड़ी-बड़ी बिजली परियोजनाएं विदेशी नमूनों के आधार पर साफ और खूबसूरत महानगरों की रचना। निस्संदेह इन सभी योजनाओं का उद्देश्य लोगों के हितों और उनके जीवन की बेहतरी बताया जाता है। ‘‘हम सभी जानते है कि स्वतंत्रता के बाद से सभी सरकारों का उद्देश्य रहा है- ब्रिटिश शासकों द्वारा छोड़ी गई दरिद्र, पिछड़ी हुई औपनिवेशिक समाज व्यवस्था का एक समृद्ध, स्वतंत्र, विकसित आधुनिक औद्योगिक शहरी समाज व्यवस्था में रूपांतरण।’’ (1) विकास का यह रास्ता मिश्रित अर्थव्यवस्था वाली निर्देशात्मक योजना की अभिधारना के अनुसार बनाया गया था। विकास की इस प्रक्रिया के तहत ही कुछ ऐसे कदम उठाये गए जिनका उद्देश्य शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों का विकास करना था।



पंचवर्षीय योजनाएं इसी दिशा में किया गया एक सार्थक सकारात्मक प्रयास हैं लेकिन यहां एक गंभीर प्रश्न जन्म लेता है कि जिस उद्देश्य के तहत इन विकास योजनाओं का निर्माण किया गया और उन्हें अमली जामा पहनाया गया क्या वे समस्त उद्देश्य पूर्ण हो पा रहे हैं? विकास ‘किसके लिए’ और ‘किस कीमत’ पर होना चाहिए? विकास की प्राथमिकताएं क्या-क्या होनी चाहिए? विकास का सही ढ़ाँचा क्या होना चाहिए। ये सारे प्रश्न विकास के तमाम प्रयासों पर प्रश्न चिन्ह लगा देते हैं। कारण स्पष्ट है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का बढ़ता ग्राफ, शेयर बाजार के सूचकांक में लगातार उछाल जिनकी बदौलत कायम है, वे लगातार दरिद्र हो रहे हैं। समाज में लगातार हाशिए पर धकेले जा रहे हैं और विकास की दौड़ में पीछे छूट रहे है। इसलिए सरकार का यह दायित्व है कि वह अपनी विकास परियोजनाओं को लागू करने से पहले यह सुनिश्चित कर ले कि इन विकास परियोजनाओं से आम आदमी लाभान्वित होता है।




चूंकि ’’विकास परिवर्तन की एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक देश के अधिकाधिक नागरिक उच्च भौतिक रहन-सहन के स्तर, स्वस्थ एंव दीर्घ जीवन और अध्कि षिक्षा का भोग करते है तथा उन्हें अपने रहन-सहन के तौर-तरीकों पर अत्यधिक नियंत्रण के साथ-साथ इस संबंध में उन्हें चयन की सुविधा भी प्राप्त होती है। दूसरे शब्दों में, सामाजिक व्यवस्था, सामाजिक संरचना, संस्थाओं और सेवाओं की निरंतरता बढ़ती हुई ऐसी क्षमता को विकास कहते है जिसमें संसाधनों का उपयोग इस प्रकार किया जाता है ताकि जीवन स्तर में अनुइल अपेक्षित परिवर्तन किया जा सके। यह परिवर्तन समाज के सभी वर्गो, मानव- समूहों के जीवन में स्पष्ट नजर आता है।’’ (2) इस प्रकार विकास की अवधाणा एकांगी न होकर समाज के सभी वर्गो, मानव समूहों को साथ लेकर चलने वाली होनी चाहिए। साथ ही, संसाधनों के न्यायोचित वितरण पर आधारित होनी चाहिए।




पिछले कुछ दशकों में विशेषकर आदिवासी समाज को इस विकास की तीव्र गति ने हाशिये के लोगों को और अधिक हाशिये पर धकेल दिया है। ब्रिटिश सरकार ने जिस मानसिकता के तहत आदिवासी समाज को देखा समझा था, वही दृष्टिकोण आजाद भारत का भी बना हुआ है। तरह-तरह के कानून बनाकर जल, जंगल एवं जमीन पर से उनके अधिकारों को संकुचित किया गया है जो आज भी जारी है। विकास के नाम पर आदिवासियों की बस्तियां उजाड़ी जाती हैं । ‘‘भारत के आदिवासी जन-समूहों का विस्थापन व पलायन तो ऐसे सदियों से ही जारी है परंतु इधर विकास के नाम पर बरती गई नीतियों के कारण वे केवल अपकी ज़मीनों, संसाधनां व गाँवो से ही बेदखल नही हुए बल्कि उनके नूल्यो-नैतिक अवधारणाओ, जीवन शैलियों, एवं संस्कृति से भी उनके विस्थापन की प्रक्रिया तेज हो गई।’’ (3) यह विडम्बना है कि जिस विकास से आदिवासियों को कोई लाभ नहीं होता उसके लिए सर्वाधिक बलिदान उन्हीं से लिया जाता है और विकास की बलि चढते हैं निरीह आदिवासी।


हमारा समाज पिछले कुछ दशकों से बदलाव की जिन परिस्थितियों से गुजर रहा है उनका बेहतरीन उल्लेख है- स्त्री, दलित और आदिवासी से संबंधित साहित्य में। नर्मदा बचाओं आंदोलन से जुड़ी मेधा पाटकर विस्थापन की अवस्था से गुजर रहे आदिवासी समाज की इन्हीं चिंताओं को लेकर पिछले कुछ दशकों से आंदोलनरत हैं। वह परिवर्तन और विकास की इन्हीं असमान प्रक्रियाओं की देन है।


आदिवासी जीवन, समाज और संस्कृति का अस्तित्व आज वैश्वीकरण, उदारीकरण, निजीकरण और उपभोक्तावादी माहौल में संकटग्रस्त और चुनौतीपूर्ण हो गया है। उनकी सामूहिक और समतामूलक जीवन-शैली छिन्न-भिन्न होती जा रही है। ऐसे माहौल में, ऐसी स्थिति में, आदिवासीयों के पारंपरिक-सांस्कृतिक मूल्यों के अस्तित्व का प्रश्न खड़ा हो गया है? विकास के नये मॉडल आदिवासी समाज के जल, जंगल और ज़मीन के भरपूर दोहन पर आधारित हैं जिसके कारण आदिवासियों के विस्थापन की गंभीर समस्याएं पैदा हो रही हैं । विस्थापन और बेदखली की मार आदिवासी समाज की नियति बन गई है। आदिवासी अपने ही घर में बेगाने हो रहे हैं। विकास के नाम पर उनके हिस्से सिर्फ विनाश आ रहा है। इसकी शुरूआत विकास-योजनाओं के सरकारी ऐलान के साथ हो जाती है। 




जंगल, जमीन, नदी- झरने और पर्वत आदिवासियों की पारंपरिक मिल्कियत रहे हैं जो उनसे लगातार छिन रहे हैं। जहां वे अल्पसंख्यक हैं, वहां वे अरसे से इन ज़्यादतियों को झेलते आ रहे हैं। दुखद यह है कि वे झारखंड में भी इसी नाइंसाफी को जी रहे हैं। यहां भी उन्हें लगातार हाशिये पर धकेला जा रहा है, जबकि इन राज्यों का गठन ही यहां के मूल निवासियों के विकास के उद्देश्य से किया गया था।


स्पष्ट है कि तथाकथित विकास के दौर में जिस तरह प्राकृतिक संसाधनों, ग्रामीण जीवन शैली और व्यवस्था को तहस-नहस, छिन्न-भिन्न किया जा रहा है, उससे स्थिति बद से बदतर होती गयी है। एक ओर तो पारिस्थितिक असंतुलन जैसी गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं तो दूसरी ओर अपने जल, जंगल और ज़मीन से विस्थापित आदिवासी समाज अपने आपको बहुत असुरक्षित अनुभव कर रहा है। उसे अपनी ‘अस्मिता’ संकट में दिखाई दे रही है। उसके नैसर्गिक अधिकार को भी खत्म किया जा रहा है जिससे अनेक समस्याएं जन्म ले रही है। विस्थापन की मार झेल रहे इन आदिवासियों के लिए नौबत भूखे मरने और ‘राजा से रंक’ होने जैसी है क्योंकि इन विस्थापितों को पुनर्वास और मुआवजे का हक भी नहीं मिलता। दरअसल मुआवजे और पुनर्वास के लिए जरूरी होता है जमीन का अपने नाम पट्टा लेकिन ज़्यादतर आदिवासियों के पास यह कागजी दस्तावेज नहीं होता। जंगल और पहाड़ों पर नैसर्गिक अधिकार रखने वाले इन भूमि-पुत्रों को विस्थापन के बाद जमीन का एक टुकड़ा और मुआवजे का एक पैसा तक नहीं मिलता।




आदिवासी समाज की इन जटिल स्थितियों का साहित्यिक रूपांतरण एक चुनौती भरा कार्य रहा है क्योंकि आदिवासी समाज की जो स्थिति है वह तात्कालिकता और रचनाशीलता के मध्य एक द्वंद्व को जन्म देती है। द्वंद्व की यह समस्या साहित्य की अन्य विधाओं के साथ-साथ कहानी में भी बेहतरीन तरीके से अभिव्यक्त हो रही है। हरिराम मीणा, रमणिका गुप्ता, अवधेश प्रीत, संजीव और अनंत कुमार सिंह जैसे कथाकारों की कहानियां आदिवासी समाज की समस्याओं, उनके स्वप्नों एवं संघर्षों की दास्तान है।


आदिवासी की बुनियादी समस्या अपने अस्तित्व और अस्मिता की खोज करना और उसकी लगातार रक्षा करना है। इसीलिए सामाजिक और कलात्मक दोनों स्तरों पर सता प्रतिष्ठान के विविध रूपों से संघर्षशीलता अनिवार्य हो जाती है क्योंकि मनुष्य की मुक्ति की प्रक्रिया अंततः अमानवीय सत्ता के विरूद्ध संघर्ष के साथ जुड़ी हुई है।


अपनी अस्मिता और मुक्ति की भावना के प्रति निरंतर जागरूक हो रहे आदिवासी के संघर्ष, उनके शोषण और प्रतिवाद के स्वर को समकालीन हिन्दी कहानी बखूबी अभिव्यक्त कर रही है। आदिवासी समाज को जीवन के प्रत्येक मोड़ पर ‘बाहरी लोगों’ के उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है। अंततः रचनाकार यदि वह सच्चे अर्थां में प्रतिबद्ध है तो आदिवासियों के बहुस्तरीय संघर्ष, को जरूर चित्रित करता है और समकालीन कहानी अपने इस प्रयास में निःसदेंह सफल हो रही है।


एक ओर विकास के लिए घने जंगलों के साफ किया जा रहा है, तो दूसरी ओर पहाड़ो और गांवों में बड़े-बड़े बाँध बनाए जा रहे है। बांधों के निमार्ण की प्रक्रिया में बहुत सारे गांव डूब जाते हैं। इसी तरह एक गांव के डूबने की कहानी है ‘बुडान’। जिसमें केवल एक गांव ही नही डूबता बल्कि उसके साथ गांव के समस्त रीति-रिवाज, राग-द्वेष, सुख-दुख के अनुभव भी डूब जाते है। ‘‘विकास के नाम पर बांध बनाए जाते हैं, गांव उजाड़ दिए जाते हैं। बांध के अथाह पानी में गांव बुड़ता है। इस बुड़ान के गर्व में ढेर सारी खट्टी-मीठी स्मृतियाँ बूझ जाती हैं। मसलन बच्चों का बचपना और स्कूल, शैतानियां और प्यार, बड़ों का कइयांपन, घर-द्वारा खेती बाड़ी गांव के जायज-नाजायज़ दंड-विधान और दादी मां का बिछावन।’’ (4) इन्हीं डूबी हुई स्मृतियों और उनकी वेदना की दास्तान इस कहानी में सुनाई देती है।




‘बुड़ान’ की निम्नलिखित पंक्तियां विस्थापित समाज की जिन विडंबनाओं की तरफ संकेत करती है, वहां विकास की तस्वीर तो दिखाई पडती है, पर जिंदगी के नाम पर अब वहां सिर्फ जल है- मनुष्य तो लुप्त ही हो गया है, जिंदगी की तलाश में गई डोंगरी की विशाल परछाई भी कहीं विलीन हो गई हैः ‘‘जब वे वापस लौट रहे थे तब उनकी लंबी परछाईयां पानी पर थिरक रही थीं। कुछ देर बाद किनारे में फैली हुई उजाड़-काली और पथरीली डांगरी की विशाल परछाई में विलीन हो गई। धीरे-धीरे डोंगरी परछाई भी लुप्त हो गई। अब वहां सिर्फ जल था। शांत और बंधा हुआ जल। जाहिर है, यहां सिर्फ परछाईयां ही लुप्त नहीं हुई हैं, बल्कि एक समाज का पूरा वजूद ही लुप्त हो चुका है, जिसकी खोज में गन्नू और चोई एक छोटी-सी डोंगी और पतवार लेकर जाते हैं।


संक्रमणकालीन स्थितियाँ व्यक्ति अथवा समाज को हाशिए पर ढकेलने में बड़ी भूमिका निभाती है। व्यक्ति अथवा समाज अपनी जमीन, अपनी मिट्टी से अलग होकर कहीं और बसने के लिए मजबूर हो जाता है। संक्रमणकालीन स्थितियों का सबसे अधिक खामियाजा स्त्रियों को भुगतना पड़ता है। उन पर दोहरी मार पड़ती है- पहला-स्त्री होने के कारण और दूसरी आदिवासी स्त्री होने के कारण। ‘शनीचरी’ कहानी में महाश्वेता देवी ने विकास के लिए जंगल से बाहर मुख्यधारा में गए आदिवासी समाज की स्त्रियों की संक्रमणकालीन स्थितियों एवं दुर्दशा का चित्रण करते हुए लिखा हैः ‘‘ईंट बिठाओ, ईंट-बिठाओं शनीचरी। कहां आई तू, किस देश में कुछ समझ में आया? रहमत का बच्चा पेट में लेकर दूर-दूर तक फैले। धान के खेत को उदास आंखो में आंसू लिए देखती रहती हो। ऐसा बंधुआपन। तुम शायद जानती हो, यह तुम्हारा कैदखाना है। तू जानती नहीं इस देश की भाषा। किस रास्ते से आई थी, शायद उसका पता भी भूल गई है।’’ (5)


शनीचरी’ कहानी की पंक्तियां उन अमानवीय स्थितियों की गवाह हैं जिनका सामना आदिवासी समाज को करना पड़ता है। अपने मूल स्थान से दूर होकर किसी नये समाज का हिस्सा बनना कितना पीड़ादायक है। ऐसा समाज जो बोली बानी में एकदम अलग है। क्या इन लोगों के लिए अपने समाज, अपनी संस्कृति, भाषा और भूगोल से दूर होने की यातना भयावह नहीं होती होगी?


वनभूमि आदिवासियों की सामाजिक सांस्कृतिक पहचान और आजीविका का आधार होती है। इससे अलग होना ये स्वीकार नहीं कर पाते। इनके के लिए ‘‘भूमिहीन होने का अर्थ अभावग्रस्त होना है और आदिवसी समाज में इसका एक ही अर्थ होता है- मनुष्य को मनुष्यता के आधार से वंचित कर देना।’’ (6) भूमि का मुआवजा नाम मात्रा को मिल पाता है। सुदूर जंगलों में रहने के कारण सरकारी अधिकारी इलाके में विकास का जायजा लेने जाते ही नहीं हैं। बड़े नेता भी सिर्फ वोट के दिनों में ही जाते हैं।


‘‘आज यह सभी स्वीकार करते है कि गाँव के छोटे किसान तथा आदिवासी शासन द्वारा निर्धारित विकास का लाभ लेने में असमर्थ हैं। इस तरह जमीन से बेदखल आदिवसी अपने को जीवित रखने की कोशिश में शहरों में मजदूरी करता है, रिक्शा चलाता है। शहरी होटलों में झूठे कप प्लेट धोता है। दूसरी तरफ शहरी आदिवासी परिवार की महिलाएँ नवनिर्मित तथा भव्य कॉलोनियों में नौकरानी के बतौर अपने आपको स्थापित कर चुकी है।’’ (7) इस प्रकार आजीविका का संकट, अनिश्चितता और सांस्कृतिक पहचान खत्म होने का डर इनके सामने हमेशा बना रहता है।


भालचंद्र जोशी की कहानी ‘राजा गया दिल्ली’ पुनर्वास और मुआवजे के नाम पर प्रशासन द्वारा की जा रही ज्यादतियों को सामने लाती है। यह कहानी एक ओर तो विकास योजनाओं की वास्तविकता को सामने लाती है और दूसरी ओर वह प्रशासन और राजनेताओं द्वारा गरीब भोले-भाले किसना- आदिवासियों के साथ किये जाने वाले दुर्व्यवहार को। जिस जनता की ‘वोट’ पाकर राजनेता तमाम तरह की सुविधाएँ और अधिकार हासिल करते हैं, उसी जनता को हफ्तों-हफ्तों पुनर्वास और मुआवज़े की राशि पाने के लिए उनके पीछे दौड़ना पड़ता है। परिणाम वही होता है जो जगन और कालू के साथ हुआ। मंत्री जी ने कोरा आशवासन देकर दोनों को वापस लौटा दिया। दोनां बिल्कुल निराश और हताश वापस लौट गए थे , जानते थे मंत्रा जी ने उनसे झूठ बोला है।


सन्दर्भ ग्रन्थ सूची 

1. भारत का विकास मार्ग- डी. आर. देसाई

2.  सामाजिक मानवशास्त्र, वीरेन्द्र प्रकाश शर्मा

3.  आदिवासीः विकास से विस्थापन- रमणिका गुप्ता

4 . बुडान- पूरन हार्डी

5.  ईंट के उपर ईंट- महाश्वेता देवी

6.  आदिवासी समाज और शिक्षा- रामशरण जोशी

7.  मानव और संस्कृति- श्यामचरण दुबे

8.  राजा गया दिल्ली- भालचंद्र जोशी


लेखिका डॉ अंशु यादव ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से एम फिल और दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी की है। संप्रति वर्तमान में भारती कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।










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