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कामकाजी महिला दोहरा शोषण : डॉ॰ अंशु सिंह झरवाल

शोध प्रत्र में सर्वप्रथम मैं, ‘महिला’ शब्द पर विचार करना चाहती हूँ। संस्कृत में स्त्री और नारी शब्द का प्रयोग हुआ है। यास्क ने निरुक्त में ‘स्त्यै’ धातु से स्त्री शब्द की व्युत्पत्ति की है, जिसका अर्थ है - लज्जा से सिकुड़ना। और उद्देश्य के इंगिति में इतना भर कहा गया कि लजाना तो उसके स्वभाव में ईश्वरीय है। तर्क-निपुणा उस स्थिति को अच्छी तरह से समझ चुकी है कि कही जाने वाली सुमर्यादित परम्पराओं के तुल्य यह भाव भी पुरुष समाज द्वारा प्रत्यारोपित है। पतञ्जलि ने ‘स्तन केशवती स्त्री स्यात्लोमशरू पुरुषः स्मृतः’ कहा। जिसका आशय स्त्री के सौन्दर्य को निर्मित करना था, जो पुरुष के नयनाभिराम के उपरान्त स्मर का मंदिर बने। 



और जब महिला की बात करते हैं, तो संस्कृताचार्यों ने ‘मह्’ धातु से इसकी उत्पत्ति स्वीकार की है जो आदर या पूजा का द्योतक है। प्रत्यय रूप में ‘इला’ का योग करने से वह  आदरणीया, महान् आदि, स्त्री का बोधक बन गया। हिन्दू संस्कृति के उपासक ‘महिला’ शब्द को स्त्री की महिमा या समाज में उसकी बुलंद हैसियत को रेखांकित करने वाला शब्द निर्देशित करते हैं। एम.आर. काले के संस्कृत-धातु-कोश में ‘मह्’ का अर्थ आदर और आनंदित करना  है। आप्टे की दृष्टि में महिला शब्द ‘विलासिनी’ का सापेक्ष है। सम्प्रति लेडी और वुमन शब्द में जो भिन्नता है, वही महिला और स्त्री में है। मेरे विचार में, ‘महिला’ शब्द मुख्यतः उन युवा स्त्रियों के लिए प्रयुक्त है, जो विदुषी और कर्मण्या होय पुरुष से प्रतिस्पर्धा करने की जिनमें क्षमता हो। प्राचीन भारत से पश्च-मध्यकाल तक का साहित्य इस शब्द से निस्पृह था। यह तो स्पष्ट है, कि उक्त विवेचन ने मानव के फिमेल स्वरूप को ही अनावृत किया है। ‘कामकाजी’ (अभिक्रांती) शब्द यहाँ हिन्दी के विशेषण के रूप में प्रयुक्त हुआ है, जो ‘जिसे अनेक काम करने हों’ अर्थ का द्योतक है तथा इंग्लिश भाषा में एंगेजड इन पद कहेंगे। शब्दों की  संप्रयुक्ति से ‘जिस महिला के हाथ में अनेक काम रहते हो’ अभिप्रायः की प्रतीति होती है अर्थात् अ लेडी हूं इंगेज्ड इन फुल टाइम वर्क। 

अब मैं मूल विषय पर पहुँचना चाहती हूँ। हमारे देश की आबादी का लगभग आधा भाग महिलाएँ हैं। संविधान में इन्हें पुरुषों के समान अधिकार दिए हैं किंतु अनेक पूर्वाग्रह और लिंग-भेद के परिणाम स्वरूप अनेक असमानताओं का सामना करना पड़ता है। लगभग सभी महिलाओं को शोषण व हिंसा का शिकार होना पड़ता है।

19वीं शदी के प्रारम्भ में ब्रह्म समाज, आर्य समाज, प्रार्थना समाज, थियोसोफिकल सोसायटी, रामकृष्ण मिशन तथा सरकारी संगठनों ने नारी शिक्षा व कुप्रथाओं से नारी की मुक्ति के रास्ते खुलने लगे। स्वतंत्रोत्तर, अधिकार प्राप्त नारी के प्रति समाज में सम्मान की भावना का उदय हुआ। नौकरी-पेशावाली स्त्री के प्रति, पुरुष की पुरातन विचार मान्यताओं में बदलाव आया। अब राजनीति, कारोबार, सेना, खेल, इंजीनियरिंग आदि में नारी स्थापित ही नहीं हुई, बल्कि कार्य करने में अपना कौशल दिखाने लगीं। परन्तु घर से बाहर निकल कर काम करने में, उसे कहीं कम तो कहीं अधिक शारीरिक तथा मानसिक परेशानियों का सामना अवश्य करना पड़ा। 

यहाँ कामकाजी महिला का तात्पर्य मात्र उन सभी स्त्रियों से है, जो नित्य पारिवारिक जीवन के आवश्यक कार्यों जैसे- घर की स्वच्छता, वस्तु-रख-रखाव, किचन-कार्य, बच्चों के दैनिक कार्यों का ध्यान रखना। यहाँ तक कि बच्चों की पढ़ाई-लिखाई भी माता के सहयोग के बिना अधूरी रहती है। सास-ससुर और यदि संयुक्त परिवार में हो, तो परिवार के प्रत्येक सदस्य का उनकी रुचिअनुसार कार्य-व्यवस्था का ध्यान रखने के अनन्तर, तब कहीं एक या अधिक गतिमान् साधनों से संघर्षरत होकर आजीविका-स्थल पर पहुंचती है। रिश्ते-नातों की परम्पराओं के निर्वहन बगैर उसके शोभित या सम्पूर्ण नहीं होते हैं। बावजूद भी उसे सास, ससुर, पति के अधैर्य किंवा अनभिज्ञता में चूक होने पर उनका शासन झेलना पड़ता हैं।

 ग्रामीण या नगरस्थ कामकाजी महिला, भले ही वह अन्तिम श्रेणी की कर्मचारी हो, शिक्षिका हो, क्लर्क हो, नर्स हो, सुरक्षा-व्यवस्था में हो, अधिकारी हो या सरकारी, निजी क्षेत्रों की श्रेणी में पदत्व प्राप्ता। अन्यथा किसी भी संवर्ग (विविध मजदूरियों) के कार्य की प्रस्थिति में हो, लौटने के गृह-स्थान में उसे वे ही वस्त्र परिधान करने होते हैं, जो जाति, धर्म या क्षेत्रगत अन्य बहुधा स्त्रियाँ के ओढ़न के अनुरूप हो। काला अक्षर भैंस बराबर वाला घूंघट निकाल कर अथवा प्रथेय चुन्नी डालकर भोर से ही गृह-कार्यों को करने में जुट जाना अपना कर्तव्य समझती है।  वह तत्परा पुरुषों की संस्कृति में मूक, अन्यान्य कार्यों में संलग्न रहती।  वह कामकाजी विमुद निर्धारित समय तो रहती ही है, अधिक भीय दिन हो या रात, निपुणता के साथ ड्यूटी की थकावट में पुनरागमन करती है, उपरान्त, वह कारिणी घर के कर्तव्यों को पूरा करती है। किन्तु पीड़ा इस बात की है कि आधुनिकता की चिल्लाहट में भी पुरुषत्व-धारणा, घर-परिवार के सामान्य दायित्वों के प्रति निर्विमर्श बना हुआ है। 

शोषिता का कथोपकथन धर्म, भाषा, क्षेत्र आदि में समावृत है। सामाजिकों का आगमन भी टाइम वाउण्ड जैसा होता है। उनका चाय-पानी, नाश्ता या खाने की व्यवस्था में पति रंचभर भी हाथ न बंटाकर, उन आगुन्तकों के मध्य अपनी उपस्थिति वार्तालापों तक सीमित रखता है। पौरुष स्वर में वह अनेक आदेश प्रिया (कहने को) को देता है। पति के अहम् में हमदर्दी, संकोच-भाव और प्रिया-प्रेम पुरुषत्व में विगलित रहते हैं। 

यदि स्त्री का धर्मग्रंथों में कथित पति ईश्वर, दुर्व्यसनों में से एक या अधिक का शिकार हो, तो शोशण की पराकाष्ठा का निकट और अस्मिता की सुरक्षा कहीं नहीं दिखाई देती। वह अधिक्षिप्त पुरुष रूप में बना क्लीव, उसे आशंका में लम्बवत् खड़ा कर देता है। उसकी बदतर, घिनौनी, अश्लील भाषा के अभिप्रेत की वह समझ रखते हुए भी जिजीविषा में अंतिका नहीं होती। कर्मशीला के लिए सकारात्मक प्रयासों (शान्ति-होम तक के) पर भी मारने-पीटने का पर्याय प्रतिवासियों में अपवाद को अश्रुत करना ही शेषत्व में रह जाता है। किसी वृतिका प्राप्त महिला की स्थिति तो रूह को झख-झोर देनेवाली होती है। पति देव के मदिरापान में शराकती सुहृद्-जन, बच्चों के अंकल, छल, कपट, प्रलोभन या असमर्थता से वाकिफ होकर परिमलज प्राप्त करने में नहीं चूकते हैं।          

दूसरी ओर कार्याधिकारी की प्रवृति या विभागीय प्रकृति के मुआफिक अवकाश में भी कार्य करने को लाचार है। कामकाजी महिला अपनी दुविधात्मक स्थिति पर खीझती है सर पटकती है पर करे क्या ? घर के कार्य व्याकुलता से असमाप्त करके, प्रथमतः जीवन-वृत्ती का कर्म करने को विवश है। एक ओर वह सुन्दर है या नहीं, युवा है या प्रौढ़ोत्तरा। उसकी प्रत्येक कोणात्मक अंग-मुद्राओं पर आँख गढ़ाये ऑफिस के हों या मार्ग के कुत्सित कृत्यों के अभ्यासी लोगों के अनिष्ट से वह अपनी निम्नवत् दृष्टि डाले, भयाकुल, प्रतिदिन घर वापसी  पर ही लंबी सांस लेती है। स्वाधीनता की वायु उसके जीवन में कहीं भी मलयानिल नहीं बन पाती है।



गाँव की कामकाजी महिला, घर के परम्परा-प्रदत्त कार्यों में निराश भाव की उपस्थिति में अभ्यत बन चुकी है। चूल्हे पर लकड़ी-अग्नि-धुआँ से खाना बनाना, गाय-भैंस का काम करना। इसके अतिरिक्त खेतों की फसलों में सर्द रातों में पानी देना, उनकी निराई-कटाई करना, घर के या बाहर के रिश्ते-नातों के विविध संस्कारों में रोना-धोना, नृत्य करना, लोकगीत गायन आदि पुरुषायित आधिपत्य के कारण ही करना पड़ता है। सिलाई, कढ़ाई, बुनाई का कार्य भी उसके प्रासांगिक जीवन का एक प्रसरण है। ‘बुभुक्षं किं न करोति’ को तिरस्कृत करती हुई,  क्षुधापूर्ति भी परिवारजनों के परितुष्ट होने के पश्चात शेष से संतोष करना उसकी विडम्बना है? इसके भिन्न, अनुभव-दृष्टि की सीमा-पथु में संलग्न हुआ है कि आयुष्य के खयाल से दारकर्म के अनन्तर भी युवा लड़का और लड़की नौकरी पाने की स्पर्धा में प्रभूत प्रयास करते हैं। सुखद जीवन की अभिलाषा में वह एकाग्रमना घर-बाहर का कामकाज करती हुई सरकारी या गैर सरकारी नौकरी प्राप्त करने में कामयाब हो जाती है। ज्योंही शोषण के दोहरेपन का कार्य (पति से परिवार तक) उसकी जीवन-गति के विपरीतपन को ही उद्घाटित करता है। निरूत्साही युवा पति अपनी अहमियत में उसके संघर्श की कमाई को जरा भी खयाल न कर अपव्यय कर देता है। परिणामतः निरूष्वासों में जीवन-जीना उसकी जृंभाओं से प्रतिबिंबित होता है।   

महानगरों या बड़े नगरों में निवासित कामकाजी महिलाओं के अस्तित्व की ओर निरपेक्ष उद्देस्यात्मक निगाह की जाय, तो कुछ इतर ही शोषण के वीभत्स रूप देखने में आते हैं। मानस-सृष्टि में, पत्नी रूप में महिला पति के संसर्ग की चाह में, प्रकृतस्थ भाव-अनुभावों की कामना में, परितोश की व्यापक अनुभूतियों में समा जाना चाहती है। बजाय, सभी को तो नहीं कहूंगी, वर्तमान युग-संक्रांति में उसका पति कहीं बेगाना हृदया का भ्रमर होने से, फरेब में मन का दर्द ही समाये रखती है। इन्टरनेट के विश्वदर्शन ने उस असहज कामकाजी महिला का अन्तःकरण भाव-शून्यता के भराव से निश्षेश कर दिया है, अब उसको माता-पिता, भाई-बहिन, सास-ससुर और अन्य जितने भी रिश्ते होते हैं, उनसे किंचित् भी अनुशक्ति नहीं मिल पाती है। प्रेमाद्र भावनाओं के विपरीत उनके रूखेपन का अवबोधन करती है। प्रताड़ित और जज्बों के अपहरण में दम भरती है।

शोषिता की दुरावस्था हदपार अदृश्य है। न्यूज में अथवा देखने-सुनने को मिलता है कि वह अतिआकांक्षी कामकाजी, देह-धन शोषण के परिभुक्तोपरान्त इंसाफ की गुहार में किसी न्याय द्वार में भटकती है। न्याय के अभाव और समाज के तिरस्करण में उसका प्रत्यक्षित जीवन अन्तहीन दुरूखों से खण्डहर हो जाता है। रूढ़िवादी समाज में उसके दुर्भाग्य का अस्तरहित शुक्र ग्रह ही टिमटिमाता है। विष्वास बेवफाई का पर्याय बन जाता है। साहसी कामकाजी  भञ्ज जीवन को पुनः गति देने की चाह में, कुछेक के भाग्य भले ही अच्छे हों, वरन् हरेक प्रकार से षोशित ही होती हैं। जो भुक्त काम-काजी का एक दाव जैसा है। प्रथम और द्वितीय परीक्षा के पति-व्यहार या सुप्रियजनों के हृदयों की रिक्तता उसे वीतराग बना देती हैं। कई निरुपाय अभागिन मृत्यु का आलिंगन करके अपना अंतिम हथियार काम में लेती हैं। कानून का लचीलापन, सुरक्षा विभाग की भ्रष्टाचार और लापरवाही, दबंगों की सरकार  में पैठ, पुरुषवादी समाज की अटूट पुरातन धारणा, प्रतिस्पर्धात्मक भाव, बनाव-सिंगार की इच्छा, लाचार आदि प्रमुख वजह हैं, जिनके चलते कामकाजी महिला का शोषण अविराम गति से बेरोक दुहरे रूप में गतिमान है।    

ऐसे में काव्य, नाटक, कहानी, उपन्यास, निबन्ध, पत्र-पत्रिकाओं और सभा-सोसाइटियों में महिला के दुःख-दर्द, कुंठा, घुटन, मानसिक-विडम्बना, शोषण आदि विविध समस्याओं पर 70 के दशक से लेखन व प्रचार का नारी आंदोलन (विमर्श) चल पड़ा। प्रेमचन्द से लेकर राजेन्द्र यादव तक पुरुष लेखकों ने स्त्री समस्या पर अनेक रचनाएँ लिखी, परन्तु उस रूप में नहीं लिखा, जिस रूप में स्वयं महिला लेखकों ने लिखी। उषा प्रियम्वदा, कृष्णा सोबती, मन्नू भण्डारी, एवं शिवानी आदि लेखिकाओं ने नारी मन के अंतर्द्वद्वों एवं भुक्त घटनाओं को रचनाओं के माध्यम से प्रकट किया।  इन विमर्शों में नारी के अधिकारों, लिंग आधारित भेद-भावों, सेक्स स्वातन्त्र, स्त्री होने की धारणा से मुक्ति और शोषण पर विशेष ध्यान केन्द्रित रहा। 



स्त्री की स्थिति के मूल में केवल उसका स्त्री जन्म है। स्त्री जन्म से स्त्रीत्व का भाव लेकर नहीं आती, बल्कि पुरुष समाज द्वारा विनिर्मित परिवेश ही उसे स्त्री मानसिकता में परिवर्तित करता है। डॉ. प्रतिभा पाठक का विश्लेशण है, कि ‘‘जन्म से लेकर शैशव अवस्था तक नर और नारी की मानसिकता में कोई अंतर नहीं होता।’’   

विषय की गंभीरता में प्रभा खेतान ने स्त्री का पर्यायवाची अन्या शब्द के तात्पर्य पर कहा, कि ‘यह इस बात को सिद्ध करता है, कि स्त्री और पुरुष में कोई परस्परिक संबंध नहीं था। चाहे वह धरती थी या माता या फिर देवी रही हो, किन्तु पुरुष-संगी अथवा मित्र कभी नहीं रही।’  

चित्रा मुद्गल की रचना ‘आंबा’ एवं ‘जमीन अपनी’, ममता कालिया की ‘बेघर’, मृदुला गर्ग की ‘कठ गुलाब’, मैत्रेयी पुष्पा की ‘अल्मा कबूतरी’ एवं ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’, प्रभा खेतान के ‘छिन्नमस्ता’, मेहरून्निसा परवेज का ‘अकेला पलाश’, शशिप्रभा शास्त्री की ‘सीढियां’, दीप्ति खंडेलवाल के ‘प्रतिध्वनियाँ’ आदि में नारी की काम -काजी स्थिति का जो अंकन किया है, वह किन्हीं मर्मस्पर्षी घटनाओं से कम नहीं है।

ममता कालिया ने अपने काव्यों (‘खाँटी घरेलू औरत’ और ‘कितने प्रश्न करूँ’), कहानियों, उपन्यासों आदि में नारी के दोहरे शोषण की खुलकर अभिव्यक्ति दी है। लेख-सीमा की चेतना में उनके दो-चार उपन्यासों में स्त्री के कुछ दृश्यों को देखना ही संभव हो सकेगा। उनके ‘बेघर’ उपन्यास की संजीवनी, विवाह पूर्व सम्बन्धों के कारण, पति परमजीत अलग हो जाता है। इसमें नारी के स्वावलंबन, सारे परिवार की जिम्मेदारियों, रिश्तों में पैसों के महत्व, रिश्तों में स्वार्थापन आदि का परीक्षात्मक चित्रण किया है।  

‘बेघर’ उपन्यास की दूसरी स्त्री पात्र विजया केलकर है, जो अविवाहिता कामकाजी महिला है। वह एडवरटाइजिंग एजेंसी के मालिक के घर उसकी पत्नी जैसी रहती है। 

आसपास के लोगों का कहना था, कि ‘‘यह लड़की न तो मालिक की बीवी थी, न टाइपिस्ट। उसका सरनेम केलकर और मालिक का वालिया था। पर वह वालिया को डार्लिंग कहती और वालिया उसे माय लव।’’   यह हरेक दफ्तर की आधुनिकता है। एक अन्य पात्र अलका को वालिया ने अपने ऑफिस में नौकरी इसलिए नहीं दी, कि वह खूबसूरत नहीं थी।

कालिया ने ‘नरक दर नरक’ उपन्यास में हिन्दी प्रवक्ता सीता, जो अपने पति की दृष्टि में शंकाशील नारी है। वह उसे अपने घर- गृहस्थी में सहयोग नहीं देता। बावजूद उस पर संदेह करता है; उसे अपमानित करता है; तंग आकर आखिर में घर छोड़ देती है। तब पति विनय की आँखें खुलती हैं। वह क्षमा याचना करता है, लेकिन आरोप लगाने से सीता में यौनेच्छा उत्पन्न नहीं होती है।

एक अन्य उपन्यास ‘प्रेम कहानी’ में अपने वरिष्ठ डॉक्टरों द्वारा शोषण की शिकार नर्स तथा अन्य लड़कियों के दर्द को कालिया ने रचना-स्वर दिया है। इसके अतिरिक्त मातृत्व को समय न देनेवाली महिला डॉक्टर का पाठकों को अनुभव कराया है। ममता कालिया ने ‘दौड़’, ‘लड़कियां’, ‘एक पत्नी के नोट्स’ आदि अपने अन्य उपन्यासों में नारी के दोहरे षोशण को विविधता के साथ चित्रायित किया है। 

कालिया की ‘एक अदद औरत’, ‘रोषनी की मार’, ‘चोट्टिन’, ‘मनोविज्ञान’, ‘जांच अभी जारी है’, ‘प्रिया पाक्षिक’, ‘काली साड़ी’, ‘बातचीत बेकार है’, ‘दर्पण’, ‘आपकी छोटी लड़की’, ‘इरादा’, ‘मनसूहाबी’ आदि प्रमुख कहानियों में महिला के षोशण के वैरायटी शो मिल जायेंगे। लेखिका का अपना मत है; ‘‘आज के समाज को महज पुरुश प्रधान मानना अपर्याप्त होगा, वर्तमान समय प्रतियोगिता प्रधान समाज है। पढ़ी-लिखी काम-काजी स्त्री के लिए पुरुष कोई डरावना सुपरमैन नहीं रह गया है। उसकी स्पर्धा आज अपनी सीमाओं, वर्जनाओं और विकल्पों से है। एक समय था, जब हम स्त्री और पुरुष के चैखटे में सोचा करते थे। आज स्त्री भी एक फुलटाइम वर्कर है।’’    

महिलाओं के संदर्भ में सच तो यह है कि उनकी योग्यता को पुरुष प्रधान समाज द्वारा सदैव से कम आँका जाता रहा है। महिलाएं सम्पूर्ण विश्व में भिन्न-भिन्न प्रकार के शोषण का शिकार रही हैं। वे परिस्थिति जन्य स्थितियों का शिकार हैं। शिक्षा का स्तर बढ़ने की वजह से उनकी स्थिति में सुधार तो हुआ है पर काम का बोझ अभी भी उनके सिर माथे पर अधिक है। आत्मनिर्भर होने की वजह से वे निरन्तर आर्थिक रूप से मजबूत हो रही हैं। यह उनके जीवन की एक बड़ी बानगी होनी चाहिए क्योंकि परतन्त्रता का एक बड़ा कारण आर्थिक अक्षमता रही है। स्त्रीवादी लेखन के शुरुआती दौर में सिमोन द बोउवार ने कहा था कि ‘‘आर्थिक स्वतन्त्रता स्त्री की सबसे बड़ी स्वतन्त्रता है।’’ यह जमीनी सच है कि हाथ मंे पैसे होने से आप कई प्रकार की गुलामियों से बच सकते हैं।



पर महिलाओं के साथ यह विडम्बना रही है पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था ने उनको जकड़ करके रखा। स्त्रीत्व का दूसरा मतलब रिष्तों के ठोस ताने-बाने मंे- दूसरे शब्दों मंे सामाजिक संरचनाओं की प्रतीक- व्यवस्था में - पारिभाषित होने वाला वह अस्तित्व है जो एक तरफ उसके लिए भूमिकाएं निर्धारित करता है तो दूसरी ओर उसके आचरण के लिए कसौटी भी बन जाता है।’’ 

शिक्षा के प्रचार-प्रसार से देश में नौकरीपेशा महिलाओं की संख्या मंे वृद्धि हुई। समाज मंे जो नई सोच और चेतना पैदा हुई थी उसी के कारण महिलाओं में स्वावलंबन के रास्ते समृद्ध हुए। इस आत्मनिर्भर स्त्री के सामने अपने वजूद को पहचानने के साथ चुनौतियों का भी संकट आन पड़ा। प्रश्न यह था कि परिवार और कामकाज के बीच में  वह तालमेल किस प्रकार करे। परिवार नाम की संस्था ने उसके कमाये पैसों पर अधिकार करना तो शुरु कर दिया पर उसकी अपेक्षाएं अभी भी उतनी ही थी कि घर के कार्यों और दफ्तर की जिंदगी के बीच किस प्रकार समायोजन करे। जरा सी अव्यवस्था होने पर उसे घर से निकाल दिया जा सकता है उसे और उसके बच्चों को परिवार से बेदखल किया जा सकता है।

सवाल तो यह है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था इस कामकाजी स्त्री के साथ भी बेहद कड़ा रुख अख्तियार करती है। उसके पास स्त्री के नाप जोख के बहुत सारे पैमाने हैं जिन पैमानों पर उसे खरा उतरना है। घर के सारे निर्णय पुरुष ही करता है। चूँकि स्त्री को सदैव से यह बताया गया कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। इन सारी जद्दोजहद में वह बार-बार टूटती है। उसके पैरों की बेड़ियां कामकाजी हो जाने के बावजूद पूरी तरह से टूटी नहीं है। क्योंकि पितृसत्तात्मकता उसे बार-बार लांछित प्रताड़ित करती है- ‘‘पुरुष का पालक अहंकार संपूर्ण आज्ञाकारिता की अपेक्षा रखता है। स्त्री की निर्णय की योग्यता को लागू होने का मौका ही नहीं मिलता। विवेक बार-बार ठुकराया जाता है। आर्थिक निर्भरता के कारण निष्क्रिय रह जाने को मजबूर चेतना असहाय और अन्ततः असिद्ध छूट जाती है। ऐसी स्थितियों मंे उसकी स्वतंत्रता एक छद्य चेतना का रूप धारण कर लेती है। आर्थिक रूप से स्वतंत्र स्त्रियों के संदर्भ में ऐसा होना संभव है कि एक छद्म चेतना को ही स्वतंत्रता का पर्याय समझ लिया जाय क्योंकि स्वतंत्रता के लिए जरूरी जोखिम उठाने की तैयारी नहीं होती।’’ 

अकेली इन आत्मनिर्भर स्त्री के उतार चढ़ावों को समकालीन स्त्री साहित्य में बखूबी देखा जा सकता है क्योंकि स्त्रियां आज के समय में अपना इतिहास स्वयं रच रही है पर पितृसत्तात्मक नकेल हर जगह मौजूद है। इस पीड़ा से भीगता स्त्री का मन कामकाजी होने के बावजूद बच नहीं पाता। कुछ इस तरह की बातें उसकी बार-बार अग्नि परीक्षा करती है। जैसे- कार्यस्थल पुरुष सहकर्मियों से परिचय व वार्तालाप बेहद सहज और स्वाभाविक है पर ऐसे में बिना किसी तथ्य और दूरदर्षिता के स्त्री का चरित्र हनन किया जाता है। काम के दबाव और ऐसी सोच के कारण वे कुंठा और अवसाद जैसी स्थितियों का षिकार हो जाती है। स्वस्थ मानसिकता वाले परिवार भी ऐसी स्थितियों में स्त्री का साथ नहीं देते। यह सब कुछ उसे अकेले ही सहना पड़ता है।

लेखिका जया जादवानी के लेखन पर समीक्षात्मक दृष्टि डालते हुए रोहिणी अग्रवाल लिखती हैं- ‘‘बेशक समूची समाज व्यवस्था से लोहा लेना कठिन है लगभग असंभव। संभवतया इसलिए भी कि जिन्हें साथ लेकर जया स्त्री के रूप मंे एक सार्थक जीवन जीना चाहती हैं वे सब अपनी-अपनी कब्रों में सोई औरते हैं- सदियों से अपने से बेखबर, अनगढ़ पत्थर।’’ 

इस तरह इस आधुनिक नई स्त्री के सामने मुश्किलें हैं जिनसे निपटने के लिए उसके पास रास्ते नहीं है। कई बार बड़े-बड़े प्रशासनिक पदों पर होते हुए भी उसके उस जीवन को खंगालकर ही लोगों के मनसूबें पूरे होते हैं जैसे पति के साथ उनके सम्बन्ध कैसे हैं, वह किन लोगों के बीच में उठती-बैठती है या फिर ये उसका पर्सनल मामला है।

‘पर्सनल इज पाॅलिटिकल’ का यह नारा पश्चिमी आंदोलनों से हमारे देश में आया। यह ‘‘व्यक्ति के रूप में स्त्री के निजी व आत्मपरक अनुभवों को बड़े-बड़े मुद्दों के संदर्भ में अहमियत देता है। इससे स्त्रियों को ‘तरह-तरह के विमर्शी बहसों और आलोचनाओं में उतरने’ की गुंजाइश मिलती है। वे अपने मनोभावों, कामनाओं, देह व व्यक्तिगत रिश्तों से जुड़े निजी और सामाजिक जीवन के कोनों में झाँक पाती है।’’ 

इस सारे मुद्दों मंे अपरिहार्य प्रश्न यह है कि प्रथमतः जिस तरह पुरुष को लेकर सामाजिक व्यवस्था वो बंधन और प्रताड़नाएँ उस पर नहीं थोपती उसी प्रकार उसे स्त्री को लेकर भी अपने हथियार ढीले करने पड़ेगें। तभी समाज और इसकी व्यवस्था में बदलाव होगा और स्त्री भी मनुष्य के रूप में अपनी महत्वकांक्षाओं और दायित्वों की पूर्ति करते हुए सहज-सरल जीवन जी पाएँगी।

संदर्भ: 

1. समकालीन हिन्दी उपन्यास की आधुनिकता, प्रतिभा पाठक, प्रकाशन हिमाचल पुस्तक भण्डार, दिल्ली, पृ 50, प्रथम संस्करण 1992.

2. अन्या से अनन्या, प्रभा खेतान, प्रकाशन राजकमल पेपर बेक्स, दिल्ली, संस्करण 2010

3. बेघर, ममता कालिया, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, पृ. 174, संस्करण 2002    

4. मेरे साक्षात्कार, ममता कालिया, प्रकाशन किताबघर प्रकाशन, दिल्ली, पृ. 48, संस्करण 2012    

5. अस्मिता-विमर्ष का स्त्री स्वा- अर्चना वर्मा, पृ. 55 प्रथम संस्करण 2008 

6. अस्मिता-विमर्ष का स्त्री-स्वर-अर्चना वर्मा, पृ. 76, प्रथम संस्करण 2008

7. स्त्री लेखन: स्वप्न और संकल्प: रोहिणी अग्रवाल, पृ. 208 संस्करण 2012

8. कामसूत से कामसूत्र तक संपादक- मैरी ई. जाॅन और जानकी नायर अनुवाद: अनय कुमार दुबे, पृ. 94 प्रथम संस्करण 2008

डॉ॰ अंशु सिंह झरवाल 

असिस्टेंट प्रोफेसर

हिन्दी विभाग, लक्ष्मीबाई कॉलेज

 दिल्ली विश्वविद्यालय


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