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दलित समुदाय उत्पीडन, संघर्ष और संवैधानिक अधिकार : डॉ. उमा मीना

आत्मकथा में जीवन की स्मृतियाँ क्रमबद्ध रूप से एकत्रित होकर लेखक के जीवन एवं व्यक्तित्व का पारदर्शी चित्र प्रस्तुत करती हैं लेकिन दलित लेखक के लिए अपने बीते हुए दिनों को साहित्य में पुनरावलोकन करना कष्टकारक होता है क्योंकि जाति के कारण कितनी ही बार अपमान, अवहेलना और तिरस्कार को झेलने के प्रसंगों को याद करके मन व्यथित हो जाता है। आत्मकथा ‘जूठन’ के लेखक  ओमप्रकाश वाल्मीकि कहते हैं  कि ‘‘आज जब मैं इन सब बातों के बारे में सोचता हूँ तो मन के भीतर कांटे उगने लगते हैं, कैसा जीवन था?’’ ‘अछूत’ में दया पंवार स्वयं लिखते है ‘‘कैसे बताया जा सकेगा सीधे सीधे? वह सारा क्या एक दिन का है? पूरे चालीस साल की जिन्दगी का जीवंत इतिहास है ....विस्मरण की आदत के कारण ही जीवित रह सका ‘‘विमल थोरात इस बात को शिद्दत से कहती हैं कि प्रत्येक दलित लेखक जब अपने गुजरे हुए अतीत का फिर से अवलोकन करने लगता है तो जाति के कारण कितनी ही बार अपमान, अवहेलना और तिरस्कार को झेलने के प्रसंगों को याद करके मन व्यथित हो जाता है। स्वयं शरणकुमार लिम्बाले लिखते हैं, ‘‘कोढ का दाग जिस तरह छिपा कर रखते हैं, वैसे ही जीवन छिपा कर रखने की मेरी इच्छा होती है।’’



आत्मकथाओं में दलित उत्पीडन के अनेक दृश्य उभरते हैं स कट्टर परम्पथरावादी हिन्दूत समाज में अछूतों की स्थिति दयनीय थी।  चूँकि ये अछूत जाति में पैदा हुए हैं अतः इनको  गाँव की या शहर की मुख्यि बस्ती से काफी दूर बसाया जाता था। वे भी अभाव व अज्ञानवश विशाक्तश वातावरण में रहने को बाध्या रहे। ‘जूठन’ के लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि लिखते हैं कि “साहित्य में नर्क की सिर्फ कल्पना है। हमारे लिए बरसात के दिन किसी नारकीय जीवन से कम न थे। हमने इसे साक्षात् रूप में जीते-जी भोगा है।” 1 जातिप्रथा के अन्त र्गत योग्याता और षक्ति का प्रश्न  तो पृश्ठभूमि में ही रह गया और जन्मन तथा वंष के संस्काारों के आधार पर उच्चभता-हीनता का प्रष्ने मुख्य  हो गया। इस प्रथा से समाज में अनाचार तथा न्याय की परम्पचरा प्रारम्भ- हुई और अछूत, दलित, उपेक्षित जातियों का शोशण होने लगा।  उच्च जातियों ने इन्हें इस प्रकार से कुंठित कर दिया कि वे विरोध करने का साहस ही न कर सकें। 

सवर्णों की सदैव सेवा करने पर भी अछूतों को उच्चा जाति की धार्मिकता का शिकार होना पड़ता था। उसे सवर्ण की कोई वस्तुत छूने का अधिकार नहीं था। हिन्दू होकर भी हिन्दूी मन्दिरों में उसका प्रवेश वर्जित था। गाँव और बस्ती के बीच सम्बन्ध को दिखाते हुए शरणकुमार लिम्बाले लिखते हैं  ‘‘हम अछूत हैं इसे स्वीकार कर हम जी रहे थे, सवर्णों में से जो दो चार व्यक्ति हमारी अछूत बस्ती में आते वे या तो शराब पीने के लिए या बस्ती में जो दो एक परित्यक्ताएँ थीं उनके साथ मजा मारने अथवा मजदूर इकठ्ठा करने के लिए आते- गाँव और हमारी बस्ती का इतना ही सम्बन्ध था।‘‘2 लेखक बताता है कि ‘‘नारायण पटेल का कुआँ, पिछले वर्ष दलितों ने इसे बनवाया है ......यहाँ दलितों ने पसीना बहाया था स यहीं पर उन्होंने बारूद बिछाई थी स इस धरती को फोड़कर उन्होंने पानी निकला, पर आज यह कुआँ दलितों के लिए खुला नहीं है।”3 ‘‘अस्पृष्यता का यह आलम है कि‘‘हमारे स्पर्ष से पानी अपवित्र हो जाता है ,अन्न अपवित्र हो जाता है, घर अपवित्र हो जाता है, कपडे अपवित्र हो जाते हैं, पनघट अपवित्र हो जाता है .......ईश्वर, धर्म और मनुष्य भी अपवित्र हो जाता है।‘‘4 यदि सवर्णों के गाँव में कोई जानवर मर जाता है तो पूरी दलित बस्ती के लोगों को खंभे से बांधकर जानवरों की तरह पीटा  जाता है। 

छुआछूत के आधार पर अलग कर देने का नियम मूलतः धार्मिक है।  मोहनदास नैमिशराय के मन में धर्म और आस्था  को लेकर द्वंद्व है  “कैसी थी धर्म और आस्था ? श्रद्धा की भूल-भुलैया जिसमें हम लगातार जकड़ते गये थे। हमें यह भी पता नहीं था कि हम कहाँ जा रहे हैं? क्या कर रहे हैं? हमारा भी कभी इतिहास रहा होगा, इस तरह सोचने का अवसर ही नहीं मिलास”5 अछूत से विवाह सम्बन्ध का होना तो अकल्पचनीय सी बात थी। तत्कालीन समाज में अछूत, मन्दिर में प्रवेष करने की अभिलाषा लिए ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता था। पण्डित-पुरोहित मन्दिर की पवित्रता की रक्षा के लिए हिंसात्मकक संघर्ष की तैयारी तक कर लेते थे। इस रूढ़िवादी दल को सरकारी पुलिस शासन भी सहायता प्रदान करता था। 

दलित लेखकों के लिए अपने भोगे हुए जीवन की पुनरावृत्ति एक कष्टाकर कार्य है। बचपन की स्मृितियाँ प्रायः सुखद होती हैं लेकिन इनके लिए अभावग्रस्त् और तिरस्कृीत बचपन को याद करना कष्टदायक है। बालक ओमप्रकाश को अपने स्कूृल के वे दिन याद आते हैं जब ‘‘त्यांगियों के बच्चे‘ चूहडा का’ कहकर चिढाते थे। कभी-कभी बिना कारण पिटाई भी कर देते थे ... स्कूल में प्यास लगे तो हैडपंप के पास खडे होकर किसी के आने का इंतजार करना पड़ता था।”6

बड़े भाई के साथ अपनी बहन के गाँव जाते प्यास से बेहाल मोहनदास को गाँव में  पानी पिलाने से “ ...म्होरे घर चमारों के खातिर पानी न है” कहकर इनकार कर दिया जाता है। मोहनदास नैमिशराय के व्यक्तित्वा में आक्रोश और विद्रोह के बीज बचपन में ही पड़ गए थे जब अनेक बार उन्हें  सवर्णों की क्रूरता और उपेक्षा का शिकार होना पड़ा। बचपन में जब बनिए की चप्पल ठीक करते समय मोहन की अंगुली में टिंगल लग गया और वह दर्द से बिलबिला उठा तब भी ‘‘उसने मेरी अंगुली को छुआ तक न था। वह दूर खड़ा था। कहीं मेरा खून उसे छू न जाए। हम अछूत, हमारा खून अछूत। मैने देखा, उसकी आँखों में करुणा न थी। हिकारत थी, घृणा थी।’’7 हिन्दूा समाज की विडम्बँना इसी बात में है कि दुर्दषा एवं अपमान तथा प्रताड़ना में पड़ा हुआ यह वर्ग भी हिन्दू जाति ही कहलाता है।     

बहुत से दलित इस नारकीय जीवन से मुक्त होने के लिए धर्मान्तरण करते हैं , लेकिन हम देखते हैं कि धर्मांतरण करने के पश्चात् भी सवर्णों ने उन्हेंै उनके जन्मजात धर्म से जोड़कर ही देखा है। धर्मांतरण के उपरान्तन भी दलितों की स्थिति बहुत अच्छी  नहीं हो सकी है। इस सम्बन्धा में मोहनदास नैमिषराय लिखते हैं कि, “बस्ती में कुछ लोग हालाँकि बौद्ध बन गए थे, पर हिन्दूा-मुसलमान दोनों की निगाह में हम ढेढ़ चमार थे और हमारी औरतें चमारी।...हम भले ही बुद्धं शरणं गच्छाममि कहना सीख गए थे। पर उन्होंरने हमें बौद्ध कहना नहीं सीखा था। वे शोषक थे, हम शोषित।”8 एक और स्थान पर वे लिखते हैं कि, “पर हम बौद्ध कहाँ थे? केवल बुद्धम् शरणम् गच्छामि कहने से तो बौद्ध नहीं हो जाते। फिर हम कौन हैं? दंगे भड़कने पर मुसलमान हमें हिन्दूी समझकर मारते हैं और जब कर्फ्यू नहीं होता तो हिन्दू चमार समझकर अपमानित करते हैं। हमारी माँ-बहनों के जिस्मह को झिंझोड़ना अपना अधिकार समझते हैं।“



भूख की समस्या यहाँ सर्वोपरि है जिसकी शान्ति के लिए ही वह चिन्तानग्रस्त रहता है। ‘जूठन’ का लेखक गाँव में अपनी जाति के लोगों द्वारा तपती दोपहर में नंगे पाँव दिन भर फसल काटने के कष्टकप्रद कार्य तथा उसके बदले तगाओ द्वारा श्रम का उचित मूल्य न देने का वर्णन करता है। मजदूर इसका विरोध नहीं करते, क्योंककि ‘भूख के सामने विरोध दम तोड़ देता था।9 वाल्मीकि बताते हैं कि उनके घर में सभी कोई न कोई काम करते थे। फिर भी दो जून की रोटी ठीक से नहीं चल पाती थी। अपनी जाति की इसी दशा से पीड़ित होकर लेखक कहता है, “दिन रात मर-खपकर भी हमारे पसीने की कीमत मात्र जूठन, फिर भी किसी को कोई शिकायत नहीं। कोई शरमिंदगी नहीं, कोई पश्चात्ताप नहीं।”10

‘उठाईगीर’ में लेखक के परिवार को आषाढ़-सावन में तो रोटियाँ देखने को भी न मिलतीं। इन दिनों वे बाबा के बगीचे से शकरकंद की पत्तियाँ तोड़कर पकाते...कई दिन इसी प्रकार निकालते। इनके गाँव के लोग किसी की शादी व मौत के अवसर पर दिए जाने वाले भोज की जूठन से कई दिनों की उदर समस्या  से मुक्ति पाते हैं, “पैरों में आग होती। कांटा चुभता तो भयानक यातना होती। पर यह सब सहते। वहाँ कब पहुंचेंगे, कब भोजन पर टूट पड़ेंगे, इतना ही हमारे दिमाग में होता। उल्टियाँ होने तक खाते।”11  ‘तिरस्कार’ में  कैलाश ने जब जूनियर हाईस्कूिल में प्रवेश पाया तो पास ही के गाँव में लोगों का जीवन देखकर उसका मन चीत्कार उठा, “दलित गाँव से बाहर जीवन बिता रहे थे तथा रोटी और नमक पर जीवन भर आश्रित रहने वाले ये अछूत थे।”

समाज का उच्चो वर्ग जो अभिजात वर्ग है, वह शोशक है। वह निम्न वर्ग का शोषण करता है। दलित वर्ग के पुरुष ही नहीं स्त्रियाँ भी इन सवर्णों के शोषण का शिकार होती रही हैं। उन्हें इंसान की जगह ‘भोग’ की वस्तु समझा जाता रहा है। दलित स्त्री दोहरे अभिशाप से गुजरती है। अपने स्वयं के समाज के पुरुषों द्वारा भी इस पर अत्याचार होते रहे हैं। ‘अपने-अपने पिंजरे’ का लेखक मोहनदास  अत्यन्त मर्मस्पर्शी शब्दों  में बताते हैं कि, “हमारी बस्ती की औरतें जंगल जाती हैं। एक टोकरी गोबर पर बिक जाती हैं। उनके पाँव दबाती हैं। उनका बिस्तर बनती हैं।” इसी आत्मीकथा में एक और प्रसंग का उल्लेख मिलता है, “कोल्डै स्टोरेज से मिली मजदूरी से वे अपने बच्चों का पालन-पोशण करती थीं। गोबर के उपले बेचने से चंद पैसे मिलते थे। उनमें से अधिकांश के साथ शोषण द्वारा जिस्मं की भूख मिटाने की अक्सिर घटनाएँ रहती थीं।”12

समाज का निम्न कहा जाने वाला दलित समाज देह ढकने की जरूरत के लिए भी सवर्णों की दया-दृष्टि पर आश्रित रहा है। ‘अपने-अपने पिंजरे’ में दलित महिलाओं की वेशभूषा उनकी निर्धनावस्था को साकार रूप में प्रकट करती है। बस्ती की अधिकांश औरतें कुरते, जंफर या लहंगे, पेटीकोट पहनती हैं। उनके पांवों में चप्पल कम होती थी जबकि हर दूसरे घर में चप्पल जूतियाँ बनती थीं। आर्थिक स्थितियां किस प्रकार व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करती हैं यह हम इस आत्मकथा”तिरस्कृत’ के कई प्रसंगों में देखते हैं स यहाँ भंगी समाज के गरीब बच्चे हैं जिन्हें आर्थिक विपन्नता के चलते खेलने के लिए गुब्बारा तक नसीब नहीं होता है वे सूअर के यूरीन ब्लेडर को ही गुब्बारा बनाकर खेलते हैं “मुंह में डालकर उसे फुलाने में उसमे से बदबू तो आती थी लेकिन उस बदबू से घृणा नहीं होती थी लेकिन यहाँ दूसरी बात भी है। पैसा पास न होने के कारण अभावों में जीवन गुजारने के कारण भी बचपन में सूअर के यूरीन ब्लेडर से फुकना बनाकर खेलना हमारी नियति थी।“13 पैसे के अभाव में ये दलित अधिक की चाहना न करके मात्र काम चलाने की उम्मीकद रखते हैं। आत्मककथा ‘अपने-अपने पिंजरे’ में, “बस्तीू के कुछ मर्द-औरतें उनके घरों पर लिपाई पुताई करने भी जाते थे और कुछ को पंखा खींचने...बेगार करनी पड़ती थी...सुबह से षाम तक पंखा खींचने की मजदूरी मिलती थी एक अठन्नी।”14 लेखक मोहनदास का बा दिन-रात मेहनत करके भी एक रुपया महीने का किराया देने में असमर्थ है। ऐसे में नवाब अक्सिर गुस्सार करता था। ऐसे समय पर वह घर की चप्पलें को मरम्मत करने के लिए दे देता। वहीं से हाथ में चप्पल उठाकर ले आता था। पर नवाब चप्पल मरम्मत का पैसा न देता था। ‘ऐसा ही होता था। वह बेगार थी, वह हमारी जात के लोगों की मजबूरी थी। बेगार न करें तो जिंदगी मुसीबतों, मुश्किलों से घिर जाती थी।‘15

निर्धनता व बेकारी से पीड़ित निम्न वर्ग में जीवन मूल्य सारहीन प्रतीत होते हैं। जीवन की प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जब कोई साधन उपलब्ध नहीं होता तो असामाजिक तरीके से धनोपार्जन का मार्ग सूझता है। इस प्रकार सामाजिक मूल्य  विघटन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है और अपराध की भावना फैलती है। ‘उठाईगीर’ के लक्ष्मण का परिवार अर्थाभाव के ऐसे कष्टों से घिरा, चोरी करने से नहीं हिचकता क्यों कि ‘उठाईगीर’ कहकर उन्हें् कोई नौकरी नहीं देता। ‘खेतों में मजदूरी भी नहीं मिलती...परन्तु अब मजबूरी में ये दोनों उसी रास्ते पर निकल पड़े। दोनों अब दादा के साथ चोरी करने लगे हैं।‘16



जो वर्ग अपनी मूलभूत आवश्यकताएँ, यथा रोटी, कपड़ा और मकान जुटाने में ही असमर्थ रहा है उसके लिए शिक्षा प्राप्त करने के विषय में सोचना बहुत दूर की बात है, और कुछ दलित समाज के जागरूक लोग यदि अपने बच्चों को किसी प्रकार विद्यार्जन के लिए भेजते भी हैं तो उन्हें सवर्ण समाज के साथ-साथ परंपरागत मानसिकता रखने वाले अपने ही समाज से जूझना पड़ता है। ज्ञान की तलाश में स्कूल में जाते दलित अबोध बालक-बालिकाएँ बचपन से ही सहमे-सहमे रहते हुए अपमान और कुण्ठाओं से ग्रस्त होने के लिए मजबूर हैं। ‘जूठन’ में लेखक अपने छात्र-जीवन का विस्तार से वर्णन करता है। बेसिक प्राइमरी स्कूल बरला में त्यागियों के बच्चे ‘चूहड़ा का’ कहकर चिढ़ाते थे। कभी-कभी बिना कारण पिटाई भी कर देते थे.... हैडमास्टर कक्षा के समय में झाडू लगवाता है। कोई शिक्षक लात घूसों से मारता है, तो कोई भद्दी गालियाँ देता है। कोई सूअर की गोश्त की बोटियाँ खाने का हिसाब पूछता हैस आत्मकथा ‘अछूत’ में तालुके के बोर्डिंग स्कूल में दलित विद्यार्थियों के साथ दुर्भावनापूर्ण व्यवहार होता था। भोजन के वक्त उन्हें दरवाजे के पास बैठाया जाता था। इसी प्रकार के भेदभाव से पीड़ित होकर ओमप्रकाश वाल्मीकि ने लिखा है ‘‘दरवाजे के बाहर खड़े रहने की इस पीड़ा को तथाकथित देवताओं के वंशज नहीं समझ सकते।’’17 जब बालक ओमप्रकाश द्रोणाचार्य की गरीबी पर आँसू बहाते द्विज सम्प्रदाय से प्रश्न  करता है कि हमें भी तो ताउम्र दूध की जगह चावल का माँड ही मिलता है, तब भी हमारी दरिद्रता की वेदना का तो किसी ने कहीं उल्लेख तक नहीं किया गया तो मास्टर जी की छडी उस बालक की पीठ पर एक नया ही महाकाव्य  रच देती है। इन दलित विद्यार्थियों को स्कूल स्तर पर ही नहीं वरन् उच्च शिक्षा तथा नौकरी के अवसरों पर भी सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और मानसिक दबाव झेलने पड़ते हैं। आत्मकथा ‘मेरा सफर मेरी मंजिल’ में डॉ. डी. आर. जाटव द्वारा अम्बेडकर पर लिए शोध विषय का दर्शनशास्त्र रिसर्च कमेटी द्वारा विरोध किया जाता है। ‘अंत-स्फोर’ की कुसुम पावडे को संस्कृत जैसे विशय में एम.ए. करने के बाद काफी प्रयासों के बाद भी लेक्चरर की नौकरी नहीं मिल पाती। नौकरी के लिए साक्षात्कार देते समय उसे कई प्रकार से अपमानित किया जाता है। कुसुम का अनुभव दलित वर्ग के प्रत्येक उच्च-शिक्षा विभूषित स्त्री-पुरुष के जीवनानुभव का हिस्सा है। मौहनदास नैमिषराय में नए कॉलेज, नए परिवेश, नए सहपाठियों के बीच जाकर भी हीनभावना का अहसास बना रहता है। वे कहते हैं ‘‘सब कुछ नया होने के बाद भी हम बाहर भीतर से पुराने ही थे। हमारा वजूद पुराना था। हमारी अस्मिता लहूलुहान थी। हमारे कपड़े पुराने होते, किताबें पुरानी होतीं तथा कापियाँ तक पुरानी होतीं। इसलिए नये वातावरण में हम जल्दी से मिल नहीं पाते। बामन-बनियों के लड़के खूब अच्छे-अच्छे कपड़े पहनकर आते। उनके पाँवों में चमकदार जूते होते। वे बात-बात में कहतेदृदेखो अभी मोची से पालिश कराई है। मुँह देखना है अपना। ऐसे समय पर हम चुप रहते। हमारा वजूद हिलने लगता पर हम अपने-आपको नियंत्रित करते। हमारे तो पैरों में लीतरे होते। फिर भला हम कैसे उनसे कहते कि हमारे भी पैरों में चमकदार बूट हैं। चमार होते हुए भी हमारे पैरों में ढंग की चप्पल या जूते नहीं होते उसका कारण था गरीबी।’’

ऐसी समाज व्यवस्था में भी जटिल परिस्थितियों में इस वर्ग के बहुत से लोग षिक्षा और संघर्श के बल पर आगे बढ़ पाने में सफल हुए हैं। किसी के द्वारा प्रेरित किये जाने पर लक्ष्मण माने के पिता अपने पुत्र को स्कूल भेजने का निर्णय लेते है। उदर पूर्ति के लिए गाँव गाँव भटकने के कारण लक्ष्मण की पढाई नियमित नहीं रह पाती। कैकाडी जाति से सम्बन्ध रखने के कारण स्कूल में मास्टर उसे कक्षा के बाहर बरामदे में बिठाते हैं। लक्ष्मण के पिता आर्थिक तंगी के चलते स्कूल की फीस देने में असमर्थ हैं। इसलिए उसके बदले डलिया, टोकरी और सूपा मास्टर जी को देते हैं। स्कूल में पढ़ते हुए ही लेखक एक होटल में काम भी करने लगता है ताकि अपनी पढाई को आर्थिक कारण से  बंद न करना पड़े। अभी तक जो लक्ष्मण पढाई से भागता रहा वह  पढाई के महत्व को जान लेता है और  किसी भी प्रकार उसे जारी रखना चाहता है। उसके चेतना के द्वार खुलते जाते हैं। यही कारण है कि सामाजिक बदलाव के लिए चलने वाले आन्दोलनों में वह अपनी सक्रीय भूमिका अदा करता है। आत्मकथा ‘अछूत’ में प्रतिकूल वातावरण में लेखक दया पंवार ने शिक्षा प्राप्त की लेकिन  घर की हीन आर्थिक दशा के कारण मैट्रिक से पहले ही अपनी पढाई छोड़नी पड़ी। वह दिन भर परचूनी की दूकान में  बैठता और रात में मिट्टी तेल के लैंप में अध्ययन करता। इसी तरह स्वद्याय के द्वारा दयाराम नें दसवीं की परीक्षा दूसरे दर्जे में उत्तीर्ण की। यूँही कमाई के साथ साथ पढाई  का सिलसिला जारी रहा और ग्रेजुएट हुए स उच्च शिक्षा के दौरान भी उन्हें जातिगत कटु अनुभवों से गुजारना पड़ा। गांधीजी ने अध्यात्म  और मानवतावादी मूल्यों  की स्थापना द्वारा दलितों को ‘हरिजन’ की संज्ञा उपलब्ध की थी। वहीं दूसरी ओर डॉ. अम्बेडकर ने दलित समस्या के समाधान के लिए भारतीय सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक व राजनैतिक मूल्यों में क्रांतिकारी परिवर्तन करके समता को विकसित किया। उन्होंिने व्यक्ति के सम्पूार्ण कल्याण साधन के संसदीय जनतंत्रात्मनक जीवन मार्ग का निर्माण किया। स्वततन्त्ररता प्राप्ति के उपरान्त  देश के प्रबुद्ध वर्ग का ध्यान समाज में पीड़ित वर्गों की ओर गया और स्वयं पीड़ित वर्ग में भी नवीन चेतना पैदा हुई, हरिजनों और आदिवासियों के पिछड़े हुए लोगों, श्रमिकों तथा कृषकों का उत्थान, इस सम्बन्ध में सभी प्रकार के सरकारी व गैर-सरकारी प्रयास प्रारम्भ हुए। अस्पृष्यता को लेकर समाज में जो अन्याय और उत्पीड़न प्रचलित था, उसे सन् 1955 के अस्पृष्यता अपराध अधिनियम द्वारा रोक दिया गया। अनुसूचित जातियों के विद्यार्थियों को शिक्षा के अनेक अवसर प्रदान किए गए। 

स्वरतन्त्रता के उपरान्तर यद्यपि जाति-धर्म के पालन में चाहे शिथिलता आई हो, किन्तु  जातिवाद का सभी क्षेत्रों में प्रवेश रहा। वास्तिविकता तो यह है कि जाति प्रथा समाज से नष्ट नहीं हो सकी। यद्यपि इस लम्बी स्वतंत्रता अवधि में अनेकानेक संवैधानिक और कानूनी कार्यवाहियों द्वारा भारत सरकार ने अनुसूचित जातियों और जनजातियों की उन्नति के विभिन्न उपाय किये हैं। शिक्षा, आवास, नौकरी, व्यवसाय आदि पिछड़े व कमजोर वर्ग के बालिकाओं के हितों को दृष्टिगत रखते हुए कई सुनियोजित योजनाएँ बनाई गई हैं लेकिन अभी भी अषिक्षा और गरीबी के कारण वे अपने अधिकारों को पाने में अक्षम हैं। भ्रष्टाचार के चलते इन सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ उन्हें नहीं मिल पाता है। 

शिक्षित दलित युवा वर्ग अपने अस्तित्वप और अधिकारों के प्रति सचेत हुआ है और वर्तमान व्यिवस्था  के प्रति उसमें असन्तोष की भावना है। वह समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन चाहता है। वर्तमान समाज-व्यवस्थान के प्रति उसके मन में आक्रोश है क्योंकि शिक्षा प्राप्त करके अपनी स्थिति सुधार लेने वाले दलितों के साथ सवर्णों की मानसिकता में अधिक परिवर्तन नहीं आया है। आजादी के बाद दलितों की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए ओमप्रकाश वाल्मीकि लिखते हैं कि, “देश को आजादी मिले आठ साल हो गए थे। गांधीजी के अछूतोद्धार की प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती थी। सरकारी स्कूलों के द्वार अछूतों के लिए खुलने शुरू तो हो गए थे, लेकिन जनसामान्य की मानसिकता में कोई विशेष बदलाव नहीं आया था।” 18 मोहनदास नैमिषराय नहीं समझ पाते कि दलितों के साथ अभी आजाद भारत में क्यों ऐसा व्यवहार होता है, बाबा साहब ने कहा था, शिक्षित बनो, संगठित बनो और संघर्ष करो। पर कौन संघर्ष करे और कैसे, दो रोटी खाने को नहीं, शरीर पर कपड़ा नहीं, रहने को सिर के ऊपर छत तक नहीं। घुमन्तूक जातियाँ फिर भी ठीक, कहीं भी जाकर डेरा डाल लिया और काम शुरू। वे शहर के भीतर भी जाते और बाहर भी। पर दलितों की स्थिति तो बहुत विकट थी। उन्हें  शहर क्या  गाँवों के भी हाशिए पर रखा जाता था। वे पढ़-लिख रहे थे, पर उन्हेंा नौकरी नहीं, नौकरी भी मिल गई तो रहने को किराये का मकान कौन देता है। इस तरह के सवाल किसी एक को ही नहीं झिंझोड़ते थे बल्कि समूचे दलित समाज को मथते थे।”19 शहर के दलितों में चेतना के उत्कर्ष को शरणकुमार लिम्बाल महसूस करते हैं  ‘‘दलितों को मिलने वाली सुविधाएँ, शिक्षा के कारण उनमें उभरती अस्मिता और स्वाभिमान, नई अस्मिता से जीने वाला समाज, आन्दोलन के कारण उभरनेवाला विद्रोही युवक, नौकरियों के कारण सुखी जीवन जीने वाला अछूत तथा धर्मान्तरण के कारण थोपे गए कार्यों के प्रति उसकी अरुचि ‘‘20 के कारण स्वर्ण हिन्दू चिढ गए हैं क्योंकि वर्षों तक जिस दलित को उन्होंने अपना गुलाम बनाकर रखा, अपने स्वार्थ के कारण जिसका भरपूर उपयोग किया उस दलित को वह ऊँचा उठते हुए नहीं देखना चाहता।



गाँव से पढ़-लिखकर और अच्छे ओहदों पर दलितों के प्रति सवर्णों का रवैया ना तो गाँव में और ना ही शहरों में ही बदला है। नौकरी के दौरान भी उन्हें जाति के कारण कई बार अपमानित होना पड़ा है। एक ऐसे ही प्रसंग का उल्लेख करते हुए कैलाशनाथ लिखते हैं “नीचे एक चाय की दूकान थी, एक साठ साल का बुड्ढा, मैली कुचैली धोत्ती और बनियान व कमर पर लटकता जनेऊ। मैंने सोचा चाय पी लूँ तब तक ऑफिस खुल जायेगा। उसकी टूटी बैंच पर बैठ गया। उसने मेरी जाति पूछी। मैंने कह दिया अछूत हूँ। मेरी जाति सुनते ही वो आग बबूला हो गया और बैंच से उठ जाने के लिए कहा। मैंने बैग उठाया और बाहर आया। उसने बैंच पर पानी छिड़का और बडबडाया। फिर शेश बचे मग्घे के पानी को उड़ेल दिया और अपशब्द भी कहे। ‘‘21 गाँव में अध्यपाक बनकर गए  मोहनदास को गांववालों के व्यवहार का कारण समझ आ रहा था, “गाँव के लोग मुझे इज्जंत दे रहे थे। मैं भ्रमित हो रहा था। वे सम्मा न दे रहे थे केवल एक अध्या्पक को, मुझे नहीं। मेरी पहचान भी अगर उन्हें पता लग गई तो आगे की बात सोच कर मुझे अजीब-सा अवश्य लगता था।”22 ओमप्रकाश वाल्मीकि को जाति के प्रश्न ने किस कदर तकलीफ दी है, वे इसे बयान करते हैं। “गर्मजोशी से मिले नए कमांडेट साहब  यह सुनकर खुश हुए थे कि मैं बरला का रहने वाला हूँ...किन्तु मैंने जैसे ही अपनी जाति ‘चूहड़ा’ बताई वे असहज हो गए थे। बातचीत का सिलसिला वहीं थम गया था। जैसे बात करने लायक कुछ बचा ही नहीं था।”23 ओमप्रकाश वाल्मीकि बताते हैं कि “दफ्तर में भी कई अधिकारी, सहकर्मी तथा अधीनस्थ  कर्मचारी इस सरनेम के कारण मेरा मूल्यांकन कम करके आंकते हैं। ...क्योंकि यह एक सामाजिक रोग है जो मुझे झेलना पड़ रहा है। ‘जाति’ ही जहाँ मान-सम्मान और योग्यता का आधार हो, सामाजिक श्रेश्ठंता के लिए महत्त्वनपूर्ण कारक हो, वहाँ यह लड़ाई एक दिन में नहीं लड़ी जा सकती है। लगातार विरोध और संघर्ष की चेतना चाहिए जो मात्र बाह्य ही नहीं आंतरिक परिवर्तनगामी भी हो, जो सामाजिक बदलाव को दिशा दे।”24 इसी प्रकार डिग्री कॉलेज में लेक्चरर के रूप में गये प्रो लाल को उनके सहयोगी शिक्षकों ने एक ही घड़े से पानी पीने से मना कर दिया था। प्रो श्यामलाल जेदिया को कदम कदम पर अपने विरोधियों की साजिशों का सामना करना पड़ता है। इस बात को स्पष्ट करते हुए वे आत्मकथा में बताते हैं “मेरे विरोधी तथाकथित प्रगतिशील ग्रुप थे और उनके पास शक्ति, धन, दिमाग था और उनकी जातियों के नेताओं का उनकी पीठ पर हाथ था। मेरे पास सच्चाई थी जो विजित हथियार थी और कुछ समर्पित दोस्त भी ...”। 25 लेकिन इस संघर्ष में वे परिवार से दूर होते गए और “बाहर का व्यक्ति “ हो गए। वे लिखते हैं कि “एक उप-कुलपति अपनी योग्यता व ब्रेन वाकर के आभाव में असफल नहीं होता बल्कि अपनी निष्ठा व भेदभावरहित व्यवहार के आभाव में असफल होता है।”26

डॉ. जाटव ने अस्थाई व्याख्याता के रूप में गंगानगर और बांसवाडा जिलों में नौकरी की। इस दौरान वे सामाजिक कार्यों में भी सलंग्न रहे। गंगानगर में रहते हुए उन्होंने दलित युवकों का एक संगठन “डॉ. आंबेडकर नवयुवक संघ “ बनाया। डॉ. जाटव के संघर्ष और विकास में देश की लोकतान्त्रिक  व्यवस्था का बहुत बड़ा हाथ रहा है। लोकतान्त्रिक व्यवस्था के कारण ही आज दलितों ने समाज में अपनी एक जगह बनाई है। ‘झोपड़ से राजभवन’ की यात्रा करने वाले माता प्रसाद नें कांग्रेस में कई पदों पर रहते हुए पहला विधानसभा चुनाव शाहगंज से सन 1957 में लड़ा। वे पांच बार विधायक और दो बार विधान परिषद् के सदस्य रहे। उत्तरप्रदेश के राजस्व मंत्री रहे और 1993 से 1999 तक अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल रहे। आत्मकथा लिखने के अपने उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए माता प्रसाद लिखते हैं “मेरे जैसा निर्धन और दलित परिवार में पैदा हुए व्यक्ति जिसकी परिस्थितियां अनुकूल नहीं थीं, उसने भी कठिनाईयों को दूर करते हुए आगे कदम बढाया है। इस पर मेरे मन में यह विचार आया है कि क्यों न अपने बारे में लिखूं ? इससे समाज के दलित असहाय, गरीब लोगों को प्रेरणा मिलेगी और उनमें उत्साह पैदा होगा।

षहर में नौकरी मिल जाने के बाद आत्मकथा ‘तिरस्कार’ केलेखक को एक सवर्ण किन्तु जातिभेद से मुक्त एक स्त्री रानी देवी का साथ मिलता है  जिनसे संघर्ष और क्रांति की प्रेरणा लेकर कैलाश के जीवन में परिवर्तन आता है। इसके पश्चात् दिन-प्रतिदिन दलितों के उद्धार के लिए आन्दोलन, अनशन इत्यादि उनकी दिनचर्या का अंग बन गया। 

शिक्षा से दलित स्त्रियों में भी जागरूकता आई है। कौशल्याा ने शादी के तैंतीस वर्ष पति से मिली उपेक्षा, अत्याआचार, अवहेलना और उत्पीेडन को सहा। लेकिन सहने की शक्ति ने जब जवाब दे दिया तो तैंतीस वर्षों के बंधन को एक झटके से तोड़कर विद्रोही स्त्री ने अन्याय सहने से इंकार कर दिया। सीधे कोर्ट से मैंटेनेन्स की माँग की और लगभग दस वर्ष तक इस अधिकार के लिए लड़ती रही। बेबी हालदार यद्यपि एक अल्पशिक्षित गरीब साधारण परिवार से है लेकिन विवाह के पश्चायत् वह भी अपने पति से सहयोग और  समत्व चाहती है, लेकिन पति उसे दासी बनाकर रखता है। बेबी लिखती है कि, “मैं असहाय, एक व्यिक्ति की बंदिनी जो थी। वह जो कहे वहीं मुझे सुनना होगा, जो कहे वही करना होगा, लेकिन क्यों? जीवन तो मेरा है न कि उसका? क्या मुझे उसके कहे अनुसार सिर्फ इसलिए चलना होगा कि मैं उसके पास हूँ? कि वह मुझे दो मुट्ठी भात देता है।” 27 पति से सम्बन्धन तोड़कर वह स्वयं अपने बच्चों की परवरिश का जिम्मा लेती है। बेबी कांबले को ईश्वर  से शिकायत है कि  उसने औरतों के साथ घोर अन्याय किया है कि उन्हें पुरुषों पर इस कदर आश्रित किया कि  वे जन्म भर उससे मुक्त नहीं हो पातीं  किन्तु वे उस दिव्य ज्योति के प्रति श्रद्धारत हैं जिसने अन्याय और अपमान की जिस बेडी  में पुरुष ने स्त्री को जकड़ा हुआ था, उस बेड़ी  के टुकड़े टुकड़े कर अबला को मुक्त किया -‘हिन्दू कोड बिल ‘ने स्त्री अपने सीमित व संकीर्ण परिवेश से बाहर निकली है। समाज के पुननिर्माण में उसकी आस्थान है तथा वह आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी तथा आत्मानिर्भर रहकर समानाधिकार प्राप्त करने की चेष्टा  कर रही है। कौशल्या बैसंत्री अपने जीवन  अनुभवों से काफी अग्रगामी बनीं। वे कहती हैं कि, “मैंने तो जाति बहुत पहले ही छोड़ दी थी।”  

इस प्रकार हम देखते हैं कि सदियों से उत्पीड़ित समाज के उपेक्षित ये दलित वर्ग के लेखक प्रतिकूल परिस्थितियों में संघर्ष करते हुए आगे बढे हैं और  संवैधानिक अधिकारों  के कारण इनके संघर्ष को दिशा और लक्ष्य प्राप्त हुआ है। 

सन्दर्भ सूची 

1. जूठन: ओमप्रकाष वाल्मीकि, पृ .35 ,राधाकृष्ण प्रकाशन,नई दिल्ली,1997 

2. अक्करमाशी: शरणकुमार लिम्बाले ,पृ.115, ग्रंथ अकादमी, नई दिल्ली 1991  

3. वही,पृ.114 

4. वही,पृ.115 

5. अपने-अपने पिंजरे, भाग-1ः मोहनदास नैमिशराय ,पृ. 85 वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 1995  

6. जूठन: ओमप्रकाश वाल्मीकि ,पृ .13 

7. अपने-अपने पिंजरे, भाग-1 : मोहनदास नैमिशराय ,पृ.78 

8. अपने-अपने पिंजरे, भाग-1 : मोहनदास नैमिशराय ,पृ.36

9. जूठन: ओमप्रकाश वाल्मीकि, पृ .18 

10. वही, पृ. 12  

11. उठाईगीर: लक्ष्मण गायकवाड, पृ. 39, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली,1992 

12. अपने-अपने पिंजरे, भाग-1 : मोहनदास नैमिशराय, पृ. 83 

13. तिरस्कृत: सूरजपाल चैहान, पृ. 26, अनुभव प्रकाशन, उत्तर प्रदेश, 2002 

14. अपने-अपने पिंजरे, भाग-1 : मोहनदास नैमिशराय, पृ.17 

15. वही, पृ. 40

16. उठाईगीर: लक्ष्मण गायकवाड, पृ.15 

17. जूठन: ओमप्रकाश वाल्मीकि, पृ .26 

18. वही, पृ. 12 

19. अपने-अपने पिंजरे, भाग-2: मोहनदास नैमिशराय, पृ.133, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली , 2002

20. अक्करमाशी: शरणकुमार लिम्बाले, पृ.144 

21. तिरस्कार: कैलाशनाथ, पृ. 29-30 बौद्ध उपासक संघ साहित्य प्रकाशन, कानपुर 

22. अपने-अपने पिंजरे, भाग-2  : मोहनदास नैमिशराय, पृ.135 

23. जूठन: ओमप्रकाश वाल्मीकि, पृ .139 

24. वही, पृ.158 

25. एक भंगी उपकुलपति की आत्मकथा: प्रो लाल, पृ.144, यूनिवर्सिटी बुक हाउस, जयपुर, 2000 

26. वही, पृ.136 

27. आलो-अंधारी: बेबी हालधर, पृ. 59, रोशनाई प्रकाशन, प.बंगाल, 2002 

डॉ. उमा मीना 

सहायक प्राध्यापक, मिरांडा हाउस

 दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली  

 

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