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शिक्षा नीति क्या होती ? राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020 क्यों बनी हैं? 20 प्वाइंट में समझें।

1. शिक्षा नीति की भूमिका में लिखा है कि प्री-प्राइमरी एजुकेशन में छात्रों को भारतीय समाज, संस्कृति, माहौल की जानकारी दी जाएगी. इसमें आर्यभट्ट से लेकर चाणक्य तक का जिक्र है लेकिन उसी दौरान वैकल्पिक ज्ञान मीमांसा तैयार करने वाले और जातिगत भेदभावों पर सवाल करने वाले गौतम बुद्ध और महावीर जैन की सवाल करने वाली शैक्षणिक पद्धति का जिक्र नहीं है. चार्वाक के भौतिकवादी दर्शन का भी इसमें कोई उल्लेख नहीं है. उनका भारतीय संस्कृति से मतलब ब्राह्मण संस्कृति से है.




2. राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्री-प्राइमरी एजुकेशन के लिए लार्ज स्केल पर मिशन चलाने की बात कही गई है. और कहा है कि इसके लिए काफी लोगों की जरूरत होगी. हालांकि इसमें नियमित शिक्षकों को रखने की बजाए कहा है कि स्वयंसेवक, काउंसलर या सामाजिक कार्यकर्ता चाहिए होंगे. इसमें यह भी कहा गया है कि ब्लॉक हेडक्वार्टर में स्कूलों की मदद स्वयंसेवी संस्थाएं करेंगी. यह साफ नहीं है कि ये स्वयंसेवी कौन होंगे और ये स्वयंसेवी संस्थाएं कौन सी होंगी?


3. शिक्षा नीति में कहा गया है कि उच्च शिक्षा का ज्ञान संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज 22 भाषाओं में दिया जाएगा. लेकिन साथ ही यह भी कहा गया है कि उच्च शिक्षा की प्रवेश परीक्षाएं केवल अंग्रेजी भाषा में ली जाएंगी.


4. 1 मई 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिक्षा नीति की समीक्षा के बाद कहा था कि नई शिक्षा नीति का केंद्र बिंदु ऑनलाइन शिक्षा होगी. इंटरनेशनल मार्केट की अभी आई रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले चार सालों में ऑनलाइन एजुकेशन का बिजनेस 15 बिलियन डॉलर का होगा. प्राइवेट प्लेयर्स की नजर इस पर है.




5. अप्रैल 2000 में शिक्षा में सुधार करने के नाम पर एक समिति बनी और उसके संयोजक बनें-दुनिया के सबसे बड़े पूंजीपतियों में एक-मुकेश अंबानी। इस समिति के दूसरे सदस्य थे -दूसरे उद्योगपति  कुमारमंगलम बिड़ला। इस समिति ने सरकार को अपनी रिपोर्ट दी और कहा कि शिक्षा में दी जा रही सबसीडी में सरकार को कटौती करनी चाहिए और इसकी भरपाई फीस बढ़ाकर करनी चाहिए। यह भी कहा गया कि एक ऐसा प्रायवेट विश्वविद्यालय भी होना चाहिए जो बाजार की जरूरतों के अनुसार पाठ्यक्रम तैयार कर सकें।यह भी कहा कि शिक्षण संस्थानों में किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधि पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। 


6. पीएम मोदी ने अपने संबोधन में यह भी कहा था कि हम क्वालिटी और वर्ल्ड क्लास एजुकेशन देंगे. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में वर्ल्ड क्लास एजुकेशन के साथ कई जगहों पर देश के विश्वविद्यालयों को टॉप-100 विश्वविद्यालयों में लाने की बात कही गई है. हर साल आने वाली इस लिस्ट को तैयार करने वालों में अकादमिक लोग या शिक्षाविद नहीं होते. यह काम बड़ी-बड़ी मार्केटिंग एजेंसियां करती हैं, जिनके शेयर न्यूयॉर्क और लंदन स्टॉक एक्सचेंज में खरीदे-बेचे जाते हैं.


7. टॉप-100 विश्विद्यालयों की लिस्ट बनाने के लिए सवाल पूछे जाते हैं- आपके यहां कितने विदेशी छात्र और कितने विदेशी प्रोफेसर हैं? कितने छात्रों ने बैंक या मार्केट से लोन लिया हुआ है? शिक्षकों को कितना वेतन मिलता है? कितने छात्रों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नौकरी मिलती है और कितनी सैलरी पर मिलती है? इनमें से एक भी सवाल हमारे संविधान के मानदंडों से नहीं निकलता है.


8. शाहीन बाग के संविधान बचाओं आंदोलन से देश भर में संविधान की प्रस्तावना को फिर से चर्चाओं के केंद्र में ले आया. यहां युवाओं ने कई बार संविधान की प्रस्तावना पढ़ी. यही वजह है कि जहां दिसंबर 2019 तक शिक्षा नीति के पांचवें मसौदे में भारतीय संविधान की प्रस्तावना को शामिल नहीं किया गया था. लेकिन शाहीन बाग जैसे देश व्यापी आंदोलन के बाद जुलाई 2020 में इसके छठे मसौदे में संविधान की प्रस्तावना को भी शामिल कर लिया गया.


9. 24 जून 2020 को मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने वर्ल्ड बैंक के साथ एक करार किया. वर्ल्ड बैंक को इस करार के लिए तीसरी बार भारत बुलाया गया था. इसमें Strengthening Teacher-Learning and Results for States (STARS) कार्यक्रम को अपनाने के लिए हस्ताक्षर हुए. इसमें ये है कि प्री-प्राइमरी से लेकर 12वीं तक की शिक्षा वर्ल्ड बैंक की शर्तों के अनुसार चलेगी.


10इससे पहले भी वर्ल्ड बैंक ने दो बार भारत में ऐसे समझौते किए हैं, जब उन्होंने प्राइमरी शिक्षा के बजट के 100 रुपये में से महज 1.38 रुपये का लोन देकर भारत में शिक्षा के पाठ्यक्रम से लेकर शिक्षकों की भर्ती तक सभी शर्तें अपने हिसाब से बदल दी थीं. दूसरी बार सर्व शिक्षा अभियान के दौरान यह करार हुआ था.




11. हमारे देश में केरल का ही उदाहरण है जहां की साक्षरता की दर करीब 100 फीसदी है. यहां की शिक्षा प्रणाली के मजबूत मॉडल का उदाहरण दुनिया भर में दिया जाता है. लेकिन इससे सीखने और इस मॉडल को अन्य राज्यों में लागू करने की बजाए हमने वर्ल्ड बैंक की शर्तों के आधार पर पाठ्यक्रम लागू करने का रास्ता चुना है.


12शिक्षा नीति के आने के समय ही UGC के जरिए केंद्र सरकार का संविधान की मूल भावना के खिलाफ रवैया भी देखने को मिला. देश के आठ राज्यों ने कोरोना को देखते हुए अपने विश्वविद्यालयों में फाइनल सेमेस्टर की परीक्षा न करवाने की घोषणा की तो 7 जुलाई को UGC ने ऑनलाइन परीक्षाएं कराने का आदेश दे दिया. यह केंद्र सरकार की संघीय ढांचे को बिगाड़ने की कोशिश है.


13. संघीय ढांचे के लिए संविधान की प्रस्तावना के तुरंत बाद पहले ही अनुच्छेद 1(1) में ही साफ कहा गया है कि भारत राज्यों का संघ होगा. यानी भारत अपने आप में कुछ नहीं है. यह संघों यानी राज्यों से मिलकर बना है. 25 नवंबर 1949 को डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भी संविधान सभा में यही कहा था कि हम सबने कानून के विषयों की तीन अलग-अलग सूचियां बनाकर व्यवस्था कर दी है कि राज्यसत्ता का केंद्रीकरण नहीं हो पाएगा. इसके अलावा, देश की सबसे ज्यादा चर्चित कानूनी लड़ाइयों में शामिल 1973 में केशवानंद भारती केस में 13 जजों की सबसे बड़ी संवैधानिक बेंच ने भी यही टिप्पणी की थी कि भारत की संघीय रचना ही संविधान का मूल चरित्र है.


14. 1975 से पहले शिक्षा प्रदेशों के अधीन थी। लेकिन शिक्षा को केन्द्र सरकार ने अपने कामकाज की सूची में भी डाल लिया जिसे समवर्ती सूची कहते हैं।


15. शिक्षा नीति का मसौदा तैयार करने वाली कस्तूरी रंगन समिति ने 2019 में नई शिक्षा नीति के चौथे ड्राफ्ट में तीन जगह लिखा था कि छह साल से कम उम्र और 14 साल से ज्यादा उम्र यानी कक्षा एक से पहले और कक्षा आठ से बाद के छात्रों को भी शिक्षा के अधिकार के दायरे में शामिल किया जाएगा. लेकिन इसका छठा ड्राफ्ट बनते-बनते इस लाइन को हटा दिया गया.


16नई शिक्षा में वोकेशनल कोर्स के नाम पर 11 साल के बच्चों से भी इंटर्नशिप कराने की बात कही गई है. पिछड़े परिवेश से आने वाले छात्रों को यह कहकर ऐसे केंद्रों में भेजा जाता है कि उन्हें फेल करने की बजाए ऐसी ट्रेनिंग दे दी जाए ताकि वे किसी रोजगार में दक्ष हो सकें. भारतीय समाज में इस स्तर के रोजगार अब भी जातिगत पेशों से जुड़े हैं. जिन बच्चों के परिजन शिक्षित नहीं रहे हैं, उनके ही बच्चे ऐसे केंद्रों में जाकर कम आय वाले और जातिगत पेशों में ही फंसे रह जाते हैं.


17. केंद्र सरकार ने 2016 में ही यह प्रावधान कर दिया गया था कि अगर 14 साल से कम उम्र के बच्चे जातिगत पेशों का काम करते हैं तो इसे बालश्रम के तहत अपराध नहीं माना जाएगा. इन सभी घटनाक्रमों से यह आशंका बढ़ गई है कि इससे आने वाली पीढ़ियां भी जातिगत पेशों और गरीबी के मकड़जाल में कैद रहेंगी. नई शिक्षा नीति न केवल पेशों के माध्यम से जातिगत ढांचों को और मजबूत करेगी बल्कि देश की करीब 85 फीसदी पिछड़ी आबादी को स्कूलों और उच्च शिक्षा से दूर ही रखेगी.


18शिक्षा नीति का इस्तेमाल हथियार की तरह भी किया जाता है. जब समाज के निचले तबके से आने वाले लोगों का कद बढ़ जाता है तो समाज में बेचैनी होती है. इसे रोकने के लिए ही शिक्षा नीति लाई जाती है. पहली शिक्षा नीति 1968 में तब आई थी जब 1967 में 9 राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकार बनने का सिलसिला शुरू हुआ. उन सरकारों में बीपी मंडल और कर्पूरी ठाकुर जैसे निचले तबके के नेताओं का कद काफी बढ़ गया था. दूसरी बार शिक्षा नीति 1986 में आई, जब पंजाब में सिखों के खिलाफ हिंदुत्व का आक्रमक उभार हुआ था. तीसरी बार 2020 में शिक्षा नीति आई है, जब संविधान की मूल भावना के खिलाफ कानून बनाए जा रहे हैं और समाज का बड़ा हिस्सा उनके खिलाफ खड़ा हुआ है.इसे हिन्दुत्व के सैन्यकरण के काल के रूप में देखा जाता हैं।




19. समाज का दबा कुचला हिस्सा जब पढ़ने लिखने लगता है तो उस विचारधारा की आक्रमकता बढ़ जाती है जिसका सदियों से वर्चस्व कायम हैं। इसे समझने के लिए इस उदाहरण को देखा जा सकता है। 1857 की क्रांति से पहले 20 सितंबर 1856 को एक प्रमुख समाचार पत्र संवाद भास्कर पत्र ने लिखा। अंग्रेजी शिक्षा की वजह  से नई तरह की यह सामाजिक समस्या बन रही है कि नीची की जातियों में अंग्रेजी सिखने की ललक बढ़ रही है और बढ़ई,नाई, धोबी,भंगी जाति के परिवारों के लड़के अंग्रेजी सिखकर क्लर्क, बिल सरकार , एजेंट आदि पदों पर नौकरियां पा रहे है। वे अपना पारिवारिक काम छोड़ रहे है और इससे एक नई सामाजिक समस्या पैदा हो रही है।


20. एक देश के पूंजीपतियों का सत्ता पर वर्चस्व होता है तो उसे पूंजीवादी सरकार कहते हैं। जब कई देशों के पूंजीपतियों के बीच सांठगांठ हो जाती है तो उसे पूंजीवादी साम्राज्यवाद कहते हैं।

पूंजीवादी (आर्थिक आधार) + जातिवाद-साम्प्रदायिकता (सामाजिक आधार) के गठजोड़ की शिक्षा नीति कैसा समाज बनाएगी? शिक्षा नीति पीढ़ियां तैयार करती है। गुलामों की या फिर स्वतंत्र और समानता की चेतना के नागरिकों की पीढ़ी तैयार होगी, इस पर आपको विचार करना हैं।

 -डॉक्टर अनिल सद्गोपाल/पत्रकार अनिल चमड़िया

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