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शोषण का पोषण कौन करता है? Who nurtures exploitation?


शोषण की एक अभिजात्य संस्कृति है, एक धार्मिक संस्कार है, एक सदियों पुरानी सभ्यता है। कमोबेश हर कोई इसका शिकार और शिकारी दोनों है। जब शोषक और शोषित में मुठभेड़ होता है, तब कोई क्रांति नहीं, बल्कि केवल हिंसा होती है। यदि शोषक और शोषित के बीच कभी क्रांति हुई होती तो, आज सुशांत सिंह राजपूत का हाल रोहित वेमुला जैसा नहीं होता।  


सबसे पहले स्पष्ट कर दूं कि मेरा बयान कंगना रनौत को रिप्लाई नहीं है।
बल्कि कंगना रनौत ने जो कुछ कहा है उसी दुख दर्द की एक और कहानी है जो कभी कही और सुनाई नहीं जाती बल्कि हमेशा दबाई जाती है।
मामला है सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या का।
भारत में हर आदमी अपने नाम में अपने पूर्वजों का इतिहास भी लिखता है जैसा कि सुशांत सिंह राजपूत ने अपने नाम में लिखा हुआ है।
सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या से मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत दुख है।
सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या पर कंगना रनौत ने सवाक उठाए हैं वे बहुत जायज लगते हैं।
लेकिन कुछ सवाल मेरे भी हैं।
कुल मिलाकर यह कहा जा रहा है कि सुशांत सिंह राजपूत के साथ भेदभाव हो रहा था। इसी से तंग आकर उसने आत्महत्या कर लिया, हो सकता है यह बात सही हो।
मेरे सवाल किसी व्यक्ति से नहीं बल्कि पूरे समाज से हैं।
सुशांत सिंह राजपूत के साथ भेदभाव हुआ तो उसने सुसाइड कर लिया।
अब आप जरा सोचिए कि उत्तर प्रदेश बिहार के दलितों पिछड़ों के साथ हजारों सालों से जो भेदभाव हो रहा है, आखिर ये लोग कैसे जिंदा है?
दलितों पिछड़ों को जानवर से भी बदतर जीवन जीने के लिए मजबूर किया जाता है।
कंगना रनौत तक मेरी बात पहुंचे ... तो यही कि यही फिल्मी दुनिया दलितों पिछड़ों की समस्याओं से कैसे अपना मुंह मोड़ लेती है?
वे कौन लोग हैं जो दलित पिछले लड़कियों के बलात्कार और हत्या पर मौन धारण कर लेते हैं?
फूलन देवी को फूलन देवी बनने पर मजबूर करने वाले कौन लोग हैं?
यही वे लोग हैं जो यूपी बिहार में दलितों पिछड़ों मुसलमानों से घृणा करते हैं पर जब मुंबई मायानागरी जाते हैं तो खुद भेदभाव क शिकार हो जाते हैं। एक बार अभिनेता मनोज बाजपेई कह रहे थे उनको ज्यादा तवज्जो नहीं दी जाती है।
और जो लोग मुंबई मायानगरी में भेदभाव करते हैं, वे हॉलीवुड में जाकर भेदभाव के शिकार हो जाते हैं। एक बार प्रियंका चोपड़ा कह रही थी कि विश्व सुंदरी होने और स्टार होने के बावजूद हॉलीवुड में जब वह गई तो उनको उनको काफी संघर्ष करना पड़ा।
इतनी छोटी सी बात इन लोगों को समझ में क्यों नहीं आती?
मेरे दादा भगवान श्रीकृष्ण हजारों साल पहले लोगों को समझा गए हैं कि जैसा कर्म करोगे वैसा ही फल मिलेगा।
जो लोग उत्तर प्रदेश बिहार में दलितों पिछड़ों के साथ भेदभाव करते हैं, वे बॉलीवुड में भेदभाव के शिकार हो जाते हैं और जो लोग बॉलीवुड में भेदभाव करते हैंवे हॉलीवुड में जाकर भेदभाव के  शिकार हो जाते हैं।
हमारे दादा भगवान श्रीकृष्ण यही तो समझा कि गए कर्म का फल। जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे। 
किसी से काहे का शिकवा, काहे का गिला है
ये सब तो मेरे यार अपने ही कर्मों का सिला है
.... .... .... .... .... ....  जो हमें आज मिला है
-संतोष के यादव 
अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया


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