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आँख मूंदकर बाज़ारवाद का हिस्सा मत बनिए : संतोष यादव, अधिवक्ता

बाजार, त्यौहार और आपके विचार में क्या तालमेल है?

अब सोचने, समझने और आंकलन करने का वक्त गया है कि आज हम जो जी रहें क्या वो हमारे लिए उपयोगी है? क्या वो हमारे लिए उपयुक्त हैं? आखिरहमारे त्योहारों में कितना कैरेट त्यौहार बचा है और कितना कैरेट मिलावटी बाज़ारवाद!



आज हम जिस उत्सवों और त्योहारों को जी रहे हैं, उसमें वास्तविकता ढूढ़े तो पाएंगे कि हम अपनी मेहनत की कमाई के सारे पैसे दुकान पर दे आए और जो कुछ बचा वो भी कहीं चढ़वा चढ़ गया या कहीं हवन हो गया। आज संस्कृति के नाम पर आप अपने मेहनत की कमाई को ऐसे मत लुटाइए। बचाइए इन्हें अपने भविष्य और अपने बच्चों के लिए। आँख मूंदकर बाज़ारवादी-डोंगवादी संuस्कृति का हिस्सा सिर्फ उपभोग होने के लिए मत बनिए। आप अपनी समझ और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का परिचय दिजिये।आप ने जो शिक्षा अपनी मेहनत की कमाई खर्च करके हासिल की है, उसका सदुपयोग किजिए। सिर्फ इसलिए सामान और कपड़े मत खरीदिये की आज धनतेरस, दीपावली, छठ और होली है। इन सभी त्यौहारों को आप अपने पॉकेट से पैसे निकालने के साधन बनाने से रोकिए। आप अपने पैसे को जरुरत के हिसाब से खर्च किजिए। बच्चे को शिक्षा और रोजगार के लायक बनाइए। इससे आपके घर में लक्ष्मी खुद आएगी और उनका का वास भी होगा। आप को यह  समझना होगा सिर्फ़ धनतेरस को बर्तन खरीदने से आज तक कोई अमीर नहीं बना है और ना ख़रीदने से कोई निर्धन बना है।

आप को सोचना होगा कि जो आप कर रहें है क्या वो आप कर रहें है या आप से करवाया जा रहा है? इसे समझने के लिए आप को ढ़ोंगवाद और बाज़ारवाद को समझना होगा। ढ़ोंगवाद पहले ढ़ोंग फैलता है, नये परसेप्शन बनाता है, फिर बाज़ारवाद के जाल में आप आसानी से फंस जाते हैं? बाजार और बाजार की आड़ में छिपी संस्कृति दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों का संगठित उद्देश्य आपके पैसे की लूट है। आप सिर्फ उनके द्वारा तैयारी किये प्रोपेगेंडा के पीछे आँख मूंदकर भागे जा रहे हैं। आप को विश्वास हो चला है कि धनतेरस की खरीदारी से धन आता है। जबकि यह अकाट्य सत्य है कि खरीदारी से घन जाता है। यही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार तो आप को दुनिया के सबसे बड़े बाज़ार के रूप में देखता है। आप को अपना कच्चा माल समझता है। यही वज़ह है कि आज तमाम तरह के त्योहारों और उत्सवों का शगूफा आप के बीच छोड़ा जा रहा है। इसी का हिस्सा हैं सारे डेज जैसे; मदर्स डे, फ़ादर्स डे, वेलेंटाइन डे इत्यादि। इन त्योहारों के नाम पर हमलोगों को घर से निकल कर बाज़ार में खरीदारी करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। हमलोग इस षड्यंत्र को समझ नहीं पा रहे हैं। हमें इस षड्यंत्र को समझाना होगा।

धनतेरस पर बर्तन खरीदने से कोई भला नहीं होने वाला है, बल्कि जो पैसे (लक्ष्मी) आप के पास हैं वो भी खर्च हो जाएंगे। आप को खरीदारी के लिए पर्व-त्यौहार के नाम पर धर्म की आड़ में मानसिक दबाव बनाया गया है। यही नहीं आप कुछ ख़ास लोगों के धंधे में दुरुपयोग हो रहे हैं। आप को समझना होगा कि आप क्या कर रहे हैं। संभालिए खुद को, इसी में सब का विकास है और राष्ट्र का निर्माण छुपा हुआ है। बाकि आप की मरजी, आप हमारा विरोध कर सकते हैं। मेरी भावनाएं आहत नहीं होगी क्योंकि मेरी भावनाएं इतनी कमजोड़ नहीं है बल्कि तर्क की कसौटी पर कसी तो समझ की तराजू पर तौली हुई है। इसी के साथ दिपावली की हार्दिक बधाई और ढेरों शुभकामनाएं!

साथ ही यह प्रकाश पर्व आपकी जिंदगी के अंधरे को उजाला कर दे.

-संतोष के यादव, अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट
चेयरमैन, पी आई एल फाउंडेशन
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