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हिन्दी साहित्य में नदियां : वर्तमान स्थिति एवं संरक्षण के प्रयास : -डॉ. सुनीता

शोध सार 


भारतीय संस्कृति में नदियों को बहुत महत्व दिया गया है। सभी भारतीय उसे माँ और देवी के समान पूजनीय मानते हैं। विभिन्न तीज, त्योहारों, संस्कारों और लोक, वेद में नदियाँ विशेषतः गंगा और यमुना को निश्चित रूप से स्मरण किया जाता है, साथ ही पूजा एवं अर्चना भी की जाती है। किंतु एक तरफ जहाँ हम नदियों को पूजनीय मानते हैं, वहीं दूसरी तरफ विकास की आड़ में उसका दोहन एवं शोषण कर रहे हैं। जब से औपनिवेशिक नीतियाँ हमारे देश में प्रवेश की हैं, तब से प्राकृतिक संसाधनों का खूब दोहन हुआ है। नदियों का दोहन हम कई रूपों में देख सकते हैं—बिजली निर्माण, बाँध बनाना, जल परियोजना, वाटर कंपनियों द्वारा कई तरह के पेय पदार्थों को बनाने के लिए भूमिगत जल का प्रयोग। एक ओर तो नदी के जल एवं भूमिगत जल का दोहन हो रहा है, वहीं दूसरी ओर औद्योगिक कारखानों से निकले कूड़े और कचरे, मल-मूत्र, सीवर के पानी को नदियों में प्रवाहित कर दिया जा रहा है, साथ ही शहरों के घरेलू कचरों की डंपिंग भी नदियों के किनारे पर ही हो रहा है। नदियों के जल के प्रदूषित होने के कारण पीने के पानी का संकट बढ़ने लगा है। नदियाँ केवल मनुष्य के जीवन को ही नहीं सिंचतीं, बल्कि प्रकृति में विद्यमान समस्त प्राणियों एवं जीव-जंतुओं का पालन इन्हीं के द्वारा होता है। वे वनों और पहाड़ों के भीतर भी रस भरती हैं। हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं में नदियों के विभिन्न रूपों, प्राचीन साहित्य में नदियों की स्थिति एवं वर्तमान में विकास के नाम पर हो रहे दोहन एवं शोषण, प्रदूषण के कारण मैली हो चुकी नदियों का विस्तार से चित्रण किया गया है, साथ ही नदियों को प्रदूषित एवं शोषित होने से बचाने के लिए सरकार द्वारा एवं जनमानस द्वारा किए गए प्रयासों का भी उल्लेख है।

बीज शब्द : भारतीय संस्कृति, प्रकृति, नदियाँ, जल प्रदूषण, जल संकट, दोहन एवं शोषण, वन, भूस्खलन, सूखा और बाढ़।

 


 Rivers in Hindi Literature: Present Condition and Conservation Efforts


Abstract


Rivers hold immense significance in Indian culture. All Indians revere them as mothers and goddesses. Rivers—especially the Ganga and the Yamuna—are invariably remembered in various rituals, festivals, sacraments, folklore, and the Vedas, and are worshipped and venerated. However, while on one hand we regard rivers as sacred, on the other hand we exploit and plunder them under the guise of development. Since the advent of colonial policies in our country, natural resources have been excessively exploited. The exploitation of rivers can be observed in several forms—hydropower generation, construction of dams, water projects, and the use of groundwater by water companies for manufacturing various beverages. On the one hand, river water and groundwater are being overextracted; on the other hand, industrial waste, garbage, human excreta, and sewage water are being discharged into rivers. Additionally, domestic waste from cities is being dumped along riverbanks. Due to the pollution of river water, the crisis of drinking water has begun to intensify. Rivers do not merely sustain human life; they nurture all living beings and creatures existing in nature. They also infuse vitality into forests and mountains. In the various genres of Hindi literature, rivers have been portrayed in multiple forms. Ancient literature depicts the revered status of rivers, while contemporary literature vividly presents their exploitation and degradation in the name of development, along with the pollution that has rendered them impure. Moreover, it also documents the efforts made by the government and the general public to protect rivers from pollution and exploitation.

Keywords: Indian culture, nature, rivers, water pollution, water crisis, exploitation, forests, landslides, drought, and floods.

 

प्रस्तावना  


हमारे देश में नदियों को जीवन रेखा कहा जाता है। इसके किनारे ही भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का विकास हुआ। भारत में छोटी-बड़ी लगभग 200 नदियाँ हैं, जो विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न नामों से जानी जाती हैं। कहीं गंगा, सरस्वती, नर्मदा तो कहीं ब्रह्मपुत्र, गंडक, कावेरी आदि, जिनमें गंगा नदी अपने बहाव के कारण भारत की सबसे लंबी नदी (2525 किमी) है। प्राचीन काल से ही इन नदियों को हमारे देश में पूजनीय माना गया है। इन्हें माँ, देवी, पाप विनाशिनी, दुःखहरनी भी कहा जाता है। विश्व के विभिन्न देशों में भी नदियों के प्रति लोगों के अलग-अलग दृष्टिकोण होते हैं। कोई उन्हें आजीविका के स्रोत के रूप में देखता है, तो कोई पारिस्थितिकी के अंग के रूप में, कोई माँ या देवी के रूप में आस्था के प्रतीक स्वरूप में देखता है। वास्तव में ये नदियाँ जीवदायिनी ही होती हैं। गंगा को हमारे देश में आस्था के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। “एक हिन्दू मिथक के अनुसार राजा भगीरथ ने अपने पुरखों का तर्पण करने के लिए सुदीर्घ तपस्या करके गंगा को भारत भूमि पर लाया था। मगर धरती पर पहुँचने के पूर्व वह शिव की जटा में उलझ गई थी और अंततः शिव ने उन्हें भारत भूमि पर आने दिया। तब से भारतीय उन्हें देवी के रूप में सभी धार्मिक, वैवाहिक एवं पर्व-त्योहारों के अवसर पर उपयोग में लाते हैं।”¹ वेद, पुराण, श्रीमद्भागवत गीता, रामायण, महाभारत इत्यादि धार्मिक ग्रंथों में भी नदियों की महत्ता का प्रतिपादन किया गया है। भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवत गीता में स्वयं को नदियों में भागीरथी गंगा तथा जलाशयों में समुद्र बताकर (स्रोतसास्मि जान्हवी सरसामस्मि सागरः) जल की महत्ता का बखान किया है।²


    भारतीय लोक परम्परा में भी नदियों को बहुत महत्व दिया गया है। स्त्रियाँ विभिन्न परिस्थितियों में माता गंगा को याद करती हैं। वे यश, समृद्धि, स्वास्थ्य, दीर्घायु, अन्न, प्रेम, सौंदर्य और वंश-वृद्धि के लिए अनेक मनौतियाँ करती हैं। विभिन्न ऋतुओं में माँ गंगा और यमुना के लिए गीत भी गाए जाते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक सोहर बहुत प्रचलित है, जिसमें एक बाँझ स्त्री अपने घर वालों के उलाहनों से तंग आकर गंगा घाट पर मृत्यु की कामना करती है। वह कहती है—हे गंगा माँ! या तो मुझे पुत्र-प्राप्ति का वरदान दो, या अपनी लहर से मुझे खींचकर अपने भीतर समाहित कर लो। वह सोहर है—

गंगा-जमुना के बिचवा तिरिया एक अरज करे हो /
गंगा! अपनी लहर हमें देइतु कि तेहि चढ़ बुड़िति न हो।³

किंतु कालांतर में इन नदियों की स्थिति बद-से-बदतर होती जा रही है। जिन्हें माँ और देवी का स्वरूप मानकर पूजन एवं अर्चन किया जाता था, उन नदियों में हजारों टन चमड़े का अपशिष्ट रोज गिराया जाता है, हजारों मुर्दों को जलाकर उनकी राख गंगा में विसर्जित कर दी जाती है या अधजली या पूरी लाश प्रवाहित कर दी जाती है। विभिन्न तीज-त्योहारों, धार्मिक अनुष्ठानों के लिए हम गंगा का सहारा लेते हैं। धार्मिक उत्सवों जैसे दुर्गा पूजा, गणेश पूजा, सरस्वती पूजा में प्रयोग की गई देवी और देवताओं की मूर्तियों को भी गंगा में विसर्जित किया जाता है। मूर्तियों के सौंदर्य में वृद्धि के लिए विभिन्न उपकरणों एवं रंगों का प्रयोग किया जाता है, जो गंगा के जल को कई स्तर तक प्रदूषित कर रहा है। पाखंड के नाम पर नदियों को हम नर्क बना रहे हैं। आए दिन गंगा किनारे पूजा-पाठ होता है। लोग स्नान-ध्यान करते हैं। पूजा के लिए प्रयोग की गई धूपबत्ती, दीप तो जलकर हवा में उड़ जाते हैं, किंतु उनके पैकेट, कागज, पन्नी आदि को नदियों में बहा दिया जाता है। यहाँ आए दिन मुंडन संस्कार होते हैं और तमाम लोइयों को प्रवाहित कर दिया जाता है। इससे नदियाँ रोज प्रदूषित हो रही हैं। भारत के बड़े शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों की नदियाँ ज्यादा प्रदूषित हैं, जिनमें दिल्ली और आगरा की यमुना नदी, कानपुर की गंगा नदी, लखनऊ की गोमती नदी आदि। जिन नदियों को हम देवी और माँ का दर्जा देकर पूजनीय मानते आए हैं, उन नदियों की ऐसी दुर्दशा बेहद चिंतनीय है। हमसे अच्छा तो विदेशी हैं, जो नदियों को माँ और देवी तो नहीं मानते, किंतु उनका सही तरीके से देख-रेख करते हैं और उन्हें प्रदूषित होने से बचाते हैं। “जर्मन नागरिक या ब्रिटिश नागरिक अपने देश की सबसे महत्वपूर्ण नदी क्रमशः राइन और टेम्स को न देवी कहता है, न माँ कहता है और न पवित्र मानता है, मगर उसे नदी मात्र के रूप में स्वच्छ रखता है।” ⁴


    नदियों की होती दयनीय स्थिति की ओर हिन्दी के समकालीन साहित्यकारों का भी ध्यान गया है। हिन्दी का कथा साहित्य हो या काव्य साहित्य—सबमें नदियों की हो रही दुर्दशा का चित्रण दिखाई देता है। हिन्दी काव्य में त्रिलोचन, केदारनाथ सिंह, अरुण कमल, ज्ञानेन्द्रपति, अशोक वाजपेई, चन्द्रकांत देवताले, निर्मला पुत्तुल आदि ने नदी की होती दुर्दिन स्थिति को अपनी कविताओं में अभिव्यक्त किया है। अपने समय एवं समाज के प्रति संवेदनशीलता रखने वाले इन कवियों की चिंता भी है और प्राकृतिक उपादानों के शोषण और दोहन करने वाले लोगों के प्रति आक्रोश भी। जल जीवन के लिए अत्यावश्यक तत्व है। रोजमर्रा के कार्यों के साथ-साथ खेती-बाड़ी, पशुपालन, औद्योगिक धंधों में भी इसकी आवश्यकता पड़ती है। बढ़ते प्रदूषण, सूखा, बाढ़, वृक्षोन्मूलन, बाँध निर्माण, बिजली उत्पादन, जल परियोजनाओं एवं जनसंख्या वृद्धि के कारण वर्तमान समय में जल संकट का सामना करना पड़ रहा है। प्राकृतिक संसाधनों का असीमित मात्रा में दोहन ही हमें इस कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है कि आज हम शुद्ध पानी के लिए भी तरसने लगे हैं। प्राचीन जल संसाधनों—कुआँ, तालाब और बावड़ियों—को पाट दिया गया है, कुछ नदियाँ पूरी तरह सूख गई हैं, जो बची हैं, वे भी प्रदूषित और दुर्गन्धित हैं। केदारनाथ सिंह ने अपने काव्य संकलन ‘उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ’ में संकलित ‘नदियाँ’ शीर्षक कविता में लिखा है कि नदियाँ किस तरह से हमारे जीवन में रची-बसी हैं। उसके बिना जीवन की कल्पना ही नहीं है। वे केवल जलीय जंतुओं की बेचैनी, छटपटाहट नहीं समझतीं, पहाड़ों की नसों में ही नहीं बहतीं, उनका मानव जीवन के साथ भी नाभिनाल का संबंध होता है। उनकी दूसरी कविता ‘बिन नाम की नदी’ में उसके उपयोगी पक्ष और मनुष्यों द्वारा किए जा रहे अंधाधुंध दोहन एवं शोषण पर प्रकाश डाला गया है। उनकी तीसरी महत्वपूर्ण कविता है ‘पानी की प्रार्थना’, जिसमें भावी समय में होने वाले जल संकट की समस्या की ओर कवि ने ध्यान दिलाया है। इस कविता में पानी का मानवीकरण किया गया है। पानी अपने अनुभव के माध्यम से यह बताना चाहता है कि पानी होने के नाते पहले जो उसे अनुभव होते थे, अब नहीं होते। वह स्वयं को पृथ्वी का प्राचीन नागरिक बताता है, जिसका इतना ज्यादा दोहन और शोषण हुआ है कि अब वह दुर्लभ होने के कगार पर खड़ा है। 


“प्रभु, मैं पानी—पृथ्वी का
प्राचीनतम नागरिक
आपसे कुछ कहने की अनुमति चाहता हूँ….
पर यहाँ पृथ्वी पर मैं
यानी आपका मुँह लगा यह पानी
अब दुर्लभ होने के कगार तक
पहुँच चुका है।” ⁵

वहीं ज्ञानेन्द्रपति के कविता संग्रह ‘गंगातट’ में संकलित कविताएँ ‘गंगास्नान,’ ‘नदी और साबुन,’ ‘पालीथिन,’ ‘गंगा में जहाँ वह नाला,’ आदि में नदी की वर्तमान स्थिति का वर्णन किया गया है। प्रदूषित और विषैली होती जा रही नदियों की स्थिति को देखकर कवि बेहद चिंतित और व्याकुल दिखाई देता है। उसकी गहरी चिंता और व्याकुलता ‘नदी और साबुन’ कविता में देख सकते हैं—

“नदी!
तू इतनी दुबली क्यों है
और मैली-कुचैली…..
किसने तुम्हारा नीर हरा
कलकल में कलुष भरा
बाघों के जुठारने से तो
कभी दूषित नहीं हुआ तुम्हारा जल……
आह! लेकिन
स्वार्थी कारखानों का तेजाबी पेशाब झेलते
बैगन हो गई तुम्हारी शुभ्र त्वचा
हिमालय के होते भी तुम्हारे सिरहाने
हथेली-भर की एक साबुन की टिकिया से
हार गई तुम युद्ध।” ⁶

वर्तमान में नदियों की जो दयनीय स्थिति हुई है, उसका कारण है हमारी नदियों के प्रति उदासीनता। अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए और अर्थप्राप्ति के लालच के कारण स्वार्थी लोग रोज ही उसका दोहन और शोषण कर रहे हैं। औद्योगिक कचरा, मल-मूत्र, पालीथिन आदि को नदी में प्रवाहित करने से नदियाँ विषैली हो गई हैं, जिसके जल का उपयोग किसी भी दृष्टिकोण से करने लायक नहीं है। कवि ‘नदी और साबुन’ कविता में नदी से संवाद करता है कि तुम इतनी दुबली और मैली-कुचैली कैसे हो गई हो, तुम्हारा जल किस कारण से हरा और काला दिखाई पड़ रहा है। सदियों से जंगली जानवर, विषैले जीव-जंतु तुम्हारे जल को पीते आए हैं, तब भी तुम्हारा जल कलुषित नहीं हुआ, फिर क्या कारण हो सकता है। फिर कवि को ध्यान आता है कि नदियों के जल की यह स्थिति तो कारखानों से निकलने वाले तेजाबी और दूषित कचरे ने की है, जिन्हें संचालन करने वाले कुछ स्वार्थी लोग अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए नदियों का गला घोट रहे हैं।


    ज्ञानेंद्रपति की दूसरी कविता है ‘पालीथिन’। इस कविता में कवि ने पालीथिन से उत्पन्न होने वाली भयावह त्रासदी की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया है। पालीथिन का उपयोग दैनिक जीवन में बहुत हो रहा है। आजकल जितने भी खाद्य-अखाद्य पदार्थ मिल रहे हैं, सबकी पैकिंग पॉलिथिन, प्लास्टिक से बने थैले, बैग्स में मिल रही है। हम चाहकर भी उनके उपयोग से बच नहीं पाते। तीर्थ स्थलों, पार्कों, नौका विहार करते समय उपयोग में लाए गए प्लास्टिक की बोतलों, पन्नी, दोना आदि को नदियों एवं झीलों में प्रवाहित कर देते हैं, जिससे जल तो प्रदूषित होता है, साथ में जलीय जीवों को भी अनेक संकटों का सामना करना पड़ता है। कवि ने लिखा है—

“करिखाई है गंगा
विषपायी है गंगा
दुखियारी माई है गंगा
उस निर्भर पालीथिन के पड़ते ही
भारी हो जाता है उसका जी।” ⁷

कवि ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपनी कविता ‘नदी’ में उपभोक्तावादी समय में नदियों के जल का किन रूपों में दोहन और शोषण हो रहा है, उस पर प्रकाश डाला गया है। कवि नदी की दुर्दिन होती स्थिति का जिम्मेदार उन ठेकेदारों को देता है, जो अपने फायदे के लिए जमीन से पानी की एक-एक बूँद भी खींच लेते हैं। भूजल का तो दोहन करते ही हैं, साथ में नदियों के जल पर भी कब्जा कर लेते हैं। इस कविता में नदी स्वयं अपने दर्द की अभिव्यक्ति करती है—

“पवित्र जल
गंदलाने लगा है
गगनचुंबी आकांक्षाओं से
वह यह भी जानती है
तुम उसे बेच दोगे किसी रोज ठेकेदार को, जो उसके जिस्म से
नोच लेगा
मांस-मज्जा
और छीन लेगा उसका नदी होना।” ⁸

इस समय जल की खरीद-बिक्री बहुत तेजी से हो रही है। वाटर सप्लाई करने वाली कंपनियाँ मनमाने ढंग से बोतलबंद पानी, पेप्सी, कोका-कोला आदि के द्वारा पानी का खूब दोहन कर रही हैं। इस संदर्भ में डॉ. अरविंदाक्षन ने अपनी कविता ‘नदी’ में लिखा है—

“नदियाँ
हर युग में इतिहास रचती थीं
अब भी रचती हैं
नदियों की बिक्री के इस जमाने में
इतिहास को तनिक बदल दिया गया है।” ⁹

हिन्दी उपन्यासों में भगवतीशरण मिश्र कृत ‘लक्ष्मण रेखा’ (2008), अभय मिश्रा कृत ‘माटी मानुष चून’ (2018), एस. आर. हरनोट कृत ‘हिडिंब’ (2008), ‘नदी रंग जैसी लड़की’ (2022) आदि में वर्तमान में हो रहे नदियों के शोषण, नदियों के जल में बढ़ते प्रदूषण आदि के कारणों पर प्रकाश डाला गया है। ‘लक्ष्मण रेखा’ उपन्यास में उत्तराखंड के नैनीताल की झीलों में बढ़ते प्रदूषण के कारण वहाँ के जनजीवन पर पड़ने वाले प्रभावों पर प्रकाश डाला गया है। इस उपन्यास का नायक विश्वम्भर और नायिका गीतिका वहाँ नौका विहार और प्रकृति के सौंदर्य का दर्शन करने के उद्देश्य से गए थे, किंतु वहाँ जाकर उन्हें सब कुछ बदला-बदला सा लगा। उन्हें वह सौंदर्य नहीं दिखा, जैसा उनकी कल्पना में था। पास में जाकर पता चलता है कि झील तो पूरी तरह प्रदूषित हो चुकी है। नौका विहार करते समय खाने-पीने की वस्तुओं के प्लास्टिक, छिलके, दोना आदि को जल में विसर्जित कर दिया जाता है। वहाँ की झीलों में क्रोमियम की मात्रा ज्यादा बढ़ जाने से भी जल प्रदूषित हो गया था। पहली बार जैसा उन्होंने झील को देखा था—साफ, स्वच्छ एवं दुर्गंधमुक्त—वैसा अब दिखाई नहीं दे रहा था। “झील का पुराना आकर्षण तो अब वर्षों से तिरोहित होने लगा था। इसका पानी दिनों-दिन अपनी स्वच्छता खोता जा रहा था। एक हरीतिमा-सी उसमें घुलने लगी थी।”¹⁰

    

    अभय मिश्रा कृत ‘माटी मानुष चून’ उपन्यास वेंटिलेटर पर जिंदा एक महान नदी की गाथा है। यह उपन्यास बांग्लादेश में बने फरक्का बाँध के टूटने से आई प्रलयपूर्ण स्थिति का वर्णन करता है। बाँध के टूटने से अपार जलराशि अचानक से पूरे बांग्लादेश में फैल जाती है, जिसमें गाँव के गाँव बह जाते हैं। जान-माल की जितनी हानि इस त्रासदी में होती है, उतनी कभी नहीं हुई थी। इसके साथ ही इस उपन्यास में नदियों के प्रदूषित होने के कारणों का भी उल्लेख है। आर्सेनिक एक सेमी-मेटालिक तत्व है, जो आयरन, कैल्शियम, कॉपर के साथ क्रिया करता है। इसे इसके जहरीलेपन के कारण जाना जाता है। यह भोजन, हवा, पानी और त्वचा के संपर्क में आकर हमारे शरीर के भीतर तक पहुँच जाता है और कैंसर, लिवर फाइब्रोसिस, हाइपर पिग्मेंटेशन जैसी लाइलाज बीमारियाँ घर कर लेती हैं। इससे गर्भ में पल रहे बच्चे तक अछूते नहीं रह पाते। सदैव से ही गंगा के जल में आर्सेनिक पाया जाता रहा है, किंतु इससे जल कैसे प्रदूषित होता है और मनुष्य से लेकर अन्य जीव-जंतुओं पर इससे कैसे खतरा उत्पन्न होता है, इस पर लेखक ने बताया है कि—“विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि अधिकतम दस पार्ट प्रति बिलियन आर्सेनिक मिला पानी ही सुरक्षित होता है, लेकिन गंगादेश में आर्सेनिक की मात्रा एक हजार से पंद्रह सौ पार्ट प्रति बिलियन तक पहुँच गई है।”¹¹

 

    एक समय ऐसा था जब गंगा के दोनों किनारों पर अकूत पैदावार होती थी—धान, गेहूँ, फल-फूल, सब्जियाँ। गंगा सब कुछ तो देती थी, किंतु आर्सेनिक ने सबसे पहले धान की खेती को पकड़ा और उनकी थाली तक पहुँच गया, जो गंगा नदी से काफी दूर बसते थे। अधिक उत्पादन के चक्कर में लोग अनेक तरह के कीटनाशकों, पेस्टिसाइड का प्रयोग करने लगे हैं, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक साबित होने लगा है। “देखते ही देखते गंगा तट ज़हर उगलने लगे, जिस अमृत के लिए सभ्यताएँ खिंची चली आती थीं, वह हलाहल में तब्दील हो गया। नतीजा—विस्थापन। लाखों लोग बेमौत मारे गए और करोड़ों साफ पानी की तलाश में गंगा से दूर हो गए। ‘गंगा से दूर साफ पानी की तलाश’, कहने में भी अजीब-सा लगता है।”¹²


    इस उपन्यास में बाँध निर्माण, नदी जोड़ो परियोजनाओं का विरोध दिखाई देता है, क्योंकि इससे जनजीवन एवं पशु-पक्षियों का जीवन अस्त-व्यस्त एवं संकटग्रस्त हो जाता है। हर नदी की इकोलॉजी अलग-अलग होती है। जो मछली नर्मदा नदी में सुखपूर्वक रह लेती है, ज़रूरी नहीं कि वह गंगा नदी में भी सर्वाइव करे। प्रत्येक नदी का गुण एवं स्वभाव अलग-अलग होता है। किसी नदी का पानी नीला होता है, तो किसी का हरा, किसी का मटमैला तो किसी का काँच की तरह चमकीला। यदि हम अलग-अलग गुणवत्ता वाली नदियों को आपस में मिला देते हैं, तो इससे उसमें रह रहे जलीय जीव-जंतुओं के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगता है। जिससे होता यह है कि वे अनेक तरह की बीमारियों से ग्रस्त होने लगते हैं, प्रजनन क्षमता में भी कमी आने लगती है। “नदियों को मिलाने का अधिकार पूरी तरह से प्रकृति का है। हम सिर्फ उससे अपनी ज़रूरतें पूरी कर सकते हैं, उनकी दिशा बदलने का अधिकार मनुष्य को नहीं है। फिर भी यह हुआ है, तो इसका परिणाम है मुर्गियों की तरह संकर तरीके से पैदा की जा रही मछलियाँ, जो हमारे विकास की गाथा गा रही हैं।”¹³


    ‘हिडिंब’ और ‘नदी रंग जैसी लड़की’ उपन्यासों में विकास के नाम पर हो रहे नदियों के शोषण एवं दोहन का चित्रण किया गया है। सड़क निर्माण, बाँधों का निर्माण, जल परियोजना, बिजली निर्माण के लिए जल का खूब दोहन किया जा रहा है, साथ ही नदियों को प्रदूषित भी किया जा रहा है। ‘नदी रंग जैसी लड़की’ उपन्यास की मुख्य पात्र सुनमा देई है, जो जल के दोहन, बाँध के कारण विस्थापन से उत्पन्न पीड़ा का अनुभव करती है, साथ ही उसका विरोध भी करती है। बाँधों के बनने से पानी स्थायी रूप से एक जगह पर एकत्रित हो जाता है। जिन क्षेत्रों से नदियों के प्रवाह को रोका जाता है, उस क्षेत्र के पशु-पक्षियों को पीने के पानी की समस्या बढ़ जाती है। एकत्रित जल में हरापन आ जाता है, ऑक्सीजन की मात्रा कम होने से जलीय जंतुओं के जीवन पर संकट मंडराने लगता है। जलीय जीवों को अनुकूल वातावरण न मिल पाने के कारण प्रजनन दर में कमी आने लगती है, जिससे झींगुर और डॉल्फ़िन जैसी मछलियों की प्रजातियाँ भी धीरे-धीरे नष्ट होने लगी हैं। बाँधों के दुष्प्रभाव का वर्णन करते हुए उपन्यासकार ने लिखा है— “नदी, नहीं है न, बस गँधला खारा पानी ही पानी है। खड़ा पानी। तड़पता पानी। मरा हुआ पानी। वह अब नहीं हिलता। अभिशापित जैसा। मानो किसी तपस्वी ने उस नदी को शापित कर दिया हो।”¹⁴

    

    हिन्दी कहानियों में अमरीक सिंह दीप का कहानी-संग्रह है ‘एक कोई और’, जिसमें वर्तमान समय में प्रदूषित हुई नदियों का रूपक खींचा गया है। कथाकार ने प्रदूषित नदी गोमती की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए लिखा है— “गंदे नाले से भी ज्यादा स्याह हो चुकी गोमती के ठहरे हुए से पानी में सूरज नाक बंद कर डुबकी लगाने जा रहा है। उसकी ज़र्द किरणें सड़े अंडे की ज़र्दी की तरह गोमती की जल-सतह पर छितराई हुई हैं। यूँ लग रहा है, जैसे अँधेरा आसमान में नहीं, गोमती के स्याह जल से निकलकर शहर पर छाने वाला है।”¹⁵


    इस तरह हम देखते हैं कि नदियों को प्रदूषित करने के जो मुख्य कारक हैं, उनमें प्रमुख हैं औद्योगिक इकाइयाँ, जिनमें चमड़े के कारखाने, शराब की भट्टियाँ, बूचड़खाना, कपड़े के कारखाने, उर्वरक एवं कीटनाशक का निर्माण, अस्पताल आदि। इन कारकों से नदियों को प्रदूषित होने से बचाने के लिए कई तरह के उपाय कारगर हो सकते हैं—गंगा किनारे बनाए गए औद्योगिक संस्थानों को कहीं अन्य जगह पर स्थानांतरित करना, ठोस अपशिष्टों से बिजली का निर्माण करना, जैसा भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में होता है, शोध-शालाओं का निर्माण करना और उनकी स्थापना करना, प्रदूषित जल का पुनः चक्रण एवं पुनः उपयोग करना, शहरों के सीवर, कूड़ा-कचरा, जैविक-अजैविक पदार्थों के निष्कासन की समुचित व्यवस्था करना, खेतों से बहने वाले रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों को गंगा में बहने से रोकना, गंगा किनारे शवों को जलाने एवं प्रवाहित करने से रोकना, समुचित रूप से विद्युत शवदाह गृहों का निर्माण करना और लोगों को इसके प्रति ठोस कदम उठाने के लिए प्रेरित करना, दर्शनार्थियों द्वारा गंगा में मूर्ति विसर्जन, फूल-पत्ती, धूप-बत्ती, घी के दिए, चुनरी एवं अन्य पूजा सामग्रियों को प्रवाहित करने से रोकना, गंगा के घाटों की नियमित रूप से सफ़ाई करवाना, शौचालयों का निर्माण करवाना, गंगा के किनारे वृक्षारोपण करना आदि उपायों से कुछ हद तक हम गंगा को प्रदूषित होने से बचा सकते हैं।


    जल संकट एवं नदियों की वर्तमान स्थिति, एवं उससे उत्पन्न अनेक समस्याओं को देखते हुए कुछ ऐसे महान व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने नदियों को बचाने के लिए, जल को संरक्षित करने के लिए कई कारगर उपाय बताए हैं। जिनके नाम हैं—राजेंद्र सिंह, जिन्हें जल पुरुष भी कहा जाता है; अनुपम मिश्र, जिनकी जल संरक्षण को लेकर लिखी गई दो पुस्तकें हैं—‘आज भी खरे हैं तालाब’, दूसरी ‘राजस्थान की रजत बूँदें’; अरुंधति रॉय, जिन्होंने नदियों पर बनने वाले बाँधों का विरोध किया था, उनकी पुस्तक है ‘न्याय का गणित’; के. चंद्रमौलि, जिनकी पुस्तक का नाम है ‘गंगा बचाओ’; और रत्नेश्वर कुमार सिंह का उपन्यास है ‘एक लड़की पानी पानी’ आदि। नदियों को प्रदूषण से मुक्त करने के लिए केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार द्वारा कुछ योजनाएँ एवं दिशा-निर्देश दिए गए हैं। 1974 में जल प्रदूषण नियंत्रण कानून बना था, जिसका पालन भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य बन जाता है, किंतु कहाँ तक कोई इसका पालन करता है, यह देखने और सोचने वाली बात है। गंगा नदी को प्रदूषित होने से बचाने के लिए 1 जून, 1985 को गंगा एक्शन प्लान आरंभ किया गया, जिस पर 451.70 करोड़ रुपए खर्च किए गए, तथा गंगा एक्शन प्लान-2 वर्ष 1993 और 2009 में विभिन्न फ़ेज़ में शुरू हुआ और 835.34 करोड़ रुपए खर्च हुए। इसमें 95 शहर एवं कस्बों को ध्यान में रखा गया। फ़रवरी 2009 में राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण का गठन हुआ। वर्ष 1993 में यमुना प्रोजेक्ट शुरू हुआ तथा जापान ने इसमें 10.27 अरब रुपए लगाए। वर्ष 2016 एवं वर्ष 2017 में मैली से निर्मल यमुना तथा पुनरुद्धार योजना शुरू हुई। 2 अक्टूबर 2014 से शुरू स्वच्छता अभियान तथा नमामि गंगे परियोजना इसी उद्देश्य से शुरू की गई थी। देश की प्रत्येक ज़िला पंचायत, ग्राम पंचायत, नगरपालिकाएँ खुले में शौच से मुक्ति पाएँ, साथ ही भारत की जितनी प्रदूषित नदियाँ हैं, उनकी सफ़ाई करके पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को स्वच्छ एवं समृद्ध बनाने की योजना बनाई गई थी। नमामि गंगे परियोजना मिशन के लिए केंद्र सरकार ने 2037 करोड़ की धनराशि का प्रावधान 2014-15 के बजट में किया गया था। गंगा के घाटों के निर्माण और सौंदर्यीकरण के लिए अलग से 100 करोड़ की धनराशि का प्रावधान किया गया।


निष्कर्ष  


इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि नदियों के बिना कोई भी समाज, संस्कृति, सभ्यता एवं अर्थव्यवस्था चिरस्थायी नहीं हो सकती। इसीलिए नदियों की समुचित अर्थव्यवस्था को पूरी ईमानदारी एवं प्रतिबद्धता से सुरक्षित एवं संरक्षित करने की जिम्मेदारी भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। उन्हें अपने तन, मन एवं धन से, पूरे समर्पण के साथ प्राकृतिक संसाधनों के प्रति संकल्पबद्ध होने की आवश्यकता है। अन्यथा एक समय ऐसा आएगा, जब पछताने के अतिरिक्त हमारे पास कुछ नहीं बचेगा। आज के साहित्यकारों की यह चिंता भी है कि हम भावी पीढ़ियों को क्या देने वाले हैं। पहाड़ तो नंगे हो चुके हैं, नदियाँ भी सूख चुकी हैं, जो बची हैं, वे भी प्रदूषित और दुर्गन्धित हैं। इस संदर्भ में एस. आर. हरनोट लिखते हैं— “वह जब किताबों में निर्मल जल से भरी नदियों के बारे में पढ़ेंगे, हरे-भरे जंगलों के बारे में पढ़ेंगे और ठंडी हवाओं का ज़िक्र पढ़ेंगे, तो वह आपसे उन नदियों को माँगेंगे, पहाड़ माँगेंगे, हरियाली और शुद्ध हवा को माँगेंगे, परंतु आपके पास देने को कुछ होगा ही नहीं।”¹⁶ इसलिए हम सबको मिलकर अपने पारिवारिक कर्तव्यों की तरह प्राकृतिक उपादानों को बचाने, संरक्षित करने के लिए हर संभव प्रयास करने का संकल्प लेना चाहिए तथा जब भी अवसर मिले, अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए।

  



संदर्भ सूची : 


1. सुभाष शर्मा, पर्यावरण और विकास, पृ. सं. 90, प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2017।

2. सं. दत्ता कोल्हारे, हिंदी साहित्य में पर्यावरणीय संवेदना, पृ. सं. 192, कल्याणी शिक्षा परिषद्, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2020।

3. रमाशंकर सिंह, नदी पुत्र उत्तर भारत में निषाद और नदी, पृ. सं. 196, सेतु प्रकाशन, नोएडा (उत्तर प्रदेश), प्रथम संस्करण, 2022।

4. सुभाष शर्मा, पर्यावरण और विकास, पृ. सं. 90, प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2017।

5. केदारनाथ सिंह, पानी की प्रार्थना, पृ. सं. 109, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण, 2020।

6. सं. डॉ. ए. एस. सुमेष, समकालीन हिंदी साहित्य में पर्यावरण विमर्श, पृ. सं. 31–32, अमन प्रकाशन, कानपुर, प्रथम संस्करण, 2016।

7. वहीं, पृ. सं. 33।

8. ओमप्रकाश वाल्मीकि, नदी, वागर्थ — अगस्त, 2011, पृ. सं. 62।

9. डॉ. अरविंदाक्षन, आसपास, पृ. सं. 15।

10. भगवतीशरण मिश्र, लक्ष्मण रेखा, पृ. सं. 9, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2008।

11. अभय मिश्रा, माटी मानुष चून, पृ. सं. 78, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2019।

12. वहीं, पृ. सं. 79।

13. वहीं, पृ. सं. 125–126।

14. एस. आर. हरनोट, नदी रंग जैसी लड़की, पृ. सं. 172, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2022।

15. सं. दत्ता कोल्हारे, हिंदी साहित्य में पर्यावरणीय संवेदना, पृ. सं. 145, कल्याणी शिक्षा परिषद्, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2020।

16. एस. आर. हरनोट, नदी रंग जैसी लड़की, पृ. सं. 137, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2022।

 

-डॉ. सुनीता

शोधार्थी (हिन्दी विभाग)
बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर केन्द्रीय 
विश्वविद्यालय, लखनऊ
ई-मेल: svsu232103@gmail.com


 





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