शोध आलेख : राजस्थान की लोककथाएं, कथा-संग्रह की प्रवृतियां
‘लोक’ शब्द संस्कृत के ‘लोकदर्शने’ धातु से ‘घ’ प्रत्यय करने पर निष्पन्न हुआ है। इस धातु का अर्थ ‘देखना’ होता है, जिसका लट् लकार में अन्य पुरुष एकवचन का रूप ‘लोकते’ है। अतः ‘लोक’ शब्द का अर्थ हुआ ‘देखने वाला’। इस प्रकार वह समस्त जन-समुदाय जो इस कार्य को (देखने का कार्य) करता है ‘लोक’ कहलायेगा। ‘लोक’ शब्द अत्यंत प्राचीन है। साधारण जनता के अर्थ में इसका प्रयोग ऋग्वेद में अनेक स्थानों पर किया गया है। ऋग्वेद में ‘लोक’ के लिए ‘जन’ शब्द का भी प्रयोग उपलब्ध होता है।
डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ‘लोक’ के सम्बन्ध में अपने विचार को प्रकट करते हुए लिखा है कि ‘लोक’ शब्द का अर्थ ‘जन-पद’ या ‘ग्राम्य’ नहीं है बल्कि नगरों और गावों में फैली हुई वह समूची जनता है जिनके व्यावहारिक ज्ञान का आधार पोथियाँ नहीं हैं। ये लोग नगर के परिष्कृत, रुचि-संपन्न तथा सुसंस्कृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा अधिक सरल और अकृत्रिम जीवन के अभ्यस्त होते हैं और परिष्कृत रुचि वाले लोगों की समूची विलासिता और सुकुमारिता को जीवित रखने के लिए जो भी वस्तुएँ आवश्यक होती हैं उनको उत्पन्न करते हैं।
इससे ज्ञात होता है कि जो लोग संस्कृत तथा परिष्कृत लोगों के प्रभाव से मुक्त रहते हुए अपनी पुरातन स्थिति में वर्तमान हैं उन्हें ‘लोक’ की संज्ञा प्राप्त होती है। वस्तुतः अहंकार-भाव (साहित्य को निजी रचना न समझना) से रहित इन्हीं लोगों के साहित्य को लोक साहित्य कहा जाता है। यह साहित्य प्रायः मौखिक होता है तथा परम्परागत रूप से चला आता है। यह साहित्य जब तक मौखिक रहता है तभी तक इसमें नित नूतनता, प्रवाहमान जलधारा के समान ऊर्जा वर्तमान रहती है जो कि इसे कालजयी बनाती है। लिपिबद्ध होने के उपरांत इसका लोकोन्मुख स्वभाव समाप्त हो जाता है।
लोक साहित्य को प्रधानतया पाँच भागों में विभक्त किया गया है –
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लोक-गीत (Folk-lyrics)
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लोक-गाथा (Folk-ballads)
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लोक-कथा (Folktales)
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लोक-नाट्य (Folk-drama)
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लोक-सुभाषित (Folk-sayings)
लोक साहित्य के वर्गीकरण में लोककथाओं का प्रमुख स्थान है। ये अपनी सरसता और लोकप्रियता के कारण महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। हमनें बचपन में अपनी दादी, नानी, माँ या अन्यों से इस प्रकार की कई कहानियाँ सुनी हैं जैसे – ‘चंदा मामा’, ‘राजकुमारी फूलकुमारी’ आदि। वस्तुतः अपनी बोधगम्यता के कारण ये अचूक प्रभाव रखती हैं। ये बालकों के हेतु प्रथमतः शिक्षा एवं समाज से जोड़ने का माध्यम हैं। इनका भारत में एक लंबी परम्परा दिखती है जैसे – पंचतंत्र, हितोपदेश आदि।
लोक कथाओं के वर्ण्य-विषय की दृष्टि से इन्हें छः वर्गों में विभाजित किया गया है :-
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उपदेश-कथा,
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व्रत-कथा,
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प्रेम-कथा,
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मनोरंजन-कथा,
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सामाजिक-कथा,
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पौराणिक-कथा।
विवेच्य कथा संग्रह ‘राजस्थान की लोककथाएँ’ में से कुल 24 कहानियाँ यहाँ विवेचन हेतु ली गई हैं। वास्तव में ये सभी कथाएँ लघु-कथा हैं। अपने स्वरूप में सरल, सहज और मूल अर्थों में यह उपदेशात्मक हैं किन्तु हम इन्हें सामाजिक और मनोरंजन कथा के वर्ग में भी रख सकते हैं।
इसके कथा निष्कर्ष या उद्देश्य के आधार पर जो वर्ग-श्रेणियाँ बनती हैं वे निम्नांकित हैं –
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व्यवहारकुशलता हेतु या बुद्धि की कीमत,
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स्वार्थ और लालच आधारित,
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अहम का अभाव और जमीनी सोच,
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वेश्यागमन का दुष्परिणाम,
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जाति का प्रभाव,
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ज्ञान को प्रमुखता, सौंदर्य गौण,
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कर्मठता का प्रभाव,
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कंजूसी की बुराई,
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पारब्ध्य (भाग्य),
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वीरगाथा,
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शास्त्र से अधिक लोक ज्ञान महत्वपूर्ण।
व्यवहारकुशलता हेतु या बुद्धि की कीमत : इस वर्ग में ‘दुनिया सुआरथ की है’, ‘मुनीम और नौकर’, ‘मूर्ख नौकर’, ‘वखत की सूझ’, ‘बेगम भाई नै वजीर बनायो’ आदि रखे जा सकते हैं। इस वर्ग की कहानियों में लोक में प्रचलित संबंधों और व्यवहारों के माध्यम से व्यक्ति को व्यवहारकुशल होने की सीख दी गई है।
स्वार्थ और लालच आधारित : इस वर्ग की कथाओं में मुख्यतः ‘दुनिया सुआरथ की है’, ‘जाट और बाणियों’, ‘नाई को ठोलो’, ‘बनिये को टक्को’, ‘गोकुलिये गुसाइयों की लीला’ आदि आएँगे।
अहम का अभाव और जमीनी सोच : ‘काकलासर तो आ ढूक्या’ इसी वर्ग की कथा है जो बीकानेर के महाराज से सम्बंधित है।
वेश्यागमन का दुष्परिणाम : ‘भगतण की सीख’ में सेठपुत्र के वेश्या के प्रेम में अपनी समस्त संपत्ति को नष्ट कर देने की कथा है। यह लोक में प्रचलित मदिरा और वेश्या के संगत को लेकर जो धारणा बनी हुई है उसी के अनुरूप है।
जाति का प्रभाव : ‘राजा सांसन नै ब्याही’ कथा में यह बताया गया है कि आदमी बड़ा होने से उसकी जाति का प्रभाव नहीं छूट जाता है। जैसे एक लोकोक्ति है – ‘आदत जात कभी ना छूटे कुत्ता टांग उठाके मूते’। लोक के अन्दर इस प्रकार की जातिवादी मानसिकता एक नकारात्मक और रूढ़ीवादी स्वभाव के रूप में रहती है। भारतीय ग्राम इसका सबसे जीवंत उदाहरण हैं। वस्तुतः यह सामंतवादी जीवन-मूल्य का प्रभाव है जिसके कारण शोषण आधारित जातिवादी व्यवस्था को बढ़ावा मिलता है।
कर्मठता का प्रभाव : ‘शिवजी को शंख’ कथा में भगवान शिव किसान की कर्मठता से प्रभावित होते हैं एवं प्रेरित होकर अपना कर्म करने के लिए शंख बजाते हैं, तदोपरांत वर्षा होती है। अर्थात ‘जो अपनी सहायता करता है ईश्वर भी उसी की सहायता करता है।’
कंजूसी की बुराई : ‘कंजूस को धन’ में धन की सार्थकता केवल उसके संग्रह में न होकर उसके उपयोग में है। धर्म-शास्त्रों में ‘धन की तीन गति’ स्वीकार की गई है – सर्वोत्तम गति ‘सत्पात्र को दान’, मध्यम गति ‘भोग’, और तृतीय गति स्वमेव होती है ‘नाश’। एक लोकोक्ति है – ‘सोम के धोन दीमक खाय’ (कंजूस का धन दीमक खाता है)।
पारब्ध्य (भाग्य) : ‘बिना करम में लिखें धन कोनी मिलै’, ‘अब क्यूँ रोवै?’ इस तरह की कुछ कहानियों में पारब्ध्य की सर्वोच्चता स्वीकार की गई है। वस्तुतः भाग्य का सम्बन्ध पूर्वजन्म के कर्म से जोड़ा गया है और इस अर्थ में यह अटल है, इसमें कोई बदलाव नहीं हो सकता। सामान्य भारतीय जनता भाग्यवादी है, इन्हीं धारणाओं का परिचय यहाँ मिलता है। इस कर्म के विधान हेतु शकुन-अपशकुन की अवधारणा निर्मित हुई है जिसके लिए हम ईश्वर से ‘मनोती’ (मान्यता) करते हैं। यदि निष्पक्ष रूप से देखें तो यह ईश्वर को घूस ही देना हुआ, जिसमें ईश्वर को हमारे काम के पूरा करने पर उपहार स्वरूप देते हैं।
वीरगाथा : ‘महाराज पद्मसिंह’ और ‘ठाकुर केसरी सिंह’ राजस्थान की वीरतापूर्ण प्रवृत्ति की द्योतक कथाएँ हैं।
शास्त्र से अधिक लोक ज्ञान महत्वपूर्ण : ‘पढयो पण गुन्यो कोनी’ में वैद्य के पुत्र की मूर्खता के माध्यम से यह ज्ञान दिया गया है कि केवल पोथी-वाचन से व्यक्ति गुणी नहीं हो जाता, अपितु लोक का ज्ञान आवश्यक है। शास्त्र से इसका किंचित भी कम महत्व नहीं है।
‘राजस्थान की लोककथाएँ’ में जीवन के विविध प्रसंग आए हैं, इसी कारण प्रवृत्तिगत बहुलता दिखती है। यहाँ पर इनका एक सामान्य प्रवृत्तिगत व्याख्या करने का प्रयास किया गया है। ये हमें जीवन को देखने-समझने का एक नजरिया देती हैं।
-अभिषेक भारद्वाज
शोधार्थी, गुजरात केंद्रीय विश्विविद्यालय
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