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सवर्ण आरक्षण के लोभ में मारी गई संविधान की आत्मा : संदीप यादव

हमारा समाज एक जातिगत समाज है, वैसे तो गैर बराबरी पूरी दुनिया में है लेकिन वह किस प्रकार की गैर बराबरी है, यह जानना भी बहुत जरूरी है। भारतीय समाज के रग रग में जाति है और उसके कारण एक बड़े तबके के साथ जातिगत भेदभाव लंबे समय से होता रहा है। भारत का जातीय भेदभाव एक बहुत ही अमानवीय ढंग का भेदभाव भी रहा है।

जाति एक हायरआर्कि है और जिस क्षण आप हायरआर्कि की बात करते हैं तो उसी क्षण आप किसी को बड़ा और किसी को छोटा सिद्ध करतें हैं, और उसी क्षण भेदभाव शुरू हो जाता है। जातिगत भेदभाव का मतलब जैसे जिन तबकों का जाति के आधार पर जबरदस्ती बहिष्कार किया गया है, उन जातियों को जबरदस्ती विशेष सुविधा, जिसे हम आरक्षण कहते हैं, देकर मुख्यधारा के समाज में शामिल किया गया है। आरक्षण का बेसिक कानून ही यही है की आरक्षण पूर्ण और सम्मानीय सामाजिक नागरिक होने की गारंटी है। आधुनिक राष्ट्र में नागरिक बराबर होनी चाहिए, ऐसा पूरी दुनिया मानती है, कम से कम सैद्धांतिक आधार पर तो निश्चित ही बराबरी होनी चाहिए, भले ही व्यावहारिक स्तर पर थोड़ा कम ज्यादा हो।


भारत के आजादी के बाद नेहरू युग में ऐसा माना गया कि विकास ही हर मर्ज की दवा है लेकिन एक निश्चित समय के बाद देखा गया कि उस विकास की दौड़ में कुछ एक तबकों (स्वर्ण जातियों) का ही केवल विकास हुआ, और जो जातियाँ लंबे समय से गैर बराबरी और भेदभाव के अपमान को झेल रही थीं, उनकी स्थिति जस की तस थी। आरक्षण का विचार ही गैर बराबरी व जातिगत भेदभाव को खत्म करना था, भेदभाव का समाज में इतना सरलीकरण हो गया है कि अगर आरक्षण कुछ तबकों को ना दिया जाता तो गैर बराबरी शाश्वत काल तक बनी रहती। आरक्षण सामाजिक विषमता को दूर करता है। यह एक विशेष तबके से बिना कुछ लिए, एक तबके को देता है। मतलब उसकी गैर बराबरी को खत्म करता है, और सबको बराबर करता है।

सरकार के स्वर्ण समाज को 10% रिजर्वेशन देने के निर्णय से समाज की गैर बराबरी और गहरी होगी। जनता से झूठे और खोखले वादे करने के बाद यही एक कदम तत्कालीन प्रधानमंत्री के पास बचा है। दलित और आदिवासी समाज को आरक्षण जातिगत बहिष्करण के लिए था, जबकि ओबीसी का आरक्षण आंशिक जातिगत बहिष्कार, और उनकी पावर स्ट्रक्चर में नगण्य भागीदारी होने की वजह से है। स्वर्ण समाज को आर्थिक आधार पर 10 परसेंट आरक्षण दिए जाने के पीछे एक बहुत ही चालाक साजिश है। इसके पीछे मंशा यही है कि आर्थिक पहलू वाले एस्पेक्ट को जोड़कर आरक्षण की मूल भावना को हमेशा के लिए ध्वस्त कर दिया जाय, जिससे sc.st.obc का रिजर्वेशन हमेशा के लिए खत्म हो जाए और स्वर्ण जातियों की सुप्रीमेसी हमेशा के लिए बनी रहे।

अगर देखा जाये तो इस समस्या की जड़ में कांग्रेस है, कांग्रेस ने इस तरह के आरक्षण की शुरुआत 2013 में जाट समाज के साथ की थी, कांग्रेस जानती थी कि सुप्रीम कोर्ट इस निर्णय को रिजेक्ट कर देगा लेकिन फिर भी उन्होंने हताशा में उस निर्णय को पार्लियामेंट में पास किया और बीजेपी ने भी उनका उस समय समर्थन किया था। अब जब बीजेपी बिल ला रही है तो कांग्रेस भी बीजेपी का समर्थन कर रही है। कांग्रेस जनता के सामने बुरा नहीं बनना चाहती है।

संविधान का कोई भी संशोधन भारत की उच्च न्यायपालिका रिव्यू कर सकती है अगर उच्च न्यायालय समझती है कि वह कानून देश हित में नहीं है। जब उच्च न्यायपालिका इस निर्णय का रिव्यू करेगी तो उसके पास 3 बेसिक सवाल होंगे, पहला यह कि रिजर्वेशन को 50 परसेंट से ज्यादा नहीं बढ़ाया जा सकता है। दूसरा यह कि रिजर्वेशन अफ्फर्मेटिव एक्शन है, और इसको सोशल इनजस्टिस और एक्सप्लॉइटशन झेलने के लिए दिया गया है। इसमें इकोनॉमिक मारजिनालिटी का कहीं कोई सवाल ही नहीं उठता। तीसरा उच्च न्यायालय भारत सरकार से डाटा मांगेगा कि जिस तबके को सरकार अंडररिप्रेजेंटेड बता रही है उसका भारत की नौकरियों में कितना शेयर है। जब डाटा सुप्रीम कोर्ट के पास आएगा तो उनको साफ-साफ पता चलेगा कि जिस तबके को आर्थिक आधार पर रिजर्वेशन दिया गया है, उस तबके का कम से कम सरकारी नौकरियों में 35% से भी ज्यादा रिप्रेजेंटेशन है, और उसी आधार पर यह मामला निरर्थक सिद्ध हो जाएगा।
वैसे हर राजनीतिक पार्टी अपने समय, देश, काल व सिचुएशन के हिसाब से इस निर्णय को पॉलिटिकल माइलेज के लिए भुना रही है लेकिन इसमें सही में कुछ भुन रहा है, तो वह है, संविधान की आत्मा और देश।

 -संदीप यादव 
 Assistant Professor, University of Delhi