राजनीति

[राजनीति][twocolumns]

समाज

[समाज][bleft]

साहित्‍य

[साहित्‍य][twocolumns]

सिनेमा

[सिनेमा][grids]

बात तो बराबरी की करते हैं लेकिन व्यवहार गैर बराबरी का: मीना

कुछ लोग ऐसे होते हैं कि बातचीत के दौरान बाल की खाल निकालते रहते हैं. केवल अपनी सुनाते हैं. किसी की सुनते नहीं हैं. दुनिया कहाँ से कहाँ आ गयी लेकिन वे बात-बात पर रामायण महाभारत ले कर बैठ जाते हैं और विकास विकास भी करते रहते हैं और विकास को पसंद भी नहीं करते हैं. हर नई चीज में दोष निकलते रहते हैं. कहीं कोई घटना हो जाए, तुरंत मोबाइल, जींस, टीवी, सिनेमा को दोष देने लगते हैं जैसे कि इनके इस्तेमाल के पहले ऐसी घटनाएँ नहीं हो रही थीं. इतिहास ऐसे ही सिरफिरे लोगों के जघन्य अपराधों से भरा पड़ा है.

एक दिन ऐसे ही एक पंडित जी से आरटीवी में बहस हो गयी.

“भैया, खिड़की के पास इतना गुटखा थूका हुआ पड़ा रहता है. इसे साफ करवा दिया करो. अगर आप किसी को थूकते हुए देख लेते हो तो मना कर दिया करो. सीट के पास बैठने का मन नहीं करता है.”
मैंने आरटीवी वाले कंडक्टर से इतना ही बोला कि पीछे से आवाज़ आई- “भाई साहब बच्ची ने बात तो बिल्कुल सही कही है लेकिन बेटा यह बात तो इंसान को समझाई जाएगी, इन जानवरों को कौन समझाए. बेटा एक बात बताऊं. ये जितने गंदे काम होते हैं. पुरुष कम करते हैं और महिलाएं ज़्यादा करती हैं.”




पंडित जी तपाक से अपना छोटा सा थैला दिखाते हुए बोले- “देखो यह मेरा बैग पिछले दिनों एक औरत इसमें हाथ डाल रही थी और मैंने हाथ पकड़ लिया. ये जितने गंदे काम होते हैं. औरतें ही ज़्यादा करती हैं”.

उनकी यह बात सुनते ही मेरा दिमाग खराब हो गया.


आगे पंडित बोले- “अब तुम यह बताओ. एक लड़की जो ट्यूशन पढ़ने जा रही है. उसका क्या मतलब है कि वो लड़कों के साथ रंगरलियां मनाए. वह जो निर्भया वाला कांड हुआ, वह गलत जरुर था लेकिन उसको क्या ज़रूरत थी. इतनी रात को बाहर निकलने की.” 

उनकी बकवास मैं सुन रही थी.

फिर मैंने कहा- “पंडित जी अगर लड़के इतने ही अच्छे होते हैं, तो क्या जरूरत है. उन्हें उन लड़कियों के साथ घूमने की. उन्हें किसी ने जबरन तो कहा नहीं होगा कि आ बैल मुझे मार.”
“अरे बेटा तू नहीं समझेगी. अभी छोटी है ना. मेरी उम्र की हो जाएगी तब समझ आएगा.”




पंडित जी ने मेरे सर पर हाथ फेरते हुए कहा- “बेटा इन महिलाओं से तो भगवान इंद्र भी नहीं बच पाए थे. मालूम है अहिल्या पत्थर की बन गई थी और राम के युग में मालूम है क्या हुआ था.”
“क्या?
“सूर्पनखा की नाक काटी गई थी.”
मैंने कहा- “हां.”
पण्डित ने कहा- “तो बेटा सभी को अपने दायरों में रहना चाहिए.”

मैंने पण्डित से कहा- “क्या सूर्पनखा का प्यार करना गलत था और आप जिस पुरुष प्रधान समाज की बात कर रहे हैं. वहां बलात्कार लड़की का होता है और बदनाम भी वही होती है, जिसने बलात्कार किया, जो आरोपी है आप उसे कुछ नहीं कहते. क्या सारी आज़ादी पुरुषों के पास है? क्या केवल वही रात में सड़क पर घूम सकते हैं? आज़ादी क्या उनकी बपौती है?”

पंडित जो को मैंने भरपूर कोशिश की समझाने की। समानता और स्वतंत्रता के अधिकार का मतलब उनके लिए सिर्फ पुरुषों की आज़ादी था. वो मुझे बार-बार वेदों का हवाला दे रहे थे कि वेद में ये लिखा है, वेद में वो लिखा. पर मैंने कहा पंडित जी ये सब वैदिक काल की बात है. अब कलयुग है और आप लोग लड़कियों से उम्मीद करते हैं कि वो सीता की तरह रहें लेकिन क्या कोई लड़का राम बनने को तैयार है. अरे राम तो छोड़िए, वो तो रावण से भी बदतर हैं. रावण ने सीता को उठाया ज़रूर था लेकिन उसको एक बार भी छुआ तक नहीं था.




बस फिर क्या था? पंडित जी ही... ही... करते हुए मेरे सर पर फिर से हाथ फेरते हुए कहने लगे- “अभी नहीं समझेगी.”

बड़बड़ाते हुए आरटीवी से उतर गए और मैं यह सोचते हुए मरी जा रही थी कि अधिकतर लोगों की सोच ऐसी ही है. आखिर कब आपलोग महिलाओं को अपने जैसा इंसान मानेंगे. अपनी जैसी आज़ादी उनके लिए भी चाहेंगे.
-मीना 
 पत्रकार, जनसत्ता