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कविताएं: प्रेम, घरौंदा, अल्फाज़, स्मृतियाँ और खेल -गौरव भारती

  प्रेम  
अल्फ़ाज़ों की कुंची से
आसमां की भित्ति पर
जब भरना चाहता हूँ कोई रंग दूसरा
कोई टोकने लगता है मुझे
कोई रोकने लगता है मुझे
जबरन धकेलता है पीछे
आँखे दिखाता है
मजाक उड़ाता है
डराता है
धमकाता है
दरकिनार कर इन गर्म हवाओं को
दो चार लंबी साँसे फेफड़े में भरता हूँ
उठाता हूँ कलम और
लिख डालता हूँ 'प्रेम'
जी हां
सही सुना तुमने
'प्रेम'
जो आज अप्रासंगिक हो गया है
जो सहम कर छिप गया है
दरख़्त के किसी ओट में
और वहशी धूप जिसे निगल जाने को बेताब है
तुम पूछते हो 
'प्रेम का मतलब'
तुम नहीं जानते?
खैर, तुम्हारा मतलब पूछना ही बेमतलब है
इसमें तुम्हारा दोष भी नहीं
तुम ने चन्द्रग्रहण लगते हुए देखा है
देखा होगा
जरूर देखा होगा
लेकिन अबकी मौका मिले तो एक बार फिर देखना
अपने ह्रदय को साथ रखना
शायद इस बार तुम्हें डर भी लगे
मगरयदि तुम लिख न सको 'प्रेम'
यक़ीनन तुम करने लगोगे प्रेम
बाँटने लगोगे प्रेम
तुम्हें पता है
रंगों का विभाजन
इस जाहिल दुनिया में
रंगों की जमात भी होती है
लेकिन बारिश के बाद का इन्द्रधनुष
मुझे सोचने पर मजबूर करता है
मैं मिला डालना चाहता हूँ सब रंग
ताकि दुनिया खुबसूरत दिखे
रंग भी तन्हाई का शिकार न हो
एक रंग को दूसरे पर शुबहा न हो
हरेक रंग पीठ थपथपाए एक-दूसरे की
इसके लिए जरूरी है
दूरियों को मिटाना
मैं ....
जब भी लिखता हूँ 'प्रेम'
कोशिश रहती है कि एक इंच दूरी को पाट सकूँ
मेरे किरदार भी इसी कोशिश में रहते हैं
मेरे अल्फाज़ भी इसी को बुनते हैं
जब तुम करने लगोगे प्रेम
बांटने लगोगे प्रेम
मैं तुम्हें भी अपना किरदार बना लूँगा
लेकिन एक बात याद रखना 
'डर प्रेम की हत्या कर देता है'
प्रेम की मृत्यु बहुत भयावह है
इसलिए डरना मत
लौट कर आना
सब गठरियाँ खोल कर आना
मैं रंगमंच तैयार कर रहा हूँ
आवाम इन्तजार में है। 


  घरौंदा  

हज़ारों लाखों घरौंदे
कुछ छोटे
कुछ बड़े
कुछ बहुत बड़े
घरौंदों में सजती संवरती जिंदगियां
अंगड़ाई लेती ख्वाहिशें
पलते ख़्वाब
बनती कहानियाँ
कभी ख़ामोशी चुपके से सिरहाने बैठ जाती है
तो रात करवटों में गुजरती है
कभी दिन टेलीविजन के चैनलों को बदलते हुए गुजरता है
तो शाम टेलीविजन का कोई किरदार बनते हुए
कभी रिश्तों में अड़चने आती है
दीवारों पर नमी दिखने लगती है
कभी एहसास मरने लगता है
दीवारें दरकने लगती है
इन घरौंदों में लुका-छिपी करती
मेरी एक जोड़ी आँखे
ढूंढती रहती है
कुछ किरदार
कुछ कहानियाँ
कुछ नज़्म
कुछ शायरी
थोड़ा इश्क़
चाय में शक्कर की माफ़िक ही सही।

  अल्फाज़   
अल्फाज़ 
टंगे हैं
लिबास संग
शायद रफ्फु किये हुए जेब में
सुर्खाब रंगों में लिपटी
कुछ कहती
कुछ सुनाती
ख़ामोशी को तोडती
अपनी ओर खींचती
अल्फाज़ 
बिखरे पड़े हैं
बिस्तर पर
मानो किसी ने कोरा कागज समझ
कोशिश की हो लिखने की कोई नज्म
जो पूरी न हो सकी
और जाते-जाते
अल्फाजों को बिखेर दिया हो हताशा में
अल्फाज़
झांक रहें हैं
रंगीन दीवारों के पीछे से
और उपस्थित हो जाते हैं
कई कहानियां लेकर
जो बयां करती है
वह सब कुछ
जो परत दर परत
छुपाई गयी है पुताई से
कई कहानियां
कई किरदार
कई ख़्वाहिशें
अल्फाज़ 
घेरे हुए है मुझे
मैं खामोश हूँ
आज ये बोल रहें है
सब कुछ कह देना चाहते हैं
मानों एक लम्बा मौन इनका इन्तजार कर रहा हो।





  स्मृतियाँ  
मैं
डूबकर
तुम्हारी स्मृतियों में
ढूंढ़ लाता हूँ
अक्सर बेनजीर मोतियां
ढूंढ़ लाता हूँ
लिखने की वजह
ढूंढ़ लाता हूँ
खामोश लफ्ज़
जो आज के शोर को आसानी से बयां कर जाती है
तुम्हारी स्मृतियाँ
हमेशा मुझे साहिल से मिला देती है
जहाँ गीली रेत पर
मैं थोड़ा बचपन जी लेता हूँ
इस उम्र में भी
मैं देखता हूँ
एक कटी पतंग
जिसे हवा उड़ा ले जा रही है
नीचे जमीं पर दौड़ते बच्चों का झुंड
आसमां की ओर ताकती आँखें
उठे हुए हाथ
कि अचानक पतंग
टंग जाती है फंस जाती है
ताड़ के लंबे वृक्ष में
हवा के तेज झोंकों का इंतजार
चिल्लाते हुए बच्चे
अब लौट रहे हैं
हारे मन से
और पतंग
ताड़ में उलझता ही जा रहा है
अक्सर डूबते हुए तुम्हारी स्मृतियों में
यह ख्वाब देख लेता हूँ
और जब खुलती है नींद
मेरे बाल उलझे हुए होते हैं
बिस्तर पर अनगिनत सिलवटें
मानों स्मृतियाँ
अल्फ़ाज़ बनकर उभर आई हो
और मैं उसे पढ़ने की
अबोध कोशिश में लगा हूँ।

  खेल  
आपने सुना है
हमने सुना है
सबने सुना है
हर खेल का अंत होता है
लेकिन 
सियासी खेल कभी ख़त्म नहीं होता
खेमा बदलता रहता है
सत्ता बदलती रहती है
सियासी जुगलबंदी जारी रहती है
और जारी रहता है खेल
प्यादे मरते है
इस खेल में हज़ारों
दोनों तरफ
प्यादों की आखिरी तारीख मुकर्रर होती है
इस खेल में राजा नहीं मरता
कभी नहीं मरता
वह जिन्दा रहता है
शिलालेखों में
इतिहासों में
स्याह अक्षरों में
और वह स्याह अक्षरों से निकलकर
कभी-कभी स्याह कारनामे कर डालता है
दिन के उजाले में भी
इतिहास का भूत
बहुत खतरनाक हो जाता है कभी-कभी
कुछ नहीं सूझता
कुछ नहीं दिखता
और अक्सर इस खेल में
भूत छोड़े जाते है
उन्हें निकाला जाता है कब्र खोदकर
खोलकर बोतलों के ढक्कन
खेल जारी है
जारी रहेगा
सत्ता है-विपक्ष है
विपक्ष है-सत्ता है
उठापटक-उठापटक
कोई नियम नहीं
कोई शास्त्र नहीं
हम सब दर्शक है
मात्र दर्शक
इससे ज्यादा कुछ नहीं ।
-गौरव भारती 


शोधार्थी
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
मोबाईल नंबर- 9015326408
ईमेल आईडी -sam.gaurav013@gmail.com



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   -संपादक