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कविताएं: मेरी मानो, आप लौट जाओ, शून्यता की परत, वक्त के चेहरे और तेरी बातें तेरी यादें -राकेश कमल

  मेरी मानो, आप लौट जाओ  

दुनियाँ के नक्शे पर एक देश है
नाम है भारत
भारत में एक शहर है
नाम है दिल्ली
दिल्ली शहर में एक जगह है
जंतर मंतर
कभी खगोलीय दृष्टिकोण से
बना जंतर मंतर
आज़ाद भारत में
लुटियन के महलों में बैठे
लोकतन्त्र के झण्डाबरदारों से
अपनी गुहार लगाने
दूर-दूर से आए
लोकतन्त्र केलोकके लिए
नियत कर दिया गया एक स्थान है
आजकल दूर तमिल के क्षेत्र से
आए हैं कुछ किसान
लगाने गुहार हुक्मरानों से
इस सोच के साथ कि शायद
लुटियन के लाट साहबों को
हो गया है निकट दृष्टिदोष
इसलिए दूर से नहीं दिखते इन्हें
खेतों मेंखलिहानों में जूझते
पल भर में हज़ार बार
खुद के भीतर ही टूटते किसान
इसलिए इस उम्मीद में
कि शायद जंतर मंतर से
नज़दीक से देख पाएगी सरकार
देश के अन्नदाताओं के
श्याह पड़ गएमुर्झाए से चेहरे
पर शायद वक्त
गलत चुन लिया है
इन किसानों ने
क्योंकि यह दौर
नहीं है प्रतिरोधों काप्रदर्शनों का
यह राष्ट्रवाद का दौर है
ऐसा राष्ट्रवाद जिसकी
अनुगूँज से धरती काँपती है
आसमानों में दूर-दूर तक
दिखाई देते हैं अपने घोसलों से
डर कर बेसाख़्ता भागतेउड़ते परिंदे
यह अनुगूँज नहीं है कोई
मामूली अनुगूँजबल्कि
भारत में राष्ट्रवाद की
पराकाष्ठा की अनुगूँज है यह
और इस अनुगूँज में
इस कोलाहल से भरे
दौर मेंजब हुक्मरान
देश को विश्वशक्ति बनाने मेंं
राष्ट्र को दुनियाँ का
सिरमौर बनाने में परेशान हैं
इन किसानों के लिए
उनकी धंसती आँखों के लिए
उनके निर्वस्त्र हो कर
की जा रही फरियादों के लिए
भला वक्त निकालना
कैसे हो पाता संभव
मेरी मानो ते एक बात कहूँ?
आप लोग लौट जाओ
अभी भारत बन रहा है
विश्व के विभिन्न सूचकाँकों में
दिन प्रतिदिन मजबूत हो रहा है
देश की संवृद्धी में
चार नहींहज़ार चाँद लग रहे हैं
ऐसे में आपके लिए
आपकी बातोंमांगों के लिए
अगर नहीं है वक्त, तो दोष
उनका नहीं, आपका है
आपने वक्त ग़लत चुना है
और जब एक बार
ग़लत चुनाव हो जाए अगर
तो उसकी तपिश तो सहनी ही है
इस लिए मेरी मानिए
आप लौट जाईए
क्योंकि ये मसनदनशीँ
इतने भी नहीं निष्ठुर
कि इन्हें दिखाई ही न दे
निर्वस्त्र हो कर
जंतर मंतर की सड़कों पर लोटते किसान
नहीं वो नहीं इतने निर्दयी
कि उन्हें दिखाई ही न दे
मौत के प्रतीकखोपड़ी की माला
चूहे खातेजनाज़े निकालते किसान
उन्हें दूरदृष्टि दोष भी तो नहीं
कि इतने नज़दीक से भी
दिखाई ही न दे
अपने ही मूत्र को पीते
ध्यानाकर्षण की कोशिश करते किसान
नहीं गलती उनकी नहीं
आपने वक्त ही ग़लत चुना है
अभी राष्ट्र निर्माण का दौर है
मैं फिर कहता हूँ
आप लोग लौट जाओ
लौट जाओ और तब आना
जब वो पूरा कर लें
राष्ट्र निर्माण का
सबसे ज़रूरी काम
तब तक के लिए
आप लौट जाओ
अभी राष्ट्र बन रहा है
लौट जाओ और राष्ट्रवाद के घी में लिपटी
गर्व की रोटी खाओ
मेरी मानो आप लौट जाओ।

  शून्यता की परत  

कभी कभी घड़ी की पल पल बढ़ती
सूइयों के प्रवाह के बीच
मन अनायास ही जब होने लगता है
शून्यता की ओर उन्मुख
तब शून्यता की ऊपरी परत पर
लेने लगते हैं आकार
बीते हुए पलों के न जाने
कितने किस्से और कहानियाँ
वही किस्से और कहानियाँ
जिनके बीच होती है हमारी भी
एक सजीव हिस्सेदारी
हर कहानी की उभरती आकृतियाँ
हमारे चेहरे पर चमक ही नही लातीं
कुछ अपने कार्य-कारण सम्बन्धों की
तीखी विशेषताओं के साथ
दे जाती हैं सीख भविष्य के लिये
वहीं कुछ कहानियाँ कराती हैं
हमारे खुद के ऐसे किरदारों से रूबरू
जो इस यकीन को पुख्ता करते हैं
कि हम ही सब कुछ नहीं
बल्कि कई बार हम होते हैं
फिल्म के उस पात्र कि तरह
जिसकी भूमिका सिर्फ प्रवाह
और प्रवाह कि नियति के साथ
बह जाने भर की होती है
यही कहानियाँ उन शून्यताओं का
कारण भी होती हैं और
उनसे बाहर निकल पाने का साधन भी!





  वक्त के चेहरे  

यूँ तो वक्त के चेहरे
नहीं रहते एक से हमेशा
कभी खुशियों की लाली
होठों पर लगाए आती है
समय की दुल्हनतो कभी
काजल की माफिक
लपेटे हुए दर्द के साथ
इन्हीं के दरमियाँ
खुद को रख पाना संतुलित
आदमी के व्यक्तित्व का सौंदर्य है
यह वैसा ही बन जाने जैसा है
जैसा होता समुद्र अपनी विशालता को
समेटे हुएलिए हुए अथाह गहराई
समय का क्या हैउसका तो
काम ही है यही, बदलना रुप
हर घड़ी, हर पलअनवरत
अलग-अलग चेहरे लिये सभी पलों को
अपने मन की समायोजन शक्ति से
समुद्र की तरह आत्मसात करना
यही है समय से लड़ने को
आदमी को मिला सबसे असरदार
और प्रभावी हथियार
क्योंकि वक्त का चरित्र है परिवर्तन
और व्यक्ति का चरित्र है सामंजस्य!
 

  तेरी बातें तेरी यादें  

यूँ तो तेरी बातें तेरी यादें,
बहुत हैं एक उम्र के लिए,
पर सोचता हूँ तो लगता है,
जब तू ही बदल गया एक मोड़ से,
नकार कर अपनी बातें अपने वादे,
तो बता इस उम्र भर की आस में,
क्या कोई राहत हैउम्मीद है क्या?


 -राकेश कमल 







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   -संपादक