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महिला सशक्तिकरण में गांव के विकास की अहम भूमिका: मीना

पुस्‍तक समीक्षा

मनुष्य अक्सर स्वार्थी होता है। उसे जो मिलता है वह उसे किसी के साथ बांटना नहीं चाहता। जितना उसे उपभोग करने के लिए मिलता है उसकी आवश्यकताएं उतनी ही बढ़ती जाती हैं। इला आर भट्ट की पुस्तक अनुबंध भी यही बताती है कि किसी एक संसाधन का इस्तेमाल समूह में कैसे करना है। और अपनी स्वार्थ सिद्धि समूह में कैसे करनी है? भट्ट ने पुस्तक अनुबन्ध के मार्फत बताया है कि किस तरह से व्यक्ति अपने गुणों का इस्तेमाल कर पूरे समाज का विकास कर सकता है। इला आर भट्ट गांधीवादी विचारों की महिला हैं। उनके द्वारा लिखी यह पुस्तक मूल रूप से अंग्रेजी में है। नीलम गुप्ता ने इसका अनुवाद किया है।

इला की यह पुस्तक तीन बड़े अध्यायों में बंटी हुई है। जिसमें गुजरात-राजस्थान के विभिन्न गांवों की समस्याओं का निपटारा समूह में किया गया है। पहले अध्याय वास्तविकतामें गुजरात के कुछ गांवों की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक स्थिति को जानने के लिए इला की संस्था सेवाने गांवों का सर्वे किया। इस सर्वे में उन्होंने गांवों के आवास, खान-पानकपड़ा, प्राथमिक स्वास्थ्य, प्राथमिक शिक्षा और प्राथमिक वित्तीय सेवाओं को ध्यान में रखा है।


किसी समाज की स्थिति सुधारनी हो और सकारात्मक फल चाहिए हो तो इला की यह पुस्तक बेहद सहायक है। किसी समस्या का हल तभी निकाला जा सकता है जब हमें समस्याओं का ज्ञान हो। तो इला ने भी यही किया। इला और उनकी सेवा की बहनों ने 10 गांवों का क्षेत्रीय सर्वेक्षण किया है। इस सर्वेक्षण में हर गांवों के 10 परिवारों से बात की गई। इन परिवारों से ऊपर दिए गए बिंदुओं पर बातचीत की गई।

इस पुस्तक को जब मैं पढ़ रही थी तब पढ़ते-पढ़ते थोड़े समय के लिए रुक गई। और सोचने लगी कि जो योजना मैंने कुछ सालों पहले बनाई थी कि अपने गांव का विकास करूँगी। मेरी इस इच्छा की पूर्ति अनुबन्ध पुस्तक करती हुई दिखाई दी क्योंकि मैंने ये तो सोच लिया था कि मैं अपने गांव में पानी, कृषि, रोज़गार और महिलाओं की स्थिति सुधारने में अपना योगदान दूंगी। लेकिन मुझे यह समझ नहीं आ रहा था कि इन समस्याओं पर मैं काम कैसे करूँगी। मेरी इस समस्या को इला ने सॉल्व कर दिया।


इला आर भट्ट की पुस्तक अनुबंध में गांव की हर समस्या का हल महिलाएं करती नज़र आती हैं। और ये बी ए, एम ए वाली महिलाएं नहीं हैं बल्कि अनपढ़ और गुणी महिलाएं हैं। गांव में चाहे पानी, कृषि या स्व-रोज़गार की समस्या हो, सभी तरह का महिलाएं काम करती हैं। इसलिए यह कहना अनुचित नहीं होगा कि इला की यह पुस्तक केवल महिला सशक्तिकरण की कहानी नहीं है बल्कि गांव सशक्तिकरण की कहानी बयां करती है।

गुजरात के गांव की महिलाओं को कढ़ाई अच्छे से आती है तो इला ने महिलाओं के इस गुण को और निखारा और उनकी बनाई वस्तुएं देश व विदेश के बाजारों में बेचने के लिए भेजी। महिलाओं को मिस्त्री, राजगिरि, किसानी, बाजार में अपना माल कैसे बेचना है? इन सभी मुद्दों पर सेवा ने काम किया। यह पुस्तक स्थानीय स्तर से कैसे मोहल्ले के विकास और मोहल्ले के विकास से देश में विकास कैसे होता है? इसकी पूरी कहानी बयां करती है।


इस आधुनिक दुनिया में कहा जा रहा है कि स्त्री दोहरे काम के बोझ तले दब रही है। यह सच है। लेकिन अनुबन्ध पुस्तक में जो भी विकास के काम हुए हैं वह सभी कम पढ़ी-लिखी या अनपढ़ महिलाओं ने किए हैं। बस उन्हें उन्हीं की आसान भाषा में सामाजिक और आर्थिक बिन्दुओं को समझाया गया है।

गुजरात के गांवों में चाहें शौचालय बनाने की बात हो, खेती बाड़ी करने की समस्या हो सभी को महिलाओं ने किया हल किया। एक तरफ जहां समाज महिलाओं को कमज़ोर समझता है तो वहीं ऐसी सोच को अंगूठा दिखाती हैं सेवा की महिलाएं। गांवों में महिलाओं के समूह बनाएं गए। उन्हें उन्ही के गुणों का प्रशिक्षण दिया गया। जिससे उनका हुनर प्रोफेशनल बन गया। अब वे खुद बाज़ारों में जाती हैं अपने माल का दाम खुद तय करती हैं और खुद बेचती हैं। महिलाएं बाजार तक तो पहुंच गई हैं लेकिन घर की जिम्मेदारियों से वे निजात नहीं पा रही हैं। लेकिन वे स्वावलंबी बन रही।

-मीनालेखिका जनसत्‍ता में कार्यरत हैं।










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   -संपादक